Positive Parenting: बच्चे आपकी परवरिश का आइना होते हैं। उनका व्यवहार, भाषा, एक्टिविटी इस बात को दिखाती हैं कि आप उन्हें क्या सिखा रहे हैं। बचपन से ही आप बच्चों में संस्कार की जो नींव डालेंगे, वही आगे चलकर सामाजिक कौशल और व्यवहार की इमारत खड़ी करेगी। कई बार हम बच्चों की गलत भाषा पर हंसते हैं या फिर उसे मजाक में लेते हैं, लेकिन ऐसा करना गलत है। चलिए आज जानते हैं हर पेरेंट्स के लिए जरूरी यह परवरिश का पाठ।
नींव मजबूत रखना जरूरी

जब बच्चे की उम्र दो से तीन वर्ष की होती है तो वह बहुत तेजी से बातें सीखने और उन्हें रिपीट करने लगता है। इसलिए इस समय को बहुत ही समझदारी से काम लें और अपने व्यवहार से बच्चों का पूरा विकास करें। आपने छोटी उम्र में बच्चों को जो कुछ भी सिखाया है, चार से पांच साल की उम्र में उसका अभ्यास करवाना न भूलें। ऐसा करने से न सिर्फ बच्चे की नींव मजबूत होगी बल्कि उसकी पर्सनालिटी भी निखरेगी। भूलकर भी बच्चों की गलत बातों को मजाक में लेकर उनपर हंसे नहीं। ऐसा करने से बच्चा सही और गलत का भेद समझ नहीं पाएगा।
बचपन से ही सिखाएं अनुशासन

पाॅजिटिव पेरेंटिंग की पहली सीढ़ी है अनुशासन यानी डिसिप्लेन। बच्चे के हर काम का समय निश्चित करें। सोने, जागने से लेकर उसके कहानी सुनने, खेलने तक का समय तय करें। कोशिश करें कि आप इसे फाॅलो करें। डेढ़ साल की उम्र से ही बच्चों को अक्षर ज्ञान देना शुरू करें।
इस बात का रखें ध्यान: बच्चे जो देखते हैं, वैसा ही करते हैं। इसलिए आप भी खुद में किताबें और अखबार पढ़ें। टीवी, मोबाइल और सोशल मीडिया से दूरी बनाएं। बच्चे को पढ़ने के लिए कहकर आप खुद मोबाइल पर बिजी रहेंगे तो बच्चा आपकी बात नहीं सुनेगा। वे अनुशासित भी नहीं होंगे। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत खुद से करें।
बच्चों को करवाएं वातावरण का अनुभव

बच्चों को सिर्फ घर और गार्डन तक ही सीमित न रखें। उन्हें बाहर की दुनिया देखने का मौका दें। उन्हें सब्जी वाले से लेकर, माली, दुकानदार, मेड आदि दिखाएं। उनके विषय में सकारात्मक बातें बताएं। उन्हें गार्डन में झूला झुलाने के साथ ही पशुु-पक्षी दिखाएं, उनकी आवाजों से परिचय करवाएं। ये प्रैक्टिकल नॉलेज आपके बच्चों को हमेशा दूसरों से आगे रखेगी। साथ ही वे दूसरों का सम्मान करना भी सीखेंगे।
इस बात का रखें ध्यानः बच्चों के सामने किसी भी शख्स का मजाक न बनाएं, न ही उन्हें नीचा दिखाएं। बच्चे को हर किसी का सम्मान करने की सीख दें। अपने संबोधन पर भी विशेष ध्यान दें। काका, बाबा, चाचा, दादी, दीदी जैसे शब्द बच्चों के सामने बोलें, जिससे वे दूसरों को सम्मान देना सीखें।
संवाद है जरूरी

संवाद वो कड़ी है जो आपको अपने बच्चे से जोड़ती है। आप घर के काम करते हुए भी बच्चे से बाते करते रहें। बार-बार उनका नाम पुकारें। आप क्या कर रही हैं उन्हें बताती रहें। बातचीत के दौरान उन्हें पापा का नाम, मम्मी का नाम, दादा, दादी, नाना, नानी, मामा, चाचा, भैया सबका नाम बताती रहें। ऐसा करने से बच्चा बहुत ही बातें अपने आप सीख जाएगा।
इस बात का रखें ध्यानः संवाद जीवन के हर मोड़ पर आपकी जरूरत है। जब आप बच्चे से लगातार संवाद करेंगे तो यह कौशल उसमें भी विकसित होगा, जो आगे चलकर उसके बहुत काम आएगा।
खेल-खेल में करवाएं भाषा ज्ञान

भाषा का ज्ञान आप बच्चों को जितनी जल्दी करवा देंगे, उतना ही अच्छा उनका बौद्धिक विकास होगा। उन्हें छोटी-छोटी कविताएं सिखाएं। हिंदी और इंग्लिश के साथ ही अपनी लोकल भाषा भी उन्हें सिखाएं। उन्हें कविताएं रिपीट करने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे बच्चों की भाषा का ज्ञान बढ़ेगा।
इस बात का रखें ध्यानः भाषा का ज्ञान होना बच्चे के संवाद ही नहीं बौद्धिक विकास पर भी असर डालता है। शोध बताते हैं कि जो बच्चे ज्यादा भाषाएं जानते हैं, वे ज्यादा कुशाग्र बुद्धि के होते हैं। ऐसे में कोशिश करें बच्चों को कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञान हो।
