आज भी सास बहू का जिक्र आते ही हम बहू को ‘बेचारी’ और सास को ‘गले की फांस’ की संज्ञा देने में नहीं हिचकते हैं. मगर स्त्री सशक्तीकरण के दौर में आज यह सोच एक मुगालता भर है. पर यदि सच्चे मन से कोशिश की जाये और कुछ छोटी-छोटी बातों का ख़याल रखा जाये, तो इस रिश्ते को भी मधुर बनाया जा सकता है.

बहू के लिए जरूरी बातें

तुलना ना करें

1. बहू को कभी भी सास की तुलना अपनी मां से नहीं करनी चाहिए . जितना समय घर पर रहे घर के कामों में सास का हाथ बटाये. सास के काम की तारीफ करें

जिम्मेदारियां समझे

2. बहू को नौकरी के साथ-साथ इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि उसकी घर के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियां हैं. जिससे वह मुंह नहीं मोड़ सकती.

 दिल पर ना लें

3.बहू को चाहिए जो सास सिखाने की कोशिश कर रही है, उसे मन से सीखे. अपने नौकरी पेशा होने का रोब ना झाड़े. उनकी डांट को मां की डांट समझ कर हलके में ले. दिल से लगाके न बैठ जाये.

रिवाजों को जाने

4. कामकाजी होने का मतलब यह नहीं है कि बहू ससुराल के रीति-रिवाजों से मुंह मोड़ ले. जितना अधिक बहू ससुराल के रीती रिवाजों को अहमियत देगी उतना ही उसका ससुराल में मान बढेगा.

सास के लिए जरूरी बातें

स्पेस दे

1.सास को शादी के बाद बेटे को हर वक़्त अपने नियंत्रण में रखने की बजाय उसे उसको स्पेस देनी चाहिए. छोटी मोटी बातों पर उसकी ज़िन्दगी में दखल न देकर, उसे अपने निर्णय स्वयं लेने दे .

गलती ना निकाले

2.सास को चाहिए कि वो बहू की छोटी मोटी गलती को नज़रंदाज़ करे. उसके काम करने के तरीके या उसकी नौकरी के लिए उसे बार-बार ताना न दें. प्यार से समझाएं.

बहू बेटी सी

3. सास बार-बार बहू की तुलना अपनी बेटी या घर के किसी और सदस्य से ना करें. यह बात बहू के दिल को लग सकती है. हरेक की अपनी अपनी शख्सियत होती है.

उसकी भी सुने

4. कुछ बातों में सास ,बहू  को स्वतन्त्र छोड़ दें. अपने विचार न थोपें. घर में उसे निर्णय लेने का भी अधिकार दिया जाए .बहू की बात सुनी और समझी जाए. सास और बहू दोनों ही भिन्न परिवेश से आती हैं. इस बात का हमेशा ध्यान रखे, और एक दूसरे को समझने की कोशिश करें.

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