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ओशो अस्तित्व की एक अभिव्यक्ति हैं: Osho Life
Osho Life Journey

Osho Life: ओशो से मिलना एक ही शर्त पर होगा- आईना हो जाओ। फिर दो आईने मिलेंगे-इनफिनिट एम्प्टीनैस-अनंत शून्यता। मेरी नजर में ओशो मतलब ‘ओशो’ है। ओशो स्वयं में तलाश हैं तथा हासिल भी हैं उस तलाश का। मेरे लिए ओशो एक पढ़ा हुआ या छपा हुआ शब्द नहीं हैं वह एक जाना हुआ शब्द हैं।
ओशो मुझे हमेशा अस्तित्व की एक अभिव्यक्ति लगे हैं: ‘ह्यूमन वैल्यूज’ का एक गुच्छा। वे एक अमूर्त कवि हैं। ‘ही वॉज ए ग्रेट थिंकर ऑफ आवर टाइम।’
एक कसक सी होती है मुझे कि हमारे वक्त में इतनी बड़ी हस्ती गुजर गई और हमने ध्यान नहीं दिया। बाद में जाकर, एक सदी के बाद हम तलाश करेंगे कि वे क्या थे? ओशो कलाकारों के रहनुमा हैं, रहबर हैं। वे भीतर रचनात्मक ऊर्जा को जगाते हैं। उनको सुनें या उनको पढ़ें तो ऐसा लगता है, जो रचनात्मक लोग हैं उनके लिए ही ये रहनुमा पैदा हुए हैं। ये उन्हीं की रहबरी कर रहे हैं। वे उन्हीं अमूर्त अवकाश की तरफ ले जाने वालों में से हैं। वे उनके भगवान नहीं हैं जो दुनियावी ख्वाहिशें पूरी करवाने के लिए आते हैं कि मुझे नौकरी चाहिए तो भगवान के पास जाकर एक ताबीज बनवा लिया जाए। मैं उन्हें रहबर कहता हूं, क्योंकि परमात्मा की हमारी परिभाषा बिलकुल अलग है। हमारे लिए परमात्मा शरीर में नहीं होता और ये मसीहा शरीर में जीते हैं। इनकी शक्ल-सूरत होती है। ये रहनुमा हमारे सामने होते हैं जिनको हमने छुआ, सुना, देखा-कभी उनकी आवाज से, कभी उनके अल्फाज से, कभी उनके ख्याल से।
मुझे जब भी उनका ख्याल आता है तो उनकी आवाज के अलावा उनका एहसास जरूर साथ में आता है। अगर आपके दिमाग के तसव्वुर के, ख्यालात के एंटीना खुले हों तो आप उन्हें महसूस करने लगते हैं। वे आपके पास उसी तरह आते हैं जिस तरह आप चाहते हैं- ध्वनि की तरह, मौसिकी की तरह। उनके साथ एक बड़ी खूबसूरत बात यह है कि जब वे आपको खुदा की खोज करने के लिए कहते हैं तब वे आपको खुद की ही तलाश में भेज रहे होते हैं, क्योंकि आप अपनी तलाश में जो निकलते हैं तो वह दरअसल ‘उसी’ की तलाश होती है, क्योंकि उसको तलाश करके अपने अंदर शामिल कर लेना अपने आप में एक वर्तुल है, एक प्रक्रिया है। फिर वे अंतर ध्यान की तरफ ले जाते हैं। ओशो प्रेरित करते हैं और यह राह दिखाते हैं कि अपने अंदर ढूंढो। तुम गलत राह पर तलाश कर रहे हो। यह जो रहनुमाई है, यह ओशो की देन है। एक और बड़ी बात कि हमने साधु के साथ गरीबी को जोड़ा हुआ था, इसे भी तोड़ दिया ओशो ने।
ओशो के साथ जो सबसे खूबसूरत बात मैं महसूस करता हूं वह यह कि उन्होंने किसी एक संप्रदाय की, किसी एक मजहब की तरफदारी नहीं की। ओशो का जो मेडिटेशन रिजॉर्ट है वह न तो हिंदू है, न सिख है, न ईसाई है। मजहब का कोई लेन-देन नहीं है, आज के दौर में यह बात, यह विचार महान बात है। एक ही झोंके से हमें उन्होंने सारे शास्त्रों से आजाद कर दिया। वे कहते हैं-‘आओ, हम इंसान के तौर पर मिलें और एक-दूसरे को खोजें। यह जो एक-दूसरे को पहचानने का सफर है, वह अपने आप में बड़ी गहरी बात है। उन्होंने कोई ऐसी बंदिश या कोई ऐसा अहाता नहीं बांधा कि आप इसको मानते हैं तो इस तरफ आइए और उसको मानते हैं तो उस तरफ चले जाइए।
इसलिए मैं सोचता हूं कि ओशो ने एक अलग विचार, एक अलग फलसफा शुरू किया। मैं मानता हूं कि यह ओशो का मौलिक योगदान है। ओशो के जीवन-दर्शन में यही आलम है। हर मौसम का रस है, हर लम्हें का रस है यहां। ओशो का जीवन-दर्शन रूखा-सूखा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सब बर्दाश्त कर लो और किसी तरह निकल चलो वक्त की सुरंग से। हर सुबह का, शाम का, हर धूप का, छांव का रस है यहां। और कच्ची मिट्टी की दीवार यानी जिस्म। इसकी दूसरी तरफ कोई और है जो सारे रस लेते हुए भी सन्नाटे की तरह बैठा है। मेरे लिए यही ओशो हैं। मेरे लिए यह खुशकिस्मती की बात है कि एक बार मैं उनकी कोई किताब पढ़ रहा था तो हैरान रह गया कि मेरी एक नज्म है जिसे वे एक्स्प्लेन कर रहे थे। मैं बहुत हैरान। विनोद मुझसे मिलने आए तो मैंने उनसे पूछा कि मेरी यह नज्म ओशो केपास कैसे पहुंंची। विनोद बोले कि ‘उनके पास सब कुछ पहुंचता है, और वे सब कुछ पढ़ते हैं। खैर, कैसे पहुंची की बात को छोड़ दें- पहुंची। और उन्होंने अपने प्रवचन में कही। मुझे ऑस्कर तो बहुत बाद में मिला, लेकिन ऑस्कर से बड़ा पुस्कार तो मुझे तभी मिल गया जब ओशो ने मेरी नज्म कही।

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