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संसार का छोटे-से-छोटा कार्य सीखने के लिए भी कोई न कोई गुरु तो चाहिए और फिर बात अगर जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार करने की आती है तो उसमें सद्गुरु की आवश्यकता क्यों न होगी? गुरु की कृपा के बिना तो भवसागर से तरा नहीं जा सकता है। गुरु कौन है? इसका जीवन में क्या महत्त्व है? जब भी यह प्रश्न या जिज्ञासा मन में उठती है तो किताबें, ग्रंथ या लोग आदि एक ही उत्तर सामने रखते हैं कि गुरु ज्ञान का भंडार है। ‘गु’ यानी अंधकार, ‘रु’ यानी प्रकाश अर्थात् जो हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान रूपी उजाले में लाता है, वही गुरु है। जो हमें वास्तविक, आंतरिक जीवन की ओर उन्मुख करता है, जीवन को आध्यात्मिक एवं रूपांतरित करता है और उस परमब्रह्म’ परमेश्वर का साक्षात्कार या अनुभव कराने में हमारी मदद करता है। जो हमें मुक्त करने में हमारी मदद करता है वह गुरु कहलाता है।

एक व्यक्ति के जीवन में अनेक गुरु होते हैं। बाल्यावस्था में बच्चे पहले गुरुकुल जाया करते थे, अब स्कूल जाते हैं। व्यक्ति को अक्षर ज्ञान देने वाला सज्जन ‘विद्या गुरु’ कहलाता है। अक्षर ब्रह्म’ से साक्षात्कार कराने वाले विद्या गुरु का उपकार अविस्मरणीय है। बालक कुछ बड़ा होता है, तो उसे उपनयन संस्कार दिया जाता है। युवा होने पर विवाह-संस्कार, इस प्रकार के षोडश-संस्कार हिंदू सनातन धर्म में प्रचलित हैं। इन संस्कारों को कराने वाले सज्जन को कुलगुरु या कुल पुरोहित कहते हैं। व्यक्ति के जीवन में विभिन्न संस्कारों द्वारा नवीन परिवर्तन लाने वाले कुलगुरु का उपकार भी कभी भुलाया नहीं जा सकता।

ब्रह्मचारी जब युवा हो चलता है तो कुछ कमाने के लिए व्यापार-व्यवसाय किंवा अपने मनपसंद कार्य क्षेत्र की ओर प्रवृत्त होता है, तो उसे अपने क्षेत्र के अनुभवी व्यक्ति की शरण में जाना होता है। वहां वह अपने उस्ताद किंवा व्यवसाय गुरु का वरण करता है। व्यवसाय गुरु उसे उंगली पकड़कर कमाना सिखाता है। अत: व्यवसाय गुरु का योगदान भी जीवन में अविस्मरणीय होता है। इसी प्रकार व्यक्ति जब ज्ञान के क्षेत्र में परिपक्व होकर अध्यात्म की ओर जाना चाहता है, तो उसे अध्यात्म गुरु, मंत्र गुरु अथवा दीक्षा गुरु की आवश्यकता पड़ती है। शिष्य के संताप को हरने वाले ऐसे मंत्र गुरु अत्यंत दुर्लभ कहे गए हैं, क्योंकि वही वास्तव में सर्वोच्च परम गुरु कहे गए हैं। यथा-

मन्त्रदाता गुरु: प्रोक्तो

मन्त्रस्तु परमोगुरु:।

मंत्र (दीक्षा) गुरु व्यक्ति को परमोच्च कल्याण के मार्ग की ओर ले जाता है तथा व्यक्ति का जीवन भौतिक व आध्यात्मिक सुखों से परिपूर्ण कर देता है। इन सबके अतिरिक्त भी व्यक्ति के जीवन में अनेक गुरु होते हैं। जिससे भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कुछ सीखा जाए, भारतीय संस्कृति में वह गुरु कहलाता है। गुरु जड़ता से ज्ञान की ओर, कालिमा से शुभता की ओर, असुरक्षा से सुरक्षा की ओर, बुराई से अच्छाई की ओर, व्यष्टि से समष्टि की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर, व्याधि से समाधि की ओर ले जाने में सहायक है। जो गुरु अविद्या, असंयम, अनाचार, कदाचार, दुराचार, पापाचार आदि से मुक्ति दिलाता है, वही गुरु नमस्कार योग्य है। उसी गुरु को नमस्कार है। समप्रति उसी गुरु की आवश्यकता समाज को है, जो देवत्व व गुरुत्व को संजोए हुए है। गुरु समाज का प्रहरी होता है, समाज का आदर्श होता है। इसलिए उसे अपने स्व के रूप को अद्यतन परिप्रेक्ष्य में समझने की अपेक्षा है।

गुरु वह होता है जिसकी प्रज्ञा जाग जाए। अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु वह नहीं होता जो बहुत बुद्धिमान हो। आजीविका देने वाली शिक्षा के क्षेत्र में गुरु बुद्धिमान हो सकता है। अध्यापक या प्राध्यापक गुरु हो सकता है। किन्तु अध्यात्म के क्षेत्र में कोरा बुद्धिमान आदमी गुरु नहीं बन सकता। इस क्षेत्र में गुरु वही बन सकता है जो बुद्धि की सीमा पार कर प्रज्ञा की सीमा में प्रवेश कर जाता है। एक ओर है बुद्धि दूसरी ओर है प्रज्ञा। बुद्धि की सीमा को तोड़कर प्रज्ञा की सीमा में चले जाना, गुरुत्व का लक्षण है। वही व्यक्ति बुद्धि की सीमा को लांघकर प्रज्ञा की सीमा में जा सकता है, जिसने समर्पण साध लिया है। जिसे समर्पण का सूत्र नहीं मिला, जिसने समर्पण का मूल्य नहीं आंका, जिसने समर्पण नहीं साधा, वह व्यक्ति बुद्धि से हटकर प्रज्ञा में नहीं जा सकता। उसके लिए प्रज्ञा के द्वार सर्वथा बन्द हैं। प्रज्ञा में प्रवेश उसके लिए निषिद्ध है।

गुरु कोई व्यक्ति नहीं होता। वह आत्म-दर्शन और चैतन्य की महायात्रा का सहयात्री होता है, सहयोगी होता है। यदि वह कोई व्यक्ति हो, बुद्धि के स्तर पर जीने वाला मनुष्य हो, तो कभी भी उसके प्रति समर्पण नहीं हो सकता, फिर चाहे वह गुरु के आसन पर ही क्यों न बैठा हो। गुरु के प्रति समर्पण तभी होता है जब गुरु स्वयं आत्म-दर्शन या अध्यात्म की यात्रा करता है, चैतन्य के महा-पथ पर प्रस्थित और आत्मा के प्रति सर्वात्मना समर्पित होता है। इसलिए गुरु के प्रति समर्पण, सत्य के प्रति समर्पण, आत्म-दर्शन के प्रति समर्पण या चैतन्य के प्रति समर्पण- ये सब पर्यायवाची बन जाते हैं। इनमें कोई भेद नहीं।

गुरु शब्द को विविध वैयाकरणों, शिक्षाविदों एवं तत्त्वमीमांसकों ने अनेक विधि विश्लेषित एवं परिभाषित किया है जबकि सामान्य अर्थ में गुरु शिक्षक, अध्यापक, उस्ताद, मास्टर आदि का रूपान्तर है। वस्तुत: गुरु व्यवहार, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आचार-विचार, वेष-भूषा, नैतिक मूल्य, जीवनादर्श तथा सत्प्रवृत्तियों का प्रतिदर्श होता है जिसका सद्आचरण जीव और जगत के लिए अनुकरणीय, वन्दनीय और अभिनन्दनीय होता है। कहा गया है कि उस गुरु को नमस्कार है जो तमस से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है, जो हमारी चित्तवृत्तियों को स्थायित्व प्रदान करता है, जो हमारे संस्कार का परिष्कार करता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गुरु की महती आवश्यकता है। इसलिए गुरु शब्द व्यापक अर्थ में दक्षता, कुशलता, प्रवीणता, मास्टरी, आधिपत्य, जानकारी आदि कई विशेषणों से युक्त है जो सामाजिक सेवा को धार्मिक सेवा के रूप में स्वीकारता है।

प्रत्येक युग में कोई न कोई गुरु अपनी अमृतवाणी हिमालय के कैलाश शिखर से गुंजाता रहा है। सद्गुरु जब भी कुछ कहते हैं, ऐसा लगता है जैसे वे कैलाश शिखर से ही ज्ञानधारा को धरती पर उतार रहे हैं। सद्गुरु की ज्ञानधारा में समस्त रंगों से युक्त इंद्रधनुष भी शोभायमान होता है। वेदों का ज्ञान, योग का विज्ञान, भक्ति की फुहार, कर्म-कर्तव्य का निर्देशन, संबंधों की मर्यादा का मनोविज्ञान, इतिहास का गौरवगान, ईश्वर की सहज प्राप्ति का आत्मविज्ञान समाहित होता है।

गुरु सुधारवादी दृष्टि, उदारवादी हृदय, आदर्श का व्यावहारिक पक्ष और युग की वाणी बनकर बोलते हैं। उनके शब्द नवीन परिभाषाएं जगाते हैं। वह फूल से सुंदर, संगीत से मधुर, आकाश से ऊंचा और सागर से गहरा, कोमलता से भी कोमल, पावन से भी पावन, आकर्षक से भी अधिक मोहक है, जो निर्देशक है, पथ प्रदर्शक, आत्मीय है, अपना है, अपनों से भी अधिक। जो इस धरा पर स्वर्ग का संदेश बनकर आया है, जो हमारे कल्याण के लिए बोलता है, जिसकी प्रार्थनाएं केवल भक्तों के कष्ट हरण के लिए ही गूंजती हैं। उस शक्ति को हम सद्गुरु के नाम से जानते हैं।

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कौन है गुरु? 4

शास्त्रों में गुरु के अनेक कार्य बताये गए हैं। जैसे- ‘गरति सिश्रति कर्णयोर्ज्ञानामृतम् इति गुरु:’- अर्थात् जो शिष्य है वह गुरु है। ‘गृणाति धर्मादिरहस्यम् इति गुरु’ अर्थात् जो शिष्य के प्रति धर्मादि ज्ञातव्य तथ्यों का उपदेश करता है वह गुरु है।

‘गिरति अज्ञानान्धकारम् इति गुरु’- अर्थात् जो अपने सदुपदेशों के माध्यम से शिष्य के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर देता है, वह गुरु है। 

‘गारयते विज्ञापयति शास्त्र रहस्यम् इति गुरु:’ अर्थात् जो वेदादि शास्त्रों के रहस्य को समझा देता है वह गुरु है। इस धरा पर जब भगवान ने अवतार लिया तो उन्हें भी गुरु का आश्रय ग्रहण करना पड़ा। राम, कृष्ण, विवेकानंद, दयानंद, कबीर, रैदास, दादू आदि विभूतियां सद्गुरु देव के हाथों ही निखरी थीं।

वस्तुत: गुरु देव भवरोगों- बुराइयों की संजीवनी बूटी के समान हैं। गुरु शिष्य को परमात्मा का साक्षात्कार करवाकर जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर देता है। मनुष्य और ईश्वर को मिलाने वाला सेतु गुरु है। अंधकार में भटकते हुए मनुष्य को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है। इसी कारण गुरु को ईश्वर से भी अधिक महान बताया गया है। जब मनुष्य पर परमात्मा की विशेष कृपा होती है तो उसके हृदय में परमात्मा को पाने की इच्छा बलवती होती है। परन्तु उसके समक्ष यह गंभीर समस्या होती है कि ईश्वर प्राप्ति का कौन सा मार्ग अपनाया जाये? क्योंकि व्यक्ति की बुद्धि इतनी प्रखर नहीं होती कि वह अपने अनुकूल उचित मार्ग का चुनाव कर सके। भागते रहने से भटकाव ही होता है। लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। ऐसी स्थिति में मात्र वही उसे सही मार्ग दिखा सकता है जो स्वयं लक्ष्य तक पहुंच चुका हो।

शास्त्रों में गुरु के लक्षण बताते हुए कहा गया है कि जो कुलीन हो, सदाचारी हो, जिसकी भावनाएं शुद्ध एवं इन्द्रियां वश में हों, जो समस्त शास्त्रों की सार-उपासना जानता हो। समस्त शास्त्रों के तात्पर्य स्वरूप ब्रह्म’ को जानता हो, जो परोपकारी हो, जिसकी वाणी अमोघ हो। जो जप-पूजा में संलग्न हो, जो कभी आशांत न हो, जो वेद एवं वेदार्थ का पारदर्शी हो, योगमार्ग में जिसकी पूर्ण प्रगति हो, जो हृदय को देवताओं के समान प्रिय लगे और जिसमें अनेक गुण स्वाभाविक रूप से निवास करते हों, वही शास्त्र सम्मत गुरु है। गुरु में चार प्रकार की शुद्धियां आवश्यक हैं- आनुवांशिक शुद्धि, क्रियागत शुद्धि, मानव शुद्धि और विशुद्ध। जो परम ज्ञानी तो हो, परन्तु करता कुछ न हो, वह गुरु नहीं है और जिसकी इन्द्रियां वश में न हों वह भी गुरु बनने योग्य नहीं है। जिसके दर्शन मात्र से ही श्रद्धा भाव उत्पन्न हो जाये वही सच्चा गुरु है।

गुरु हमारी सत्ता का बोध कराकर दिव्य आनन्द का बोध करा सकता है। गुरु जब तक भौतिक शरीर में रहता है, शिष्य का जीवन ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रयास करता रहता है और जब भौतिक शरीर छोड़ देता तभी वह निरन्तर अपने सूक्ष्म शरीर द्वारा शिष्यों को सहयोग और संरक्षण देता रहता है। देखा जाए तो गुरु एवं शिष्य के संबंध एकात्मक अनन्य होते हैं। ऐसे ही अद्भुत अटूट संबंधों का पर्व गुरु पूर्णिमा जाति-धर्म से ऊंचा है। प्रत्येक व्यक्ति अपने से बड़े पूज्य माता-पिता, भाई-बहन या शिक्षक के प्रति सम्मान व आभार व्यक्त करके जीवन को अमृतमय बना सकते हैं।

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