Tone of Voice in Parenting
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Summary: टीन के साथ एक वाक्य, अलग टोन के साथ अलग असर

टीनएजर माता-पिता के शब्दों से अधिक उनके टोन, हाव-भाव और व्यवहार से खुद को समझा या अनदेखा महसूस करते हैं।

Tone of Voice in Parenting: अक्सर माता-पिता सोचते हैं, हम अपने बढ़ते हुए बच्चे का अच्छे से ख्याल रख रहे हैं। उन्हें बहुत प्यार करते हैं। उन्हें डांटते या पीटते भी नहीं, फिर क्यों हमारा टीनएजर बच्चा हमसे दूर-दूर रहता है। क्यों हमसे अपनी बातें साझा करने से डरता है। अगर आपको भी लगता है, आपका टीनएजर बच्चा आपसे दूरी बनता है या सामना करने से बचता है तो इसका कारण आपके शब्दों से ज्यादा उसे कहने के तरीके में छुपा है। आईए जानते हैं, इस लेख में किस तरह टीनेजर पर पेरेंट्स के शब्दों से ज्यादा उनके टोन और बॉडी लैंग्वेज का प्रभाव पड़ता है।

टीनएज के दौरान बच्चा बहुत से बदलावों से गुजरता है। इस उम्र में बच्चा बहुत संवेदनशील होता है। क्योंकि बच्चे के मस्तिष्क का वह हिस्सा जो भावनाओं को समझता है तेजी से विकसित होता है। यही कारण है कि बच्चा टीनएज में भावनात्मक रूप से ज्यादा उग्र हो जाता है।

टीनएज में बच्चा स्वयं के स्वतंत्र पहचान की खोज करता है। यही कारण है कि इस समय कहे गए हर बात को वह अपने आत्मसम्मान से जोड़कर देखा है।

किस तरह से माता-पिता के बोले गए शब्द का असर टोन के साथ बदल जाता है आइए समझते हैं उदाहरण से

Tone of Voice in Parenting
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यहां एक वाक्य है ‘मैं तुम्हारी भलाई के लिए कह रहा हूं, ज्यादा फोन मत देखो’

अगर इस बात को माता-पिता तेज आवाज, तिरछी नजर और चिल्लाकर कहे तो बच्चा इसमें अपनी भलाई देखने से पहले देखता है अपने ऊपर लगी पाबंदी को, माता-पिता के गुस्से को। इस स्थिति में टीनएजर खुद पर हमेशा कंट्रोल महसूस करता है।

अगर माता-पिता इसी वाक्य को शांत, नम आवाज में बच्चों के पास जाकर, उसके सर पर प्यार भरा हाथ रखते हुए कहे तो इस समय भी बच्चा आपके शब्द से ज्यादा आपके टोन पर ध्यान देता है। पर इस बार बच्चे की समझ में आप उसे प्यार करते हैं। उसके लिए चिंतित है, इसलिए आप उसे समझा रहे हैं।

माता-पिता की नजरों में उनके 12 से 13 साल का बच्चा अभी नासमझ होता है। पर सच यह है कि वह शुरुआती टीनएज में कदम रख चुका है। अब उसका दिमाग लोगों के हाव-भाव को समझता है। आइए कुछ उदाहरण से समझते हैं, किस तरह बच्चा पेरेंट्स के बॉडी लैंग्वेज को समझता है।

जब बच्चा आपको कुछ बता रहा हो, तो उसे सुनने की बजाय किसी काम में व्यस्त होना। इससे बच्चा समझता है, उससे ज्यादा आपके लिए काम जरूरी है।

बच्चों की बात सुनने के बाद भी जवाब ना देना। इससे बच्चा समझता है, आप उसे समझना ही नहीं चाहते।

बच्चों के सामने खड़े होकर उससे तेज आवाज में बात करना। इसे बच्चा आपकी शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखता है।

क्या ना करें: पेरेंट्स अक्सर अनजाने में बच्चों से कह देते हैं तुम्हें कुछ समझ नहीं आता। तुम हमेशा ऐसी गलती करते हो। इस तरह के शब्द बच्चों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाते हैं।

बच्चों की बात सुनने से पहले अपना फैसला देना या फिर उन्हें बात पूरी न करने देना बच्चों के अंदर इस सोच को जन्म देता है कि उसके पेरेंट्स द्वारा उसे सुना ही नहीं जाता।

पेरेंट्स क्या करें: बच्चों के सामने बैठकर शांत और नरम भाषा में बातचीत करें। अपनी बात रखने के साथ बच्चे को सुनने का धैर्य दिखाएं। जब बच्चा आपको कुछ कह रहा हो और आप व्यस्त हो तो उससे निवेदन भरे शब्दों में कहें, बेटा क्या हम 10 मिनट के बाद बात करें। मैं जब तक फ्री हो जाऊंगा आपकी बात सुनने और समझने के लिए।

निशा निक ने एमए हिंदी किया है और वह हिंदी क्रिएटिव राइटिंग व कंटेंट राइटिंग में सक्रिय हैं। वह कहानियों, कविताओं और लेखों के माध्यम से विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। साथ ही,पेरेंटिंग, प्रेगनेंसी और महिलाओं से जुड़े मुद्दों...