Maa Skandmata Katha: नवरात्र की नौ देवियों की अपनी महिमा है। प्रत्येक देवी की अपनी विशेष गौरव गाथा है। नवरात्र की रौनक हर ओर देखने को मिलती है। पूरा देश ही अलग अलग तरह से नवरात्र मना रहा होता है। नवदुर्गा का पंचम रूप है स्कंदमाता। भगवान स्कन्द की माता होने के कारण देवी को स्कंदमाता कहा जाता है। नवदुर्गा के भक्त नवरात्र में व्रत और पूजा कर देवी को प्रसन्न करते हैं। आइए जानते हैं नवदुर्गा की पांचवीं देवी स्कंदमाता के बारे में कि कैसा है स्कंदमाता का रूप,उनका मंत्र और श्लोक।
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स्कंदमाता का रूप
स्कंदमाता की चार भुजाएं है। दो भुजाओं में कमल पुष्प है, तीसरी भुजा से भगवान स्कन्द को थामे हुए हैं और चौथी भुजा वरमुद्रा में है। देवी के मुख पर अत्यंत तेज है। स्कंदमाता कमल के आसन पर विराजमान हैं और सिंह उनका वाहन है। मान्यता है कि नवदुर्गा के पंचम रूप स्कंदमाता की आराधना करने से बुद्धि का विकास होता है इसके साथ ही परिवार में शान्ति भी आती है।
स्कंदमाता की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक ताड़कासुर नामक दैत्य ने पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था सभी देव उससे परेशान थे । उसने घोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान माँगा की उसे अमर होने का वरदान दिया जाए, तभी ब्रह्मा जी ने कहा कि जो पृथ्वी पर पैदा होता है उसे मरना ही होगा। इसपर ताड़कासुर ने वरदान माँगा कि केवल शिव पुत्र ही उसका वध कर सकेगा। क्योंकि ताड़कासुर का ये मानना था कि सती के भस्म हो जाने के बाद महादेव कभी भी विवाह नहीं करेंगे और जब उनका विवाह नहीं होगा तो पुत्र भी नहीं होगा। इसके बाद महर्षि नारद पार्वती से शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की विनती करते हैं। देवी पार्वती और महादेव की ऊर्जा से कार्तिक का जन्म हुआ। कार्तिक का प्रशिक्षण स्कंदमाता ने किया। भगवान कार्तिक ने ताड़कासुर का वध कर दिया। इसके बाद देवी, स्कंदमाता यानि भगवान स्कन्द (कार्तिक) की माता कहलायीं।
स्कंदमाता का श्लोक
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
