New Daughter in Law: बेटी के हाथ पीले होते हैं। मेंहदी रचती है। दुलहन के शृंगार में सजती है। बैण्ड-बाजा बजता है। बरात आती है। पटाखे फूटते हैं। पार्टी मनती है। उसके बाद विदाई की जाती है। वह दूल्हे के साथ आधुनिक कार की डोली में बैठती है। खुशी-खुशी ससुराल चली जाती है।
ससुराल की चौखट पर सपनों की रंगोली और अपेक्षाओं के तोरण सजे होते हैं। बेटी का दुलहन के
रूप में आरती-फूलों से स्वागत किया जाता है। वह ससुराल की दहलीज पर पहला कदम रखती है। एक नये उपवन में प्रवेश करती है। जहां हर रिश्ता एक नये फूल की तरह है। कोई गेंदा की तरह सोंधा-सहज, कोई गुलाब की तरह शोख-कांटों वाला, कोई मोगरे-सा शान्त-सुगन्धित और कोई
रातरानी-सा लहराता-मुस्काता। यह नया घर उसके मन को आकर्षित करता है। टोह भी लेती है कि
कहीं चहकती चड़ियां दिखाई पड़ जायें।
नई बगिया में पहली सास-बहार ‘अरी सुन बहू, इधर आ… रसोईघर को झांक ले। अब से यह तेरे जिम्मे है।’ सास मुस्कराती है। ‘जी हां…, अभी देखती हूं।’ नई नवेली बहू घूंघट सम्भालते हुए उत्तर
देती है। यह पहला सम्वाद होता है ससुराल के आंगन में अपनत्व की बुनावट करने का। सास-बहू का रिश्ता मां-बेटी के रिश्ते का ही नया संस्करण है। बस दोनों को थोड़ा धैर्य, थोड़ी समझदारी और थोड़ी प्रतीक्षा की जरूरत होती है।
नई बहू का आना शुभ
गेंदा फूल की रंगत पीली, केसरिया या सफेद कैसी भी हो। वह न अधिक नाजुक होता है, न अत्यधिक रूखा, पर उसकी खुशबू पूरे घर-आंगन को महका देती है। ठीक वैसे ही एक समझदार नई बहू अपने व्यवहार से पूरे घर में प्रेम और जीवन का रंग भर देती है। उसका ससुराल में आना
परिवार को सुखमय कर देता है। सबकी बातचीत में मधुरता आ जाती है। मनमुटाव व झगड़ों का पटाक्षेप हो जाता है। सब कोई सही-सही व्यवहार करने लगते हैं।
ससुर का शान्त छांव-सा स्नेह
‘बेटी, अधिक काम मत कर। थक जायेगी। थोड़ा आराम कर ले, फिर आगे काम करना।’ बुजुर्ग ससुर के ये शब्द नई बहू के लिये अपने पिता जैसी पुकार बन जाते हैं, जिसे उसने मायका में छोड़ आयी
है। ससुर का रिश्ता एक अनकही सुरक्षा की दीवार होता है। बाहर से वे कम बोलते हैं, पर उनकी आंखों में छिपा स्नेह अक्सर बहुत कुछ कह जाता है। बहू जब घर में सामान्य हो जाती है, तब ससुराल
उसके लिये ‘पति का घर’ से बढ़कर ‘अपना सुखदायी घर’ हो जाता है।
ननद-देवर मस्ती के गेंदा फूल
‘भाभी आइये, हम दोनों चाट और गोलगप्पो का मजा लेते हैं। मैं ताजाताजा ठेले से लेकर आयी हूं। चटपटा खाइये और एक नम्बर की चटोरी बनिये।’ ननद का रिश्ता कभी सहेली का बन जाता है। कभी ननद मस्त चुहलबाजी भी करती है। ‘भाभी, आज फिर पकौड़ा
छूते मेरे हाथ जल गये।’ वह जवाब देती है, ‘हां देवर जी, ताकि खाते समय अपना ध्यान मोबाइल से हटा सको।’ देवर का रिश्ता एक पारिवारिक मर्यादा में ढला हुआ सौहार्द का प्रतीक होता है।
दोनों में ठिठोली भी चलती है। ऐसे सम्वाद घर को जीवन्त बना देते हैं। परिवार में बहू संस्कार और आनन्द का बीज बोती है।
रिश्तों की मनमोहक बगिया
सचमुच ससुराल के रिश्ते मनमोहक होते हैं। किसी बगिया की भांति, जिसमें कुछ फूल सुबह जल्दी खिलते हैं, कुछ धूप आने पर खिलते हैं और कुछ को खिलने में समय चाहिए। बहू की भूमिका उस माली जैसी होती है, जो उन फूलों को देखभाल, प्रेम और संयम से सींचती है। बहू सास को अपनी मां की तरह सम्मान देती है, ससुर को पिता का मान, ननद को सहेली का साथ, देवर को भाई का प्यार और पति को परमेश्वर। ऐसे में उसकी ससुराल ‘घर मन्दिर’ बन जाता
है।
गेंदा फूल की तरह नई बहू

देखने में आता है कि गेंदा फूल का हर पूजा, मंगलकार्य और स्वागत में उपयोग होता है। उसमें लम्बे समय तक महकने की क्षमता होती है। गेंदा मुरझाने पर भी रंगत और खुशबू को बरकरार रखता है। बहू भी सादगी, संयम और सहजता से परिवार में रचती-बसती है। वह पूरे घर की शोभा बनती है। गेंदा फूल बारहों मास खिले, तो घर-बगिया में उसकी मनमोहक महक और बढ़ती है।
ससुराल का रंगमंच

ससुराल जीवन का रंगमंच है। परिवार के नये रिश्ते अपनी सशक्त भूमिकाएं निभाते हैं। बहू इस नाटक की नई नायिका होती है। वह अपनी कोमलता में दृढ़ता और अपनत्व में गरिमा समेटे होती है। परिवार उसे ‘परायी’ न मानकर ‘अपनी’ मानता है। ससुराल में प्रेम, समर्पण और त्याग हो, तो
गेंदा फूल की तरह ही सब लोग महकते हैं।
और अन्त में

वास्तव में ‘ससुराल गेंदा फूल’ की नई महक ही होती है। जिन युवतियों की विवाह की तैयारी हो रही हो वे न घबरायें। मन में सकारात्मक सोच रखें। नये रिश्ते का स्वागत करें। माता-पिता में दूरदृष्टि होती है। उनके वैवाहिक निर्णय को हरी झण्डी दिखायें। उनकी इच्छा और खुद की इच्छा को एक कर लें। गृहस्थी के सुखों को पाना आपको है। परिणयसूत्र में बंधना एक सामाजिक व्यवस्था है। परिवार की शिक्षा जीवन को सफल करती है।
“बहू की भूमिका उस माली जैसी होती है, जो उन फूलों को देखभाल, प्रेम और संयम से सींचती है। बहू सास को अपनी मां की तरह सम्मान देती है।”
