karbala Novel by Munshi Premchand
karbala Novel by Munshi Premchand

पहला दृश्य: {समय – नौ बजे रात्रि। यजीद, जुहाक, शम्स और कई दरबारी बैठे हुए हैं। शराब की सुराही और प्याला रखा हुआ है।}

यजीद – नगर में मेरी खिलाफ़त का ढिंढोरा पीट दिया गया?

जुहाक – कोई गली, कूचा, नाका, सड़क, मसजिद, बाजार, खानकाह ऐसा नहीं है, जहां हमारे ढिंढोरे की आवाज न पहुंची हो। यह आवाज़ वायुमंडल को चीरती हुई हिजाज, यमन, इराक, मक्का-मदीना में गूंज रही है और, उसे सुनकर शत्रुओं के दिल दहल उठे हैं।

यजीद – नक्कार्ची को खिलअत दिया जाये।

जुहाक – बहुत खूब अमीर!

यजीद – मेरी बैयत लेने के लिए सबको हुक्म दे दिया गया?

जुहाक – अमीर के हुक्म देने की जरूरत न थी। कल सूर्योदय से पहले सारा शाम बैयत लेने को हाजिर हो जायेगा।

यजीद – (शराब का प्याला पीकर) नबी ने शराब को हराम कहा है। यह इस अमृत-रस के साथ कितना घोर अन्याय है! उस समय के लिये यह निषेध सर्वथा उचित था, क्योंकि उन दिनों किसी को यह आनंद भोगने का अवकाश न था। पर अब वह हालत नहीं है। तख्त पर बैठे हुए खलीफ़ा के लिए ऐसी नियामत हराम समझने से तो यह कही अच्छा है कि वह खलीफा ही न रहे । क्यों जुहाक, कोई कासिद मदीने भेजा गया?

जुहाक – अमीर के हुक्म का इंतजार था।

यजीद – जुहाक, कसम है अल्लाह की; मैं इस विलंब को कभी क्षमा नहीं कर सकता। फौरन कासिद भेजो और वलीद को सख्त ताकीद लिखो कि वह हुसैन से मेरे नाम पर बैयत ले। अगर वह इनकार करें, तो उन्हें कत्ल कर दे। इनमें जरा भी देर न होनी चाहिए।

जुहाक – या मौला! मेरी अर्ज़ है कि हुसैन कबूल भी कर लें, तो भी उनका जिंदा रहना अबूसिफ़ियान के खानदान के लिये उतना ही घातक है, जितना किसी सर्प को मारकर उसके बच्चे को पालना। हुसैन जरूर दावा करेंगे।

यजीद – जुहाक, क्या तुम समझते हो कि हुसैन कभी मेरी बैयत कबूल कर सकते हैं? यह मुहाल है, असंभव है। हुसैन कभी मेरी बैयत न लेगा, चाहे उसकी बोटियां काट-काटकर कौवों को खिला दी जाये। अगर तक़दीर पलट सकती है, अगर दरिया का बहाव उलट सकता है, अगर समय की गति रुक जाये पर हुसैन दावा नहीं कर सकता। उसके बैयत लेने का मतलब ही यही है कि उसे इस जहान से रुखसत कर दिया जाये। हुसैन ही मेरा दुश्मन है। मुझे और किसी का खौफ नहीं, मैं सारी दुनिया की फ़ौजों से नहीं डरता, मैं डरता हूं इसी निहत्थे हुसैन से। (प्याला भरकर पी जाता है) इसी हुसैन ने मेरी नींद, मेरा आराम हराम कर रखा है। अबूसिफ़ियान की संतान हाशिम के बेटों के सामने सिर न झुकाएगी। खिलाफ़त को मुल्लाओं के हाथों में फिर न जाने देंगे। इन्होंने छोटे-बड़े की तमीज उठा दी। हरएक दहकान समझता है कि मैं खिलाफ़त की मसनद पर बैठने लायक हूं, और अमीरों के दस्तर्खान पर खाने का मुझे हक है। मेरे मरहूम बाप ने इस भ्रांति को बहुत कुछ मिटाया, और आज खलीफ़ा शान व शौकत में दुनिया के किसी ताजदार से शर्मिंदा नहीं हो सकता। जूते सीनेवाले और रूखी रोटियां खाकर खुदा का शुक्रिया अदा करने वाले खलीफ़ों के दिन गए।

जुहाक – खुदा न करे, वह दिन फिर आए।

अब्दुलशम्स – इन हाशिमियों से हमें उस्मान के खून का बदला लेना है।

यजीद – ख़जाना खोल दो और रियाया का दिल अपनी मुट्ठी में कर लो। रुपया खुदा के खौंफ को दिल से दूर कर देता है। सारे शहर की दावत करो। कोई मुज़ायका नहीं, अगर ख़जाना खाली हो जाये। हर एक सिपाही को निहाल कर दो और, अगर रियायतें करने पर भी कोई तुमसे खिंचा रहे, तो उसे कत्ल कर दो। मुझे इस वक्त रुपए की ताकत से धर्म और भक्ति को जीतना है।

{हिंदा का प्रवेश}

यजीद – हिंदा, तुमने इस वक्त कैसे तकलीफ की?

हिंदा – या अमीर! मैं आपकी खिदमत में सिर्फ इसलिए हाज़िर हुई हूं कि आपको इस इरादे से बाज़ रखूं। आपको अमीर मुआविया की कसम, अपने दीन की, अपनी नजात को, अपने ईमान को यों न खराब कीजिए। जिस नबी से आपने इस्लाम की रोशनी पाई, जिसकी जात से आपको यह रुतबा मिला, जिसने आपकी आत्मा को अपने उपदेशों से जगाया, जिसने आपको अज्ञान के गढ्ढे से निकालकर आफ़ताब के पहलू में बिठा दिया, उसी खुदा के भेजे हुए बुजुर्ग के नवासे का खून बहाने के लिए आप आमादा है!

यजीद – हिंदा, खामोश रहो।

हिंदा – कैसे खामोश रहूं। आपको अपनी आंखों से जहन्नुम के गार में गिरते देखकर खामोश नहीं रह सकती। आपको मालूम नहीं रसूल की आत्मा स्वर्ग में बैठी हुई आपके इस अन्याय को देखकर आपको लानत दे रही होगी और, हिसाब के दिन आप अपना मुंह उन्हें न दिखा सकेंगे। क्या आप नहीं जानते, आप अपनी नजात का दरवाजा बंद कर रहे हैं।

यजीद – हिंदा, ये मजहब की बातें मजहब के लिये हैं, दुनिया के लिये नहीं। मेरे दादा ने इस्लाम इसलिये कबूल किया था कि इससे उन्हें दौलत और इज्जत हाथ आती थी। नजात के लिये वह इस्लाम पर ईमान नहीं लाए थे, और न मैं ही इस्लाम को नजात का जामिन समझने को तैयार हूं।

हिंदा – अमीर, खुदा के लिये यह कुवाक्य मुंह से न निकालो। आपको मालूम है, इस्लाम ने अरब से अधर्म के अंधेरे को कितनी आसानी से दूर कर दिया। अकेले एक आदमी ने काफिरों का निशान मिटा दिया। क्या खुदा की मरजी बिना यह बात हो सकती थी? कभी नहीं। तुम्हें मालूम है कि रसूल हुसैन को कितना प्यार करते थे? हुसैन को वह कंधों पर बिठाते और अपनी नूरानी डाढ़ी को उनके हाथों से नुचवाते थे। जिस माथे को तुम अपने पैरों पर झुकाना चाहती हो, उसके रसूल बोसे लेते थे। हुसैन से दुश्मनी करके तुम अपने हक़ में कांटे बो रहे हो। खिलाफत उसकी है, जिसे पंच दे; यह किसी की मीरास नहीं है। तुम खुद मदीने जाओ, और देखो, कौम किस पर खिलाफ़त का बार रखती है। उसके हाथों पर बैयत लो। अगर कौम तुमको इन रुतबे पर बैठा दे, तो मदीने में रहकर शौक से इस्लाम का खिदमत करो। मगर खुदा के वास्ते यह हंगामा न उठाओ। (जाती है।)

यजीद – सरजून रूमी की बुला लो।

{सरजून आकर आदाब बजा लाता है। }

यजीद – आपने वालिद मरहूम की खिदमत जितनी वफ़ादारी के साथ की, उसके लिये मैं आपका शुक्रगुजार हूं। मगर इस वक्त मुझे आपकी पहले से कही ज्यादा जरूरत है। बसरे की सुबेदारी के लिए आप किसे तजबीज करते हैं?

रूमी – खुदा अमीर को सलामत रखे। मेरे खयाल में अब्दुल्लाह बिन जियाद से ज्यादा लायक आदमी आपको मुश्किल से मिलेगा। जियाद ने अमीर मुआविया की जो खिदमत की, वह मिटाई नहीं जा सकती। अब्दुल्लाह उसी बाप का बेटा और खानदान का उतना ही सच्चा गुलाम है। उसके पास फ़ौरन कासिद भेज दीजिए।

यजीद – मुझे जियाद के बेटे से शिकायत है कि उसने बसरेवालों के इरादों की मुझे इत्तिला नहीं दी और मुझे यकीन है कि बसरेवाले मुझसे बगावत कर जायेंगे।

रूमी – या अमीर, आपका जियाद पर शक करना बेज़ा है। आपके मददगार आपके पास खुद-ब-खुद न आएंगे। वह तलाश करने से, मिन्नत करने से रियासत करने से आएंगे। आप ही आप वे लोग आएंगे, जो आपकी जात से खुद फायदा उठाना चाहते हैं। इस मंसब के लिये जियाद से बेहतर आदमी आपको न मिलेगा।

यजीद – सोचूंगा। (शराब का प्याला उठाता है।) जुहाक! कोई गीत तो सुनाओ। जिसकी मिठास उस फ़िक्र को मिटा दे, जो इस वक्त मेरे दिल और जिगर पर पत्थर की चट्टान की तरह रखी हुई है।

जुहाक – जैसा हुक्म।

{डफ बजाकर गाता है।}

गाना

सफ़ी थक के बैठे दवा करनेवाले,

उठे हाथ उठाकर दुआ, करनेवाले।

वफ़ा पर हैं मरते वफ़ा करनेवाले।

ज़फ़ा कर रहे हैं जफ़ा करनेवाले।

बचाकर चले खाक से अपना दामन,

लहद पर जो गुजरी हवा करनेवाले।

किसी बात भी तक कायम नहीं है,

ये जालिम, सितमगर, दगा करनेवाले।

तअज्जुब नहीं है, जो अब जहन दे दें,

ये जिच हो गए हैं दवा करनेवाले।

समझ ले कि दुश्वार है राजदारी,

किसी का किसी से गिला करनेवाले।

अभी है बुतों को खुदाई का दावा,

खुदा जाने और क्या करनेवाले।

दूसरा दृश्य: {रात का समय – मदीने का गवर्नर वलीद अपने दरबार में बैठा हुआ है।}

वलीद – (स्वागत) मरवान कितना खुदगरज आदमी है। मेरा मातहत होकर भी मुझ पर रोब जमाना चाहता है। उसकी मर्जी पर चलता, तो आज सारा मदीना मेरा दुश्मन होता। उसने रसूल के खानदान से हमेशा दुश्मनी की है।

{कासिद का प्रवेश }

कासिद – या अमीर, यह खलीफ़ा यजीद का खत है।

वलीद – (घबराकर) खलीफ़ा यजीद! अमीर मुआविया को क्या हुआ?

कासिद – आपको पूरी कैफियत इस खत से मालूम होगी।

(खत वलीद के हाथ में देता है।)

वलीद – (खत पढ़कर) अमीर मुआविया की रूह को खुदा जन्नत में दाखिल करे। मगर समझ में नहीं आता कि यजीद क्योंकर खलीफ़ा हुए। कौम के नेताओं की कोई मजलिस नहीं हुई, और किसी ने उनके हाथ पर बैयत नहीं ली। मदीने-भर में यह खबर फैलेगी, तो गजब हो जायेगा। हुसैन यजीद को कभी खलीफ़ा न मागेंगे।

कासिद – (दूसरा खत देकर) हुजूर इसे भी देख ले।

वलीद – (खत लेकर पढ़ता है) “वलीद, हाकिम मदीना को ताकीद की जाती है कि इस खत को देखते ही हुसैन मेरे नाम पर बैयत न ले, तो उन्हें कत्ल कर दें, और उनका सिर मेरे पास भेज दें।” (सर्द सांस लेकर फर्श पर लेट जाता है।)

कासिद – मुझे क्या हुक्म होता है?

वलीद – तुम जाकर बाहर ठहरो (दिल में) खुदा वह दिन न लाए कि मुझे रसूल के नवासे के साथ यह घृणित व्यवहार करना पड़े। वलीद इतना बेदीन नहीं है। खुदा रसूल को इतना नहीं भूला है। मेरे हाथ गिर पड़े इसके पहले कि मेरी तलवार हुसैन को इतना नहीं भूला है। मेरे हाथ गिर पड़े इसके पहले कि मेरी तलवार हुसैन की गर्दन पर पड़े। काश, मुझे मालूम होता है अमीर मुआविया की मौत इतनी नज़दीक है, उसकी आंखें बंद होते ही मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा, तो पहले ही इस्तीफा देकर चला जाता। मरवान की सूरत देखने को जी नहीं चाहता, मगर इस वक्त उसकी मर्जी के खिलाफ। काम करना अपनी मौत को बुलाना है। वह रत्ती-रत्ती खबर यजीद के पास भेजेगा। उसके सामने मेरी कुछ भी न सुनी जायेगी। ऐसा अफ़सर, जो मातहतों से डरे, मातहत से भी बदतर है। जिस वजीर का गुलाम बादशाह का विश्वासपात्र हो, उसके लिये जंगल से ऊँट चराना उससे हजार दर्जे बेहतर है कि वह वजीर की मसनद पर बैठे।

(गुलाम को बुलाता है)

गुलाम – अमीर क्या हुक्म फर्माते हैं?

वलीद – जाकर मरवान को बुला ला।

गुलाम – जो हुक्म।

(जाता है।)

वलीद – (दिल में) हुसैन कितना नेक आदमी है। उसकी जबान से कभी किसी की बुराई नहीं सुनी। उसने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। उससे मैं क्योंकर बैयत लूंगा।

(मरवान का प्रवेश)

मरवान – इतनी रात गए मुझे आप न बुलाया करें। मेरी जान इतनी सस्ती नहीं है कि बागियों को इस पर छिपकर हमला करने का मौका दिया जाये।

वलीद – तुम्हारा बर्ताव ही क्यों ऐसा हो कि तुम्हारे ऊपर किसी कातिल की तलवार उठे। अभी-अभी कासिद मुआबिया की मौत की खबर लाया है, और यजीद का यह खत भी आया है। मुझे तुमसे इसकी बाबत सलाह लेनी है।

(खत देता है)

मरवान – (खत पढ़कर) आह! मुआबिया, तुमने बेवक्त वफ़ात पाई। तुम्हारा नाम तारीख में हमेशा रोशन रहेगा। तुम्हारी नेकियों को याद करके लोग बहुत दिनों तक रोएंगे। यजीद ने खिलाफत अपने हाथ में ले ली, यह बहुत ही मुनासिब हुआ। मेरे ख़याल में हुसैन को इसी वक्त बुलाना चाहिए।

वलीद – तुम्हारे खयाल में बैयत ले लेंगे?

मरवान – गैरमुमकिन। उनसे बैयत लेना उन्हें कत्ल करने को कहना है। मगर अभी मुआबिया के मरने की खबर मशहूर न होनी चाहिए।

वलीद – इस मामले पर गौर करो।

मरवान – गौर की जरूरत नहीं, मैं आपकी जगह होता, तो बैयत का जिक्र ही न करता। फौरन कत्ल कर डालता। हुसैन के जिंदा रहते हुए यजीद को कभी इत्मीनान नहीं हो सकता। यह भी याद रखिए कि मुआबिया के मरने की खबर फैल गई, तो न हमारी जान सलामत रहेगी, न आपकी। हुसैन से आपका कितना ही दोस्ताना हो, लेकिन वही हुसैन आपका जानी दुश्मन हो जायेगा।

वलीद – तुम्हें उम्मीद है कि वह इस वक्त यहाँ आएंगे। उन्हें शुबहा हो जायेगा।

मरवान – आपके ऊपर हुसैन का इतना भरोसा है, तो इस वक्त भी आएंगे। मगर आपकी तलवार तेज और खून गर्म रहना चाहिए। यही कारगुजारी का मौका है। अगर हम लोगों ने इस मौके पर यजीद की मदद की, तो कोई शक नहीं कि हमारे इकबाल का सितारा रोशन हो जायेगा।

वलीद – मरवान, मैं यजीद का गुलाम नहीं, खलीफा का नौकर हूं, और खलीफा वही है, जिसे कौम चुनकर मसनद पर बिठा दे। मैं अपने दीन और ईमान का खून करने से यह कही बेहतर समझता हूं कि कुरान पाक की नकल करके जिंदगी बसर करूं।

मरवान – या अमीर, मैं आपको यजीद के गुस्से से होशियार किए देता हूं। मेरी और आपकी भलाई इसी में है कि यजीद का हुक्म बजा लाएं। हमारा काम उनको बंदगी करना है, आप दुविधा में न पड़े। इसी वक्त हुसैन को बुला भेजें।

(गुलाम को पुकारता है)

गुलाम – या अमीर, क्या हुक्म है?

मरवान – जाकर हुसैन बिन अली को बुला ला। दौड़ते जाना और कहना कि अमीर आपके इंतजार में बैठे हैं।

(गुलाम चला जाता है)