भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में स्थापत्य कला ने भी भरपूर योगदान दिया है और उनमें से कुछ तो इतनी अद्भुत हैं कि उनका साम्य संपूर्ण विश्व संस्कृति या स्थापत्य संस्कृति में मिलना मुश्किल है। स्थापत्य संस्कृति के साथ भावनाएं, मूल्य और भारतीय संस्कृति के तत्त्व इस तरह घुले-मिले हैं कि उनके कारण यह कला अपने आप में संपूर्ण पारंपरिक इतिहास का दस्तावेज नजर आती है।

स्थापत्य के इन्हीं अनोखे उदाहरणों में शामिल है हिमाचल के उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र के हृदयस्थल में रावी नदी के किनारे बसे चंबा की पनघट शिलाएं। इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ये पनघट शिलाएं केवल चंबा क्षेत्र में ही प्राप्त हुई हैं। झेलम, व्यास की घाटियों में इनके संकेत भी नहीं मिलते। केवल सिश्शुर (ब्रिटिश लाहुल) में कुछ पनघट शिलाएं अवश्य प्राप्त हुई हैं।

सन् 1839 में कनिधम (भारतीय पुरातत्त्व विभाग का तत्कालीन चॢचत पुरातत्त्व-वेत्ता) जब चंबा पहुंचा तब चंबा के प्राचीन स्मारक, दुर्लभ पुरालेख, सम्मोहक संस्कृति और पनघट शिलाओं के अछूते संसार से पर्दा उठा, कालान्तर में जब भूरि सिंह संग्रहालय की स्थापना हुई तो प्रस्तर कला की प्रतिनिधि संपूर्ण चम्बा क्षेत्र से एकत्र की गई पनघट-शिलाओं को वहां संरक्षित किया गया।

क्या होती हैं पनघट शिलाएं?

जल मानव ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों की प्राथमिक आवश्यकताओं में भी शामिल है इसी कारण नदी, झरने, झील आदि प्राकृतिक स्रोतों के अतिरिक्त जहां-जहां मानव ने स्थायी निवास बनाए वहां-वहां स्थाई जल स्रोत हेतु कुएं बनवाने की परंपरा प्रारंभ हुई। मैदानी भाग के इन कच्चे-पक्के कुओं के अतिरिक्त पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत भी उपलब्ध थे। इन स्रोतों के आसपास का क्षेत्र पनघट कहलाता है। इन्हीं पनघटों को कलात्मकता एवं प्रस्तर कला से अलंकृत करने का कार्य चंबा क्षेत्र में परंपरा के रूप में विकसित हुआ। विशेष बात यह है कि इन्हें शासक वर्ग द्वारा कम मगर समृद्ध जनों द्वारा अधिक संख्या में बनवाया गया। चंबा राजाओं के आधिनस्थ विभिन्न क्षेत्रों के राणा और ठाकुर अपने कुटुम्ब की दिवंगत आत्माओं की स्मृति में इस परंपरा का निर्वाह करने में अग्रणी हैं।

पनघट शिलाओं का रूप

पनघट को ग्राम्य स्थल में सार्वजनिक लघु सभा स्थल के रूप मेें भी प्रयोग किया जाता था। बैठने के लिए एक विशेष स्थल बनाया जाता था। इस पनघट स्थल को बड़ी-बड़ी शिलाओं से इस प्रकार सजाया जाता था कि इस प्रस्तर फलकों के मध्य में एक वर्गाकार जगह खुली छोड़ दी जाती थी जिसमें से होकर पानी का प्रवाह बाहर जाता था। शिलाओं के पीछे जलकुंड बनाया जाता था। पहले पानी मूल स्रोत से जलकुंड में आता था, ठहरता था फिर प्रस्तर के परनाले से बाहर निकलता था। इन शिला खंडों को विभिन्न प्रकार के चित्रों से उत्कीर्ण कर अलंकृत किया जाता था।

इन पनघट शिलाओं की लिपि शारदा लिपि है। इन लिपियों में प्रस्तुत लेखों से ज्ञात होता है कि इन्हें अपने पूर्वजनों या दिवंगत प्रियजनों की स्मृति को समर्पित  किया जाता था।

क्या उत्कीर्ण हैं इन पनघट शिलाओं पर

यूं तो प्रत्येक पनघट शिला उत्कीर्ण कला का सुन्दर उदाहरण है किंतु इन शिलाओं में उत्कीर्ण देव प्रतिमायें श्रद्धा एवं परंपरा के साथ-साथ हमारी संस्कृति के स्थायी तत्व उत्सव धर्मिता को भी प्रदर्शित करती हैं। उत्तरी क्षेत्र की पनघट शिलाओं पर उत्कीर्ण प्रधान देवता जल के देवता वरुण हैं और दक्षिणी क्षेत्र की पनघट शिलाओं पर मूल देवता अनन्तशायी विष्णु हैं। इन दो प्रधान देवों के अतिरिक्त गंगा, यमुना, विष्णु के दशावतार एवं वृषभ वाहन शिव भी इन शिलाओं पर अंकित हैं। दिवंगत आत्माओं एवं पितरों को भी इन शिलाओं पर स्थान मिला है। घुड़सवार, धनुर्धारी, खड़गधारी योद्धा, पनिहारिन आदि भी इन पर उत्कीर्ण हैं। स्पष्टत: इन पनघट शिलाओं में जल एवं जल से संबंद्घ देव-प्रतिमाओं को ही प्रधानता दी गई है। जल को यहां संपूर्ण सृष्टि का स्रोत माना गया है। जीवन, चेतना एवं जल से संबंध प्रतीकों को इन पनघट शिलाओं पर पर्याप्त स्थान मिला है। नाग, कमल, हंस, कल्पलता, हाथी, बसंत पट्टिका आदि जल से संबंधित प्रतीक इन पर बड़ी कुशलता से अंकित किए गए हैं। नाग मैथुन, विपरीत मुखी हंस, कालहंस, मुक्तालोभी राजहंस, हाथियों की जल क्रीड़ा आदि सभी कुछ तो इन शिलाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा है।

चन्द्रभागा की ऊपरी उपत्यका  (घाटी)  में पांगो के क्षेत्र में दो महत्त्वपूर्ण पनघट शिलाएं प्राप्त हुई हैं। इनमें से एक सेचूनाला के निकट साहली में एवं दूसरी पाडर की सीमा में लुंज गांव में मिली हैं। चंबा के उत्तर-पश्चिमी भाग चुराह डडवार, सेई, लोह टिकरी आदि स्थलों से प्राप्त नमूने भी चंबा के भूरी सिंह संग्रहालय में संरक्षित हैं।

चंबा के भूरी सिंह संग्रहालय में संग्रहित ये पनघट शिलाएं साज-सज्जा का अनुपम उदाहरण हैं। उदाहरणार्थ एक पनघट शिला के मध्य में वरुण एवं चारों ओर आलिंगन बद्ध सर्पों के चित्र हैं। इस शिला को (शिलालेखानुसार) भोग नामक ब्राह्मण द्वारा अस्तित्व के व्याप्त भय के कारण स्थापित किया गया था। दूसरी शिला में राणा फाही को शिवलिंग का पूजन करते दिखाया गया है। फाही के एक हाथ में घंटी एवं दूसरे में धूपदान है। शिवलिंग के दूसरी ओर राणा की पत्नी चौरी लिए खड़ी है। उरुर वरुण देव का चित्र है। यह 1170 ई. का है।

दो अन्य शिलाएं सती शिलाएं हैं। पानी के प्राकृतिक स्रोतों पर इन शिलाओं को लगाना जन आस्था एवं लोक विश्वास का सम्मिलित परिणाम है। किंतु शताब्दियों पुरानी यह पनघट-शिलाएं संस्कृति और प्रस्तर कला की ऐसी धरोहर हैं जो केवल इसी क्षेत्र में प्राप्त होती हैं। चंबा का यह क्षेत्र क्योंकि बाहरी आक्रमणों से सदैव सुरक्षित रहा अत: यह धरोहर यहां अपने मूल रूप में मौजूद है। निश्चय ही कनिधम एवं पुरातत्त्ववेत्ता फोगल को इस धरोहर को संरक्षित करने के प्रयासों के लिए इतिहास हमेशा ही स्मरण करता रहेगा।

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