सुबह उठकर हममें से ज्यादातर लोग क्या करते हैं? सोशल मीडिया पर अपने पोस्ट पर आए लाइक्स व कमेंट्स चेक करते हैं, फिर अपने मेल्स चेक करते हैं। इसके बाद किसी न्यूज़ ऐप पर लेटेस्ट खबरें भी पढ़ लेते हैं। लेकिन सुबह सुबह मोबाइल पर इतना समय देना कई मायनों में बहुत हेल्दी आदत नहीं है। मोबाइल फोन को स्मार्ट फोन बनाने के पीछे उन्हें हमारे लाइफ को स्मूद बनाना था, लेकिन आज ये हमारी लाइफ को स्मार्ट बनाने के साथ-साथ हेक्टिक भी बनाए रखते हैं।

मौबइल फोन्स के इस्तेमाल से न सिर्फ आखों और गर्दन की तकलीफें बढ़ रही है, बल्कि ये एंज़ाइटी, स्ट्रेस और डिप्रेशन का कारण भी बन रहे हैं। कई शोध इस ओर इशारा कर रहे हैं कि सुबह-सुबह स्मार्ट फोन्स के यूज़ से इंसान को बचना चाहिए।

क्योंकि सुबह सुबह-सुबह आप तनाव नहीं चाहते

अगर आपको अब तक ये नहीं पता कि मोबाइल के ज्यादा यूज़ से तनाव व चिंता बढ़ने लगती है तो इस बात को गांठ बाँध लीजिए। स्वीडन के गोथनबर्ग यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध के अनुसार स्मार्टफोन्स के इस्तेमाल से न सिर्फ चिंता और तनाव बढ़ता है, बल्कि डिप्रेशन भी हो सकता है।

और ये सही भी है क्योंकि एक तरफ ऑफिस के काम से जुड़े मेसेज दिखते रहते हैं, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर कोई देश दुनिया घूम रहा है, तो कोई अपनी पर्फेक्ट बॉडी फ्लॉन्ट कर रहा है। ऐसे पोस्ट्स भी इंसान को महसूस कराते हैं कि वो कितना बोरियत भरा जीवन जी रहा है।

बन रहा है एडिक्शन

हावर्ड यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध के अनुसार मोबाइल का एडिक्शन लोगों का बहुत कीमती समय बर्बाद करवा देता है। दरअसल जब भी हमें किसी काम के लिए तारीफ या सराहना मिलती है तो हमारा ब्रेन डोपामाइन नामक केमिकल रिलीज़ करता है। मोबाइल के केस में सोशल मीडिया पर हमारे पोस्ट या फोटो पर मिले लाइक्स से डोपामाइन का स्तर बढ़ता है और हम खुशी का अनुभव करते हैं। लेकिन इसके साथ ही डोपामाइ इसे लत का रूप भी देता है। तो अगर आपको टॉयलेट में बैठने के लिए भी फोन की जरूरत पड़ती है तो समझ लीजिए कि आप पर डोपामाइन का जादू चल चुका है और आपको मोबाइल की लत लग चुकी है।

सोचने की क्षमता को करता है कुंद

कंप्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर नामक जर्नल में छपे शोध के अनुसार किसी भी न्यूज़ या जानकारी को न्यूज़पेपर की जगह मोबाइल पर पढ़ने पर उस मुद्दे से जुड़ी तर्क की क्षमता, ये समझने की क्षमता की ये न्यूज़ कितना सही है या इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया बनाने की क्षमता घटने लगती है। लेकिन जब व्यक्ति उसी खबर को अख़बार में पढ़ता है तो उसे वह खबर ज्यादा समझ आती है।