ससुराल को गेंदा फूल यूं ही नहीं कहा जाता। नया घर बहु के लिए उस फूल की तरह ही होता है जिसकी हर पंखुरी अलग होती है। वैसा ही कुछ महौल दुल्हन को नए घर में जाकर मिलता है। यानी घर के हर सदस्य का मिजाज अलग होते हैं। जिसमें से सबसे पहला नाम आता सास का। इस रिश्ते में तलामेल बिठाना बहु के लिए खासा मुश्किल होता है।  

रीत-रिवाज से नहीं होती परिचित

घर के रीत-रिवाज की नींव सास होती है। और बहु का सबसे पहला साबका उनसे ही पड़ता है। कई बार बहु के लिए वह रिवाज नए होंते। और कई बार मायके से अलग भी। लिहाजा, उसे वहां के तमाम रीत-रिवाजों को जानने और समझने में वक्त लगता है। साथ ही उसके सामने एक समस्या तब और आती है जब ससुराल के रिवाज मायके से जुदा हो जाते हैं। जबकि सास की सोच कुछ यूं होती है कि बहू को सब पहले से ही मालूम होना ही उसे आदर्श बहू बनाता है। जिसके चलते बहु अक्सर खुद को तर्क-कुर्तक के फेर में फंसा पाती है।

होती हैं अतिरिक्त उम्मीदें

लडक़ी के बेटी से बहु बनते ही उस पर जिस चीज का सबसे ज्यादा बोझ होता है वह है लोगों की उम्मीदों का। बहु, भाभी, चाची, मामी बोलने वाला हर शख्स उससे इस बात की उम्मीद पाल लेता है कि उससे कोई गलती नहीं होनी चाहिए या वह सब कुछ सीख के आई है। कई बार लोगों की यह सोच रिश्तों में फांस की तरह चुभने लग जाती है। और लडक़ी के लिए दुष्वारी खड़ी कर जाती है।

बहु कभी बेटी नहीं होती

बेटी को पैदाइश से बताया जाता है कि मायका उसका घर नहीं है पति का घर ही उसका है। पर अक्सर जब वह पति के घर पहुंचती है तो वहां उसे घर के सदस्य के तौर पर दिल से स्वीकारा नहीं जाता। उसके लिए कुछ अजीबों-गरीब नियम होते हैं। जिसके निभाने के लिए उस पर अनकहा सा दबाव होता है क्यों कि बहु कभी बेटी नहीं हो सकती। कई बार सास बहु से तमाम चीजें बेवजह करवाती है क्यूंकि उसकी सास ने उससे वह काम कराए होते हैं।

तुलना की होती हैं शिकार

बहु, जब हम इस घर में आए तो ऐसा होता था, वैसा होता था। अब तो कुछ भी नहीं होता। गुप्ता जी की बहु को देखो वह कितना काम करती है वह भी मुंह बंद करके। हम तुम्हारी उम्र के थे तो देखो कितना काम करते थे। ऐसे कई मुद्दे हैं जिसको लेकर बहू को तरजू में तौला जाता है।

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