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दिवाली से पहले पड़ने वाले पर्वों में धनतेरस भी एक प्रमुख पर्व है। इसे क्यों मनाते हैं तथा क्या हैं इस पर्व से जुड़ी मान्यताएं आइए जानें।

दक्ष प्रजापति की पुत्रियां दिति एवं अदिति का विवाह महर्षि कश्यप से संपन्न हुआ। कश्यप द्वारा दिति से दैत्य एवं अदिति से देवों की उत्पत्ति हुई। ये देव एवं दैत्य सौतेले भाई थे। दोनों में सर्वदा वैमनस्य ही रहता था। शारीरिक शक्ति में दैत्य देवो से कही अधिक बढ़े हुए थे। अनेक बार असुरों ने देवों को स्वर्ग से निकालकर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया था।

देव हमेशा ही असुरों से परास्त होते व अपने रक्षक विष्णु के पास जाकर अपनी रक्षा के लिए गुहार लगाते। एक बार जब देवता सब असुरों से पुन: परास्त हुए तो विष्णु ने उन्हें सम्मति दी की यदि वे वे असुरों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करें तो उससे अनेक रत्न प्राप्त होंगे। साथ ही इस मंथन से अमृत भी प्राप्त होगा। अमृत पी कर देवगण अमर हो जाएंगे और फिर उन्हें असुरों का भय नहीं होगा।

परंतु असुर इस बात के लिए क्यों राजी होते? अत: उन्हें सब देवताओं ने इस बात पर राजी कर लिया कि इस समुद्र मंथन से जो भी प्राप्त होगा उसे देव एवं असुर आवश्यकतानुसार आपस में बांट लेंगे। असुरों को भी अमृत का लोभ हो गया और अंतत: वे देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए।

यद्यपि असुरों को यह अंदेशा था कि विष्णु किसी भी प्रकार अमृत पर उनका अधिकार नहीं होने देंगे फिर भी उन्हें अपनी शारीरिक शक्ति पर आवश्यकता से अधिक विश्वास था। उन्होंने सोचा कि यदि परिस्थिति ऐसी ही आ पहुंची तो वे शक्ति का उपयोग कर देवताओं से अमृत छीन लेंगे। ऐसा ही मन में विचार कर वे देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। इसके बाद सागर मंथन के लिए उपाय किए जाने लगे।

उसके लिए क्षीर सागर को चुना गया। उसमें नाना प्रकार की वनस्पतियां एवं औषधियां डाली गई। मंदिराचल पर्वत की मथनी बनाई गई और वासुकी नाग को रस्सों के रूप में उपयोग किया गया। वासुकी नाग के मुख की ओर से असुरों ने पकड़ा और पूंछ की ओर से देवताओं ने। परंतु ज्योंहि मंदिराचल को सागर में डाला गया तो समुद्रतल उसका भार वहन न कर सका और मंदिराचल पर्वत नीचे धंसने लगा। तब विष्णु ने कच्छप (कछुए) रूप धारण कर मंदिराचल का नीचे धंसना रोका।

समुद्र मंथन की क्रिया प्रारंभ हो गई। इस क्रम में समुद्र में अति विक्षोभ उत्पन्न सा हुआ। सागर के जीव परेशान होने लगे। वासुकीनाग के फुफकार एवं दंश से अनेक असुर काल-कवलिक हो गए। अंतत: इस मंथन फलस्वरूप अनेक अमूल्य निधियां निकलने लगी। समुद्र मंथन से निकला युक्त ऐरावत हाथी एवं उच्चश्रवा घोड़ा जिसे देवेन्द्र ने ले लिया।

पारिजात वृक्ष जो सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला था, कामधेनु गाय एवं अप्सराएं देवलोक में स्थापित हो गई। वारुणी सुरा को असुरों ने ग्रहण कर लिया। सागर से निकला कालकुट विष, जिसके निकलते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया, दिशांए जलने लगी, लगा ऐसा कि संपूर्ण सृष्टि इस विष के प्रकोप से भस्म हो जाएगी। देव एवं असुर सभी आतंकित हो उठे। उन्हें अमृत पाने की जरा भी आशा न रही।

ऐसे अवसर पर आशुतोष भगवान शंकर ने उस विष को ग्रहण कर लिया एवं सृष्टि की रक्षा की। इस कालकुट विष के कारण शंकर के गले में सदा के लिए नीला दाग पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। फिर निकला शीतल प्रकाशमान चंद्रमा जिसने अपनी शीतलता से कालकुट विष के दुष्प्रभाव को काफी कम कर सबको शीतलता प्रदान की।

फिर निकली श्वेत वस्त्र धारिणी सरस्वती जिन्होंने ब्रह्मïा जी के अनुमोदन से भगवान विष्णु को वरण किया। अंत में निकला वह, जिसकी सबको प्रतीक्षा थी। एक बड़ा दिव्य पुरुष, पीतांबर धारी मानो विष्णु का ही अंश हो, अपने हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिए। ये भगवान धंवंतरि थे, जिन्होंने आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है।

जब देवों व असुरों में अमृत के लिए विवाद खड़ा हुआ तो भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कर असुरों को मोहित कर लिया और अमृत लेकर देवताओं में वितरित कर दिया। इस प्रकार सागर मंथन के फलस्वरूप आयुर्वेद के प्रवर्तक भगवान धंवंतरि का अवतार हुआ। इन्हीं भगवान धंवंतरि का जन्म उत्सव हम धंवंतरि त्रयोदसी के रूप में मनाते हैं, जिसे आम भाषा में धनतेरस कहा जाता है।

यह समुद्र मंथन की कथा यथार्थ हो या रूपक, परंतु यह तो सर्वविदित है कि सुखी जीवन के स्वस्थ मन की आवश्यकता है और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ शरीर का वास है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए जो शास्त्र हमें ज्ञान देता है वह आयुर्वेद है। आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा गया है, जिसके प्रवर्तक भगवान धंवंतरि हैं।

हम प्रतिवर्ष कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को इन महान मनीषी को याद करते हैं धनतेरस के रूप में। इस दिन हम नए बर्तन भी खरीदते हैं इसके अतिरिक्त कुछ लोग इस दिन लक्ष्मीजी की भी पूजा करते हैं। लक्ष्मी देवी, जो धन की अधिष्ठात्री देवी हैं, का भी आविर्भाव समुद्र मंथन के फलस्वरूप हुआ था अत: लक्ष्मीजी के अर्थात् धनतेरस नाम सार्थक करता है। इस दिन नया बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है।

सुख-समृद्धि का
पर्व धनतेरस
धनतेरस पर विशेष तौर से लक्ष्मी देवी की पूजा की जाती है। इसके पीछे आशय है कि लक्ष्मी देवी अपने साथ सुख-समृद्धि व खुशहाली लाती हैं। इसलिए लक्ष्मी जी का आशीष पाने के लिए इसी दिन सोने-चांदी के लक्ष्मी, गणेश अंकित सिक्के खरीदे जाते हैं। आज के बदलते समय में लोग अब सोने, चांदी, हीरे, क्रिस्टल, रत्न जड़ित आभूषण भी खरीदने लगे हैं।

सर्वाधिक खरीदारी चांदी के सिक्कों की होती है आभूषण विक्रेताओं का मानना है कि इस दिन चांदी से जुड़ी चीजे बड़ी मात्रा में बिकती हैं, क्योंकि चांदी अन्य सभी धातुओं में सर्वाधिक शुद्ध माना जाता है। चांदी में अन्य चीजों की अपेक्षा मिलावट की मात्रा होने की संभावना कम ही होती है। भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग धातुओं को इस दिन खरीदने की प्रथा है। बाजार पंडितों के हिसाब से दक्षिण में लोग सोना अधिक खरीदते हैं जबकि पश्चिम व उत्तर भारत में चांदी खरीदने का प्रचलन है। लोग असली खरीदारी रीति-रिवाजों की बजाय सुविधा के हिसाब से करने लगे हैं।

लोगों का अपनी आमदनी के अनुसार खर्च करना उपयुक्त नजरिया है। लेकिन इतना अवश्य ही तय है कि इन दिन हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ ना कुछ खरीदारी जरूर करता है। धनतेरस मात्र सुख-समृद्धि को प्राप्त करने वाला ही पर्व नहीं है बल्कि यह सुख, सौभाग्य, सौहार्द, भाई चारे को बढ़ाने वाला त्योहार भी है।

इसलिए आधुनिक समय में अब एक नया प्रचलन चला है कि इस दिन लोग एक दूसरे को तोहफे भी देने लगे हैं। विशेष तौर पर इस दिन लक्ष्मी, गणेश अंकित चीजे देना शुभ माना जाता है। हर व्यक्ति अपने हिसाब से तोहफों को देता है और खुशियां मनाता है। तो आप भी तैयार हैं। इस बार हर्षोल्लास व कुछ नए अंदाज में धनतेरस मनाने के लिए व सुख समृद्धि को अपने घर लाने के लिए।

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