beginning of divine life
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Life Lesson: दिव्य जीवन जीने के लिए तुम्हारे प्रयास में तुम्हारे गुरुदेव, चाहे वे दूर हों या पास, प्रत्येक पतन-काल में तुम्हारी रक्षा करेंगे तथा भगवत्प्राप्ति की पावन तीर्थयात्रा को सफल बनाने में तुम्हारा उत्साहवर्धन भी करेंगे।

एक सर्वसामान्य प्रश्न लगभग प्रत्येक नवोत्साही अध्यात्म साधक पूछता है कि हम दिव्य जीवन का प्रारम्भ किस प्रकार कर सकते हैं? यह एक अत्यन्त सहज स्वाभाविक और युक्तिसंगत प्रश्न है जो प्रत्येक सत्यान्वेषी व्यक्ति के मन में उठता है। जब समग्र समस्या के संदर्भ में प्रत्येक प्रश्न को अलग से उठाया जाता है, तब प्राय: प्रश्नकर्ता किसी रहस्यमय चमत्कार की अपेक्षा रखता है, जिसके स्पर्श मात्र से शायद मनुष्य अपना आत्मिक विकास द्रुतगति से कर सके। परंतु वास्तव में ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है।
दिव्य जीवन जीना तो बुद्धि एवं हृदय पक्ष से संबंधित श्रेष्ठï आदर्शों को क्रमश: जीवन में उतारने की कला है। यह तो एक ऐसी ठोस प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वर्तमान भौतिक जीवन के मिथ्या विचारों का परित्याग एवं भावी आदर्श जीवन के श्रेष्ठï भावात्मक मूल्यों का वरण किया जाता है।
दूसरे शब्दों में, मनुष्य के जीवन का यह आन्तरिक विकास ही दिव्य जीवन की पूर्ण सफलता का
आधार है। संक्षेप में, यहां कोई ऐसा जादू नहीं चलता जिसके द्वारा बड़े से बड़ा गुरु भी केवल कृपा
दृष्टि, स्पर्श, संकल्प अथवा वाणी के प्रयोग से ही अपने शिष्य के भीतर आध्यात्मिकता भर सके।
जैसा लौकिक जीवन में होता है वैसा ही दिव्य जीवन के संबंध में भी सत्य है। लौकिक जीवन में बच्चा गिरते-पड़ते चलता है और चलना सीख लेता है। इसी प्रकार वह डूबते- उतरते तैरना भी सीख जाता है। ऐसा ही दिव्य
जीवन में भी होता है। दिव्य जीवन का प्रारम्भ कैसे किया जाए? इस बहुचर्चित प्रश्न का सीधा उत्तर है बस जीना प्रारम्भ कर दो। दिव्य जीवन पर तुम्हारा अधिकार अवश्य होगा, भले ही तुम अनेक गलतियों के बीच भी इस जीवन का श्रीगणेश कर देते हो तथा प्रत्येक पतन के पश्चात्ï पुन: प्रयास जारी रखते हो।

जब कोई शिशु चलना सीखता है, तब गिरने की दशा में उसे संभालने के लिए माता-पिता पास में ही खड़े रहते हैं। जब कोई बालक साइकिल चलाना सीखता है, तब सन्तुलन का अभ्यास कराने के लिए उसके बन्धु या मित्र उसका साथ देते हैं। तैरना सीखने वाले को भी पानी में डूबने से बचाने के लिए अन्य तैराक उसके समीप रहते हैं। इसी प्रकार दिव्य जीवन जीने के लिए तुम्हारे प्रयास में तुम्हारे गुरुदेव, चाहे वे दूर हों या पास, प्रत्येक पतन-काल में तुम्हारी रक्षा करेंगे तथा भगवत्प्राप्ति की पावन
तीर्थयात्रा को सफल बनाने में तुम्हारा उत्साहवर्धन भी करेंगे। ऐसे ही जीवन पथ-प्रदर्शक सच्चे सद्गुरु होते हैं।

Life Lesson-beginning of divine life
beginning of divine life

जीना प्रारम्भ करो, यही दिव्य जीवन की शुरुआत है। यहां कोई अलादीन का चिराग नहीं जिसमें से चुटकी बजाते ही कोई प्रकट होकर तुम्हें ईश-दर्शन करा देगा। यदि अलादीन कोई साधक होता तो वह खूबसूरत जिन उसकी कोई सेवा न कर पाता। अलादीन की एक मात्र यही आज्ञा होती- ‘ले चल मुझे दिव्य जीवन की ओर’ और वह चमत्कारी जिन कहता- ‘नहीं मालिक, यह नहीं, कुछ और करने
को कहो।’

हमने आपको अपने आप का निर्लिप्त साक्षी बनाकर आपके वर्तमान जीवन का परीक्षण पहले ही करा लिया है। आपके निरीक्षण में ही इस आय-व्यय, आशानिराशा, पे्रम-घृणा तथा राग-द्वेष वाले भौतिक, सांसारिक जीवन के तन पर से सभी प्रकाशित स्वर्णाभरणों को उतार कर, उसे नग्न रूप में
देखा जा चुका है। अपनी नग्नावस्था में यह अनेक प्रकार से कष्टकारी, रक्तस्रावी, व्रण युक्त, कुष्ट रोगी जीवन अपनी अन्तिम सांसें गिन रहा है। यह स्वाभाविक ही है कि आप इसके घृणास्पद आलिंगन एवं भयावह आकर्षण की सीमा से बाहर आना चाहते हैं। दिव्य जीवन आपकी प्रतीक्षा अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक कर रहा है। शरीर-मन-बुद्धि से अपने को अनासक्त करने की साधना तथा विचार, वाणी और कार्यों के पीछे छिपे उद्देश्यों और प्रेरकों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने का अभ्यास-ये ही दिव्य जीवन के प्रारम्भिक सोपान हैं।