Mother Life Strugle: मां, जो आज अपने पुत्र को संस्कार देगी, कल बड़ा होकर वही किसी का पति बनेगा और तब अगर वह अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है तो यह पराजय मां की है
पिछले दिनों व्हाट्सएप पर एक लघु फिल्म देखी, दो नन्हे-नन्हे 4-5 वर्ष के बच्चे, एक बालक व एक बालिका, बड़ी मासूमियत से कमरे में बैठे अपने माता-पिता से कहते हैं- ‘पापा वी आर गेटिंग मैरिड टूडे माता-पिता हंसकर पूछते हैं- ‘क्या? और दोनों के माता-पिता हंसी-हंसी में कहते हैं और शादी के बाद क्या करोगे? वो बच्चा कहता है- ‘मैं सुबह उठूंगा, पापा जैसे रेडी हो कर ऑफिस जाऊंगा, मान्या मुझे लंच देगी। ऑफिस में काम करूंगा और बहुत पैसे मिलेंगे। मित्र परिवार जो बालिका के माता-पिता हैं पूछते हैं- ‘और मान्या क्या करेगी?घर में काम करेगी। बालक कहता है।
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मां-पिता पूछते हैं- ‘अच्छा और घर आकर तुम क्या करोगे और बालक का उत्तर था- ‘मैं गुस्से में घर आऊंगा और फिर मान्या को मारूंगा, फिर धड़ाम से दरवाजा बंद करूंगा और सो जाऊंगा। हंसते मुस्कराते सभी बड़े लोगों के चेहरे बुझ जाते हैं, कमरे में मौन पसरा है। तभी छोटी सी बालिका मान्या कहती है, ‘नहीं-नहीं, मैं आपके लिए खाना लाऊंगी और आप जोर से थाली फेंक देंगे। माता-पिता को काटो तो खून नहीं वाली परिस्थिति के साथ कैप्शन था- वुमेन सेफ्टी बिगिन्स एट होम, यानि महिला सुरक्षा घर से शुरू होती है। एक अन्य लघु फिल्म में एक युवती ब्यूटी पार्लर जाकर कहती है, ‘मुझे बाल कटवाने हैं।अरे आपके बाल इतने सुंदर हैं, घने हैं और आप कटवाना चाहती हैं? थोड़े से ट्रिम कर दूं क्या?युवती गर्दन हिला कर कहती है, ‘नहीं, काट कर छोटे कर दो। ब्यूटिशियन थोड़े काट कर आईना दिखाती है, तो युवती कहती है, ‘और छोटे। यही क्रम कुछ देर चलता है और बाल कानों तक रह जाते हैं, ब्यूटीशियन आईना दिखाती है, तो युवती अपने ही बाल खींच कर कहती है, ‘काट कर इतने छोटे कर दो कि पकड़ कर खींचे न जा सकें। दोनों फिल्मेंकितना बड़ा प्रश्नचिह्नï छोड़ जाती हैं भारतीय समाज की चेतना पर। यह मानसिक दिवालियापन ही तो है जो स्त्री का शारीरिक शोषण करता भी है व होने भी देता है।
हम बात करते हैं रामराज्य की, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम अपनी सगर्भा अर्धांगिनी को वन में छोड़ आने का आदेश अपने ही भाई को देते हैं। हम मानते हैं गीता को महानतम ग्रन्थ जो महाभारत का ही एक अंश है, वही महाभारत जिसमें अम्बा, कुंती, सत्यवती, गांधारी, द्रौपदी पग-पग पर छली गई व छलने वाले थे उनके ही अपने पति, देवर, भाई यहां तक कि पिता भी। और फिर ये तो कलयुग है। एक छोटी सी कहानी और पढ़ी मैंने- एक गांव के बाहर एक व्यक्ति ने पूछा, आप यहां क्यों प्रतीक्षा कर रहे हैं? तो वह बोला, भाई मुझे जाना है बहुत दूर, दस मील पर। प्रश्नकर्ता ने कहा, तो उठते क्यों नहीं? वह बोला, दरअसल मेरी लालटेन बहुत छोटी है, कुल 3-4 फुट तक ही रोशनी जाती है, दस मील का अंधेरा इतनी छोटी लालटेन से कैसे तय करूं? उसने कहा, पागल! तू उठ और चल। क्योंकि जब तू चलेगा तो तीन फुट रोशनी तेरे साथ-साथ आगे बढ़ेगी। बैठा रहेगा तो तेरी यात्रा कभी शुरू ही न हो सकेगी। चलेगा तो यही लालटेन हजारों मील की यात्रा करा देगी।
क्या यही वस्तुस्थिति हमारे समाज की नहीं? हम सब बुद्धिमान हैं और सारी स्त्रियां, मातृशक्ति तो हर हाल में पुरुषवर्ग से श्रेष्ठ है ही। फिर भी भारतीय चैतन्य की दुर्दशा तो देखिए, किसी एक दिन का अखबार बलात्कार, घरेलू हिंसा, चाइल्ड अब्यूज़, ऐसिड अटैक, अपहरण की घटनाओं के बिना छपता नहीं। टीवी चैनल पर बड़े-बड़े राजनेता, चिंतक, विचारक, समाजसेवी प्रतिदिन बढ़ते अपराध व महिला सुरक्षा पर घंटों वादविवाद करते हैं। हर कोई जानता है कि इलाज क्या है फिर भी लालटेन वाले गणित की तरह घंटों, दिनों, महीनों, वर्षों से हर गलत को बस सहते जाते हैं। जो होना चाहिए, उसे छोड़ अभी जो हो सकता है उसे करने में वे लग जाते हैं। ऐसे ‘हम कुछ कर रहे हैं ये भ्रम भी बना रहता है और समय भी बीतता जाता है। वस्तुत: समाज के सुधरने का मार्ग उसी कहानी की तरह चाहे जितना भी लंबा हो, कठिन हो, आज हर स्त्री को उस पर चलना शुरू करना ही होगा। और इसके लिए चाहिए दृढ़ संकल्प व श्रम। पहला कदम मां को ही उठाना है, वही है पहली शिक्षिका जो आज अपने पुत्र को संस्कार देगी। प्रश्नचिह्नï है हर मां पर, कि अब नहीं तो कब?
