किसी ने पूछा- गुरु क्यों जरूरी है? मैंने प्रति प्रश्न किया- मां क्यों जरूरी है? वे बोले- मां न हो तो हम संसार में नहीं आ सकते। मैंने कहा- गुरु न हो तो हम मुक्त नहीं हो सकते। गुरु का मतलब फैमिली- डॉक्टर। गुरु मन की चिकित्सा करता है। शिष्य के लिए गुरु का द्वार किसी भी मंदिर या मस्जिद की चौखट से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। सागर तो बिना लहरों के हो सकता है, मगर लहरें बिना सागर के नहीं हो सकतीं। गुरु तो बिना शिष्य के हो सकता है, मगर शिष्य बिना गुरु के नहीं हो सकता।
जीवन जीने के लिए हवा-पानी की आवश्यकता हुआ करती है। दिन-रात को जानने के लिए सूर्य और चंद्रमा की जरूरत हुआ करती है। ठीक उसी प्रकार काम, क्रोध, झूठ और अहंकार रूपी शत्रुओं से रक्षा के लिए, उनसे जिन्दगी की जंग जीतने के लिए एक ढाल की आवश्यकता होती है और वह ढाल है एक सच्चा मार्गदर्शक जिसे हम भारतीय परपंरा में गुरु का दर्जा देते हैं।
जिन्दगी में हर पल, हर क्षण, हर मोड़, हर राह पर इंसान को किसी न किसी की मदद की जरूरत हुआ करती है और यहां तक कि इस आधुनिक युग में जब कोई कार से चलते-चलते रास्ता भटक जाता है तो वह अपने मोबाईल में जीपीएस सिस्टम ऑन कर लेता है जिससे वह सही मंजिल पर पहुंच जाया करता है। ठीक उसी तरह आत्मा भी दुनिया की चकाचौंध में अपने रास्ते से भटक जाती है और उसे सही रास्ते पर लाने के लिए अध्यात्म के जीपीएस यानी एक सच्चे गुरु की जरूरत महसूस हुआ करती है। अन्यथा वह अपने सही मुकाम तक नहीं पहुंच सकती। तो इस तरह आध्यात्मिक जीपीएस है गुरु।
भारतीय संस्कृति में अगर किसी को सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है तो वह है ‘गुरु’। जीवन की शुरुआत गुरु के द्वार से ही होनी चाहिए। इस द्वार से गुजरे बिना न किसी को कुछ मिलता है और न कभी मिला है। गुरु के बिना जीवन निस्सार है या यूं कहूं कि रस के बिना गन्ना बेकार है। ज्ञानी, ध्यानी, योगी कहते भी हैं कि जिसके जीवन में गुरु नहीं उसका जीवन शुरू नहीं। जिन्दगी में एक गुरु जरूरी है फिर चाहे वह मिट्ïटी का द्रोणाचार्य ही क्यों न हो, पर जिन्दगी में एक गुरु जरूरी है गुरु के बिना सब बेकार है इसका जीता जागता उदाहरण है रावण। रावण के पास सब कुछ था। सोने की लंका, राक्षसों की सेना, आलीशान महल, 100 पुत्र आदि-आदि पर जीवन में कोई गुरु नहीं था जो उसे वक्त पर संभाल सके और अंतत: सब रखा का रखा रह गया। इसलिए जीवन में गुरु जरूरी है।
वृक्ष पर चाहे पका हुआ फल हो या कच्चा धरती समभाव से उसे अपनी ओर खींचती है। इस समभाव के कारण उसके इस बल को गुरुत्वाकर्षण कहा जाता है। गुरु धरती के जैसे होते हैं। सूर्य अपना प्रकाश देते समय यह नहीं सोचता की व्यक्ति पात्र है या कुपात्र वह समान रूप से सबको ऊष्मा प्रदान करता है। गुरु भी सूर्य की भांति होते हैं। समुद्र चाहे मल हो या जल उसकी ओर आने वाले को स्वयं में समा लेता है, गुरु समुद्र हैं। जैसे मां अपने अस्वच्छ बच्चे को स्वच्छ करने के लिए स्वयं अस्वच्छ होने से भयभीत नहीं होती वैसे ही गुरु भी ममतामयी मां होते हैं। परमात्मा का साकार स्वरूप गुरु हैं व गुरु का निराकार स्वरूप परमात्मा होता है। शिष्य अर्जुन में विश्वास करता है तो गुरु सृजन में विश्वास करते हैं।
गुरु एक तेज है जिनके आते ही सारे संशय के अंधकार खत्म हो जाते हैं। गुरु वो मृदंग है जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते हैं। गुरु वो ज्ञान है जिसके मिलते ही पांचों शरीर एक हो जाते हैं। गुरु वो दीक्षा है जो सही मायने में मिलती है तो पार हो जाते हैं। गुरु वो नदी है जो निरंतर हमारे प्राण से बहती है। गुरु वो सत चित आनंद है जो हमें हमारी पहचान देता है। गुरु वो बासुरी है जिसके बजते ही अंग अंग थिरकने लगता है। गुरु वो अमृत है जिसे पीके कोई कभी प्यासा नहीं। गुरु वो मृदंग है जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है।
गुरु वो कृपा है जो सिर्फ कुछ सद् शिष्यों को विशेष रूप में मिलती है और कुछ पाकर भी समझ नहीं पाते। गुरु वो खजाना है जो अनमोल है। गुरु वो समाधि है जो चिरकाल तक रहती है। गुरु वो प्रसाद है जिसके भाग्य में हो उसे कभी कुछ मांगने की जरूरत नहीं।
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