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रक्षा-भाव की स्मृति का पर्व है भैया दूज: Bhai Dooj Katha
Bhai Dooj Special

 Bhai Dooj Katha: दीपावली के साथ केवल दीपमालाएं ही नहीं, वरन् अनेक पर्वों और उत्सवों की मालाएं भी गुंथी हुई हैं। त्रयोदशी से लेकर कार्तिक द्वितीया तक के पांच दिन अपनी कई पुनीत स्मृतियां व परंपराएं लेकर प्रतिवर्ष उपस्थित होते हैं। इन्हीं में से एक पर्व है- भ्रातृ द्वितीया अथवा भाईदूज, जो दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है। समस्त भारत में मनाए जाने वाले इस पर्व को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, यथा-बंगाल में भाईफोटा, महाराष्ट्र में भाऊ बीज, गुजरात में भाई बीज, पंजाब में टिक्का आदि। कालांतर में अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन, भाई-बहन के एकनिष्ठा नि:स्वार्थ एवं तन्मय नेह को पोषित करने के लिए हुआ।

भाईदूज की पौराणिक कथा-

भाईदूज की पौराणिक कथानुसार सूर्य के पुत्र यम और पुत्री यमी में प्रगाढ़ प्रेम था, परंतु यम के राज्यकार्य में प्राचुर्य के कारण यमी काफी समय तक अपने भाई यम से नहीं मिल सकी। जब मन बहुत बहुत व्याकुल हुआ तो यमी ने आवश्यक संदेश भेजकर यम से तुरंत मिलने का आग्रह किया। बहन की सूचना पाकर यम उसके पास शीघ्र पहुंचे। उस दिन भैयादूज वाला दिन था। यमी ने यम का अभूतपूर्व स्वागत सत्कार किया। प्रसन्न होकर यम ने यमी से कुछ भी मांगने को कहा। तब यमी ने यही वर मांगा कि तुम कम-से-कम वर्ष में एक बार इसी दिन मुझसे मिलने आया करो। यम ने सहर्ष स्वीकारते हुए कहा कि लोग मेरा नाम भी स्मरण करते हुए हिचकिचाते और भय खाते हैं, जबकि तुम श्रद्धा से निमंत्रण दे रही हो, फिर क्यों नहीं आऊंगा। आज के दिन जो भी बहन अपने बुरेसे- बुरे भाई को भी बुलाकर टीका करेगी, उसके पाप दूर हो जाएंगे। चूंकि इस दिन यमराज ने अपनी बहन यमुना के घर भोजन किया था, इसलिए युगों से इस परंपरा का निर्वाह आज भी भाई करते हैं।

एक अन्य रोचक कथा-

भैया दूज की एक अन्य रोचक कथा के अनुसार एक लड़की के कई भाई थे। किंतु सभी एक-एक करके इस दुनिया से कूच कर गए। सिर्फ एक बचा था। भैयादूज के दिन जब वह अपनी बहन के घर टीका कराने जा रहा था तो रास्ते में उसे शेर मिला, जो उसे मारकर खाने आगे बढ़ा। लड़के ने प्रार्थना की कि जब वह बहन के घर से टीका कराकर लौटेगा तब खा लेना, शेर मान गया। आगे चलकर एक सांप मिला। उससे भी लड़के ने वैसा ही वादा किया। इसी तरह कई बाधाएं पार करके वह बहन के यहां पहुंचा तो टीका करवाने के उपरांत भाई ने उसे रास्ते की सब बातें बतार्इं। बहन ने समझ लिया कि इस अंतिम भाई की मृत्यु भी निकट है। अत: उसने यमराज की तन्मयता से पूजा की और भाई की अकाल मृत्यु न होने का वरदान मांग लिया। तत्पश्चात् भाई को स्वयं अपने साथ लेकर चल पड़ी। रास्ते में वे सभी जीव उसकी ओर बढ़े, किंतु भाई के माथे पर टीका देखकर लौट गए। इस तरह भाई सकुशल घर पहुंच गया और फिर दीर्घजीवन पाया। वस्तुत: ये विचित्र कथाएं, भाईदूज के महत्त्व पर प्रकाश डालती हैं तथा प्रेरणा देती हैं कि नि:स्वार्थ भावना के द्वारा ही भाई-बहनों के संबंधों को सुदृढ़ बनाया जा सकता है। इस तिथि को बहन के यहां भोजन करने तथा उसे कुछ द्रव्य देने की प्रथा है, जो शुभ समझी जाती है। दूर-दूर से भाई-बहन इस दिन यमुना स्नान करने मथुरा पहुंचते हैं तथा पुण्य के भागी होते हैं। ऐसी मान्यता है कि यदि यमुना तट पर बहन के हाथ का बनाया भोजन भाई ग्रहण करे, तो वह उसके लिए आयुवद्र्धक होता है। व्यवसायी लोग इस दिन कलम-दवात की पूजा भी करते हैं। का भैया दूज का पर्व पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।