Parenting Mantras: पेरेंटिंग के 5C’s देखभाल, जुड़ाव, नियमितता, संवाद और आत्मविश्वास बच्चों की सही परवरिश का एक मजबूत और प्रभावशाली आधार साबित हो सकते हैं। ये पांच तत्व बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
हर मां-बाप चाहते हैं कि उनका बच्चा खुश, समझदार और आत्मनिर्भर बने। लेकिन आज के समय में जब सब कुछ तेजी से बदल रहा है, सही परवरिश करना एक बड़ी चुनौती लगता है। ऐसे में अगर हमें कुछ मूलभूत सिद्धांत मिल जाएं, जो हमारी सोच को दिशा दें, तो चीजें, आसान हो सकती हैं।
इस लेख में जानेंगे पेरेंटिंग के 5C’s की जो हर माता-पिता के लिए एक मजबूत आधार
बन सकते हैं
केयर यानी देखभाल
परवरिश का पहला और सबसे अहम हिस्सा। देखभाल का मतलब सिर्फ खाना पीना या कपड़े देना नहीं है, बल्कि बच्चे की भावनात्मक जरूरतों का याल रखना भी उतना ही जरूरी है। जब बच्चा उदास
हो, डरे या हार जाए तब हम सिर्फ डांटने या ‘रो मत’ कहने के बजाय अगर उसका हाथ पकड़कर कहें, ‘पता है बेटा, मैं भी कभी हारता था, लेकिन फिर दोबारा कोशिश करता था’ तो बच्चा खुद को अकेला नहीं महसूस करता। हमारी यह संवेदनशीलता ही असली देखभाल होती है।
कनेक्शन यानी जुड़ाव

हर रिश्ते की जान, और पैरेंटिंग की रीढ़। बच्चा तभी आपसे खुलेगा जब उसे लगेगा कि आप सिर्फ उसकी निगरानी नहीं कर रहे, बल्कि उसके साथी हैं। अगर आप रोज बस 10-15 मिनट फोन रखकर, टीवी बंद करके सिर्फ उसकी बातें सुनें जैसे- ‘आज स्कूल में सबसे मजेदार क्या हुआ?’ तो ये
छोटा-सा संवाद उसके दिल में एक गहरा रिश्ता बना देता है। जब बच्चा महसूस करता है कि आप उसकी छोटी-छोटी बातों में रुचि लेते हैं, तो वह आपके करीब आता है। कंसीस्टेंसी यानी नियमितता
बच्चे बहुत जल्दी नोटिस करते हैं कि मां-पापा कब क्या कह रहे हैं। अगर आज आप कहते हैं ‘टीवी सिर्फ 30 मिनट चलेगा’ और कल 2 घंटे चलने देते हैं, तो बच्चा समझ जाता है कि नियम गंभीर नहीं हैं। इससे उसका अनुशासन भी प्रभावित होता है। इसलिए जरूरी है कि जो नियम बनाएं, वो
हर दिन एक जैसे रहें। इससे बच्चे को स्पष्टता और सुरक्षा दोनों का एहसास होता है।
कयूनिकेशन यानी संवाद
आजकल बच्चे ढेर सारी बातें महसूस करते हैं, लेकिन अक्सर उन्हें कह नहीं पाते। ऐसे में अगर माता-पिता डांटने की बजाय बात करने का तरीका अपनाएं तो बहुत बदलाव आ सकता है। जैसे अगर बच्चा बार-बार मोबाइल मांगता है, तो उसे झिड़कने की बजाय शांति से कहें , ‘मुझे पता है तु हैं गेम पसंद है, लेकिन अभी आंखों को आराम चाहिए। चलो, रात को 10 मिनट साथ में खेलते हैं।
ऐसा संवाद बच्चा कभी नहीं भूलता।
कॉन्फीडेंस यानी आत्मविश्वास
यह वो उपहार है जो अगर आप बच्चे को दे दें, तो वो जिंदगी की हर चुनौती से लड़ना सीख जाता है। आत्मविश्वास तब आता है जब आप उसकी कोशिश की सराहना करते हैं, गलतियां करने की आजादी देते हैं और हर बार उसे यह यकीन दिलाते हैं कि ‘तू कर सकता है। अगर बच्चा कहे, ‘मुझसे ये मैथ्स का सवाल नहीं होगा तो यह कहना कि ‘तुम हर बार यही कहते हो उसके आत्मबल को गिराता है।
इसके बजाय कहिए ‘कोई बात नहीं, पहली बार में सबको मुश्किल लगता है। मैं हूं न तु हारे साथ।
इन 5C’s को अपनाकर हम अपने बच्चे की नींव इतनी मजबूत बना सकते हैं कि वो जीवन भर आत्मनिर्भर, समझदार और भावनात्मक रूप से संतुलित बना रहे। परवरिश कोई परफेक्ट होने की दौड़ नहीं है, यह एक ऐसी यात्रा है जिसमे ं हर दिन थोड़ी सी समझदारी और बहुत सारा प्यार
चाहिए।
संयुक्त परिवार और एकल परिवार के बीच अंतर
संयुक्त परिवार में बच्चों को कई लोग अपनी-अपनी तरह से देखभाल और सीख देते हैं, जिससे उनकी देखभाल में बहुत विविधता होती है। दादी-नानी, चाचा-चाची के साथ रिश्ते उन्हें भावनात्मक सुरक्षा तो प्रदान करते हैं, लेकिन कभी-कभी ये संवाद में भ्रम पैदा कर सकते हैं, क्योंकि हर किसी
का तरीका अलग होता है। यहां पर माता पिता के लिए नियमितता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि बच्चे कभी दादी से सती देखते हैं तो कभी माता-पिता से ढील। वहीं, जुड़ाव भी हर किसी से गहरा नहीं हो पाता, खासकर अगर परिवार में ज्यादा सदस्य हों।
दूसरी तरफ, एकल परिवार में माता-पिता का एक ही तरीका और नियम होते हैं, जो बच्चे को बेहतर तरीके से समझ में आता है। इस तरह की स्थिति में नियमितता आसानी से बनी रहती है, लेकिन इसका एक पहलू यह है कि बच्चे को केवल एक ही व्यक्ति से सुरक्षा और देखभाल मिलती है, जिससे
कभी-कभी वह अकेला महसूस कर सकता है। हालांकि, जुड़ाव और संवाद में ज्यादा गहराई हो सकती है, क्योंकि बच्चे का ध्यान पूरी तरह से माता-पिता की तरफ होता है। दोनों फैमिली सेटअप में अपने फायदे और नुकसान हैं, लेकिन 5ष्ट’ह्य को समझकर और बच्चों के भावनात्मक और मानसिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हम किसी भी परिस्थिति में उन्हें सबसे अच्छा समर्थन दे
सकते हैं।
सबसे बड़ी भूल तब होती है जब हम बच्चों को सुनने से ज्यादा सिखाने लगते हैं जबकि उन्हें हमारी बातें नहीं, हमारी समझ चाहिए। कई बार हम उन्हें ‘अच्छा इंसान’बनाने के चक्कर में परफेक्ट बनाने का दबाव डालते हैं और वहीं से उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। तब परवरिश एक मिशन नहीं, बोझ बन जाती है।
इन्हें निभा पाना इतना मुश्किल क्यों लगता है
ये पांचों ष्ट कोई अलमारी में रखे कपड़े नहीं, जो एक बार चुने तो बस पहन लिए। ये हर दिन बदलते रिश्ते के धागे हैं। केयर हमें बच्चे के मन से जोड़ता है, कनेक्शन उसे अकेलेपन से बचाता है, कंसिस्टेंसी उसके भीतर स्थिरता लाती है, कयूनिकेश उसे अपनी बात कहने का साहस देती है और कॉन्फिडेंस उसे उड़ान भरने की हिमत। लेकिन इन्हें निभाना आसान नहीं। हमारी थकान, समय की कमी, काम का दबाव, रिश्तों की उलझनें सब मिलकर हमारे अंदर की पैरेंट को थका देते हैं। कई बार हम खुद ही बिखरे होते हैं, ऐसे में बच्चे को संबल देना चुनौती लगता है। मगर याद रखिए, यह कोशिश ही सबसे बड़ी जीत है। जब हम परफेक्ट नहीं, पर प्रेजेंट होते हैं तो बच्चा हमें हीरो नहीं, ह्यूमन मानता है और वहीं से असली परवरिश शुरू होती है।
“सही मायनों में परवरिश तब होती है जब हम बच्चे के साथ बड़ा नहीं, उसके साथ-साथ खुद भी थोड़ा बेहतर इंसान बनने की कोशिश करते हैं।”
