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चीन में शवों को अंतिम विदाई देना का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। चीन के दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन और उनके परिवार ने इस आधुनिक सोच की नींव रखी।
Eco Friendly Cremation in China: सनातन धर्म के रीति रिवाज हमेशा से ही वैज्ञानिक पैमाने पर खरे उतरे हैं। इन्हीं रिवाजों में शामिल है अंतिम संस्कार। सनातन धर्म मानने वाले लोग शव का दाह संस्कार यानी अग्नि संस्कार करते हैं। इसके बाद अस्थि विसर्जन करके अपने प्रियजनों को विदा किया जाता है। अब चीन भी अग्नि संस्कार की इस परंपरा को अपना रहा है। चीन में शवों को अंतिम विदाई देना का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। क्या है इसका कारण, आइए जानते हैं।
यहां से हुई इसकी शुरुआत
चीन में अंतिम संस्कार का तरीका बदलने की शुरुआत साल 2022 से तेज हुई है। चीन के दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति जियांग जेमिन और उनके परिवार ने इस आधुनिक सोच की नींव रखी। जियांग की मौत के बाद उनकी कोई कब्र नहीं बनाई गई, न ही कोई समाधि पत्थर लगाया है। इसकी जगह शवदाह करके उसकी राख को शंघाई के समुद्र में बहा दिया गया। जियांग के परिवार के इस कदम को चीन में न सिर्फ सराहना मिली। बल्कि अन्य लोगों ने भी इसका अनुसरण करना शुरू कर दिया। खासतौर पर शंघाई के लोगों ने इसे अपनाया।
यह है बदलाव का बड़ा कारण
चीन में अंतिम संस्कार के बदलते ट्रेंड के पीछे सबसे बड़ा कारण है जमीन की कमी और महंगाई। दरअसल, शंघाई में अब कब्रों के लिए जमीन नहीं बची है। शंघाई प्रशासन ने अग्नि दाह की परंपरा को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं भी बनाई हैं। शंघाई में अब दाह संस्कार करने वाले परिवारों को प्रशासन की ओर से 37,000 रुपए दिए जाते हैं।
कब्र पर होते लाखों खर्च
चीन में कब्रों को मेंटेन करना कोई आसान बात नहीं है। यहां एक फैंसी कब्र को 20 साल तक रखने के लिए परिवार को कम से कम 25 लाख रुपए खर्च करने पड़ते हैं। यदि इसके बाद भी कब्र के लिए जगह चाहिए तो आपको और राशि देनी होगी। वहीं ये बात जगजाहिर है कि चीन में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस स्थिति में कब्रों की देखभाल लोगों के लिए आर्थिक बोझ का कारण भी बन रहा है।
सदियों पुरानी परंपरा छोड़ी
चीन में पुरानी परंपराएं बदलना एक बड़ा बदलाव है। ऐसे में अंतिम संस्कार की परंपरा बदलना एक बड़ा परिवर्तन है। चीन की पुरानी कहावत के अनुसार जिन शवों को दफनाने की जगह नहीं मिलती, वह एक अभिशाप होता है। लेकिन जमीन की कमी ने इस सोच को भी बदल दिया है। अब लोग इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि कब्रों के कारण जमीन बर्बाद होती है।
प्रकृति को नहीं होता नुकसान
सत्तारूढ़ दल भी शवों को दफनाने की जगह अग्निदाह करने पर जोर दे रहे हैं। क्योंकि शवों की राख से प्रकृति को नुकसान नहीं होता। बीते साल चीन में करीब पौने दो लाख शवों का अग्निदाह किया गया। हालांकि कुल अंतिम संस्कारों का यह मात्र 3.2% है। फिर भी साल 2019 की तुलना में इसमें 67% तक की वृद्धि देखी गई है। प्रशासन का कहना है कि अग्निदाह के बाद राख को समुद्र में विसर्जित कर सकते हैं। या फिर पेड़ों की जड़ों में या मकान की नींव में डाल सकते हैं।
