Mojo folk music traditions and cultural expressions
Mojo Folk Music – Rhythms rooted in heritage

Summary: मौजो की लोकगाथा: राजस्थान की रेत में बसी सांस्कृतिक धरोहर

मौजो की लोकगाथा राजस्थान की लोकस्मृति, प्रेम और संघर्षों की झलक है। संगीत और कथाओं से सजी यह परंपरा समाज की सांस्कृतिक धरोहर और सामूहिक भावनाओं को जीवंत करती है।

Rajasthan Culture and Music: राजस्थान की रेतिली धरती सिर्फ किले और हवेलियों के लिए ही मशहूर नहीं है बल्कि यहाँ की लोकगाथाएँ और संगीत परंपराएँ भी उतनी ही समृद्ध और जीवंत हैं। मरुभूमि की कठिन जीवन परिस्थितियों में भी लोग अपने दुख-सुख को गीतों और कथाओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इन्हीं में से एक है “मौजो की लोकगाथा” जो प्रेम, त्याग और सामाजिक संघर्षों को दर्शाने वाली अद्वितीय परंपरा है। मौजो की गाथा सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि राजस्थान समाज की स्मृति और सांस्कृतिक धरोहर का भी हिस्सा है।  मौजो की लोकगाथा और उससे जुड़ी संगीत परंपरा की कुछ बातें जिसे हर किसी को जानना चाहिए। 

Maujo folktale reflecting culture and village roots
Maujo – Stories rooted in community

मौजो की लोकगाथा राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों, खासकर जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर के ग्रामीण इलाकों में गाई जाती है। इसमें मौजो नामक एक वीरांगना की कहानी है जिसने अपने स्वाभिमान और प्रेम के लिए समाज के नियमों का सामना किया। यह गाथा स्त्रियों की शक्ति, उनकी पीड़ा और संघर्ष को उजागर करती है। ग्रामीण समाज में इसे औरतों की आवाज़ माना जाता है, जो कठोर पितृसत्ता के बीच भी अपनी जगह बनाने का साहस रखती हैं। इसलिए यह गाथा नारी अस्मिता का प्रतीक भी मानी जाती है।

मौजो की गाथा पारंपरिक रूप से भाट, चारण और मांगीलाल जैसे लोकगायक समुदायों द्वारा गाई जाती है। गायक अपनी आवाज़ के उतार-चढ़ाव से कथा को नाटकीय रूप देते हैं। इसे गाते समय हारमोनियम, ढोलक और सरंगी जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है। खास बात यह है कि गायक अक्सर रातभर जागरण कर इस गाथा का गायन करते हैं ताकि श्रोताओं को पूरी कथा सुनाई जा सके। इस शैली में गायक कभी-कभी श्रोताओं से संवाद भी करते हैं, जिससे कथा जीवंत हो उठती है।

Music as expression of emotions and universal language
Music – Emotions woven into sound

मौजो की गाथा केवल कहानी नहीं है बल्कि संगीत में गहरी भावनाओं का संगम भी है। गीतों में कभी प्रेम की कोमलता होती है तो कभी विद्रोह का स्वर। लय और ताल इतनी प्रभावशाली होती है कि श्रोता स्वयं को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। इसमें राग मारवा और राग देसी जैसे सुरों का प्रयोग प्रचलित है जो मरुभूमि की वीरानी और संवेदनशीलता को प्रकट करते हैं। इस तरह मौजो की लोकगाथा राजस्थान की संगीत परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जहाँ संगीत भावनाओं को जीवंत बना देता है।

मौजो की गाथा केवल अतीत की कथा नहीं है बल्कि लोकसंस्कृति का जीवंत संग्रह भी है। ग्रामीण मेले, शादी-ब्याह और सामाजिक आयोजनों में इसे सुनाना एक परंपरा बन चुकी है। यह गाथा आने वाली पीढ़ियों को उनके इतिहास, संघर्ष और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है। मौजो का चरित्र लोककथाओं के माध्यम से समाज को यह संदेश देता है कि स्त्री केवल गृहस्थी की धुरी नहीं बल्कि संघर्ष और साहस की मिसाल भी है। आज के समय में जब लोककला धीरे-धीरे सिमट रही है मौजो की गाथा हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को संजोने का महत्व याद दिलाती है।

इस तरह से हम कह सकते हैं कि राजस्थान की मरुभूमि में मौजो की लोकगाथा और उससे जुड़ी संगीत परंपरा केवल एक कला रूप नहीं बल्कि जीवन जीने की प्रेरणा है। यह गाथा स्त्री शक्ति, प्रेम और विद्रोह की आवाज़ बनकर उभरती है और संगीत इसकी आत्मा है। मौजो की परंपरा हमें बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी लोकसंगीत और गाथाएँ समाज को सहारा देती हैं और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखती हैं।

संजय शेफर्ड एक लेखक और घुमक्कड़ हैं, जिनका जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में हुआ। पढ़ाई-लिखाई दिल्ली और मुंबई में हुई। 2016 से परस्पर घूम और लिख रहे हैं। वर्तमान में स्वतंत्र रूप से लेखन एवं टोयटा, महेन्द्रा एडवेंचर और पर्यटन मंत्रालय...