Summary: मध्य प्रदेश और कर्नाटक की अनोखी अंगारों वाली होली, परंपरा की कहानी कर देगी हैरान
भारत में होली कई अनोखी परंपराओं के साथ मनाई जाती है। इन्हीं में से एक है अंगारों की होली, जो खास तौर पर दो राज्यों में देखने को मिलती है। यहां लोग जलते अंगारों पर चलकर या उनके साथ खेलकर अपनी आस्था और साहस का प्रदर्शन करते हैं।
Angaro ki Holi: होली का नाम आते ही रंग-गुलाल और मस्ती की तस्वीर सामने आती है, लेकिन मध्य प्रदेश और कर्नाटक में इस त्योहार का अंदाज़ बिल्कुल अलग और हैरान कर देने वाला होता है। यहां लोग जलते हुए अंगारों के साथ होली खेलते हैं, जिसे देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं। पहली नजर में यह परंपरा खतरनाक लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरी आस्था और सदियों पुरानी मान्यताएं जुड़ी हैं। ऐसे में अब आप भी जरूर सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है, तो चलिए जानते हैं इसके पीछे की खास वजह।
मध्य प्रदेश में कहां खेली जाती है अंगारों की होली?
मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के एक गांव में होली का अनोखा रूप देखने को मिलता है। यहां लोग पारंपरिक रंग-गुलाल की जगह जलते हुए अंगारों पर नंगे पैर चलकर होली मनाते हैं। होलिका दहन के बाद गांव की सीसी सड़क पर धधकते अंगारे बिछाए जाते हैं और बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पूरे उत्साह के साथ उन पर चलते हैं।
क्यों निभाई जाती है यह परंपरा?

ग्रामीणों का मानना है कि यह परंपरा गांव को आपदाओं से बचाने, बीमारियों को दूर रखने और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निभाई जाती है। विधि-विधान से पूजा करने के बाद जब अंगारों पर चला जाता है, तो लोग इसे आस्था और विश्वास का प्रतीक मानते हैं। हैरानी की बात यह है कि ग्रामीणों के अनुसार अंगारों पर चलने के बावजूद उनके पैरों में न तो छाले पड़ते हैं और न ही कोई तकलीफ होती है।
कर्नाटक में अंगारों की होली कहां मनाई जाती है?
कर्नाटक में अंगारों से जुड़ा यह अनोखा उत्सव अग्नि केली दक्षिण कन्नड़ जिले के कतील गांव में स्थित श्री दुर्गा परमेश्वरी मंदिर में मनाया जाता है। यह मंदिर के नौ दिनों तक चलने वाले वार्षिक जत्रा महोत्सव का प्रमुख हिस्सा होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं और मां दुर्गा के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। अग्नि से जुड़े इस अनुष्ठान को भक्ति, परंपरा और साहस का प्रतीक माना जाता है।
कर्नाटक में कैसे हुई इस परंपरा की शुरुआत?

मान्यता है कि कतील में मनाई जाने वाली अग्नि केली की शुरुआत सैकड़ों साल पहले हुई थी। पुराने समय में जब इलाके में युद्ध, बीमारियां और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा मंडराता था, तब गांव के लोगों ने श्री दुर्गा परमेश्वरी मंदिर की देवी से रक्षा की प्रार्थना की। देवी को प्रसन्न करने और संकटों से मुक्ति पाने के लिए भक्तों ने अग्नि पूजा की और नारियल की सूखी जलती छालों को एक-दूसरे की ओर फेंककर अनुष्ठान किया। कहा जाता है कि इसके बाद धीरे-धीरे यह धार्मिक अनुष्ठान एक परंपरा बन गया।
कर्नाटक में होली खेलने के नियम
अग्नि केली के इस अनोखे अनुष्ठान में भाग लेने वाले श्रद्धालु सबसे पहले नारियल के सूखे छिलकों को जलाते हैं। रात होते ही श्री दुर्गा परमेश्वरी मंदिर के सामने बने खुले मैदान में दो दल आमने-सामने खड़े हो जाते हैं और जलती हुई छालों को एक-दूसरे की ओर फेंकते हैं। चारों तरफ उड़ती आग की चिंगारियां और जयकारों के बीच यह दृश्य बेहद रोमांचक हो जाता है। करीब 15 से 20 मिनट तक चलने वाली यह परंपरा पूरी तरह धार्मिक नियमों और अनुशासन के साथ निभाई जाती है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।

