शांत मन:स्थिति में, सन्मार्ग पर प्रवर्तित करने वाले शास्त्रों में गुरुओं के द्वारा कहे गये पवित्र उपदेशों का स्मरण करके, हमारे मन में उठने वाली संकल्प-विकल्प वाली वृत्तियां शांत हो जाती हैं। शास्त्र तथा आर्य संस्कृति की नैतिकता के अनुसार शिष्य या पुत्र की, गुरु या पिता के प्रति सेवा वृत्ति अखंड होनी चाहिए। गुरु के प्रति सेवा भाव की पूर्णता को ध्यान में रखते हुए शिष्यों का तीन प्रकार से वर्गीकरण किया गया है- उत्तम, मध्यम तथा अधम।
उत्तम शिष्य गुरु की इच्छा को स्वयं ही जानकर उसके बिना कहे कार्य पूर्ण कर देते हैं। मध्यम शिष्य आज्ञाकारी होते हैं और वे गुरु के, इच्छा व्यक्त करने पर, आज्ञा मिलने से कार्य पूरा करते हैं। अधम कोटि के शिष्य गुरु के आज्ञा देने पर भी कार्य नहीं करते हैं।
पौराणिक कथाओं के सागर में ऐसी अनेक कहानियां हैं जिनमें महान गुरुओं द्वारा कहा गया शब्द अंत में सत्य प्रमाणित हुआ है। यह कोई आश्चर्यजनक तथ्य नहीं है। ऐसा तो होना ही चाहिए। रेडियो को दिल्ली के रेडियो स्टेशन पर मिलाने से यदि कोई संगीत सुनाई देता है तो वह निश्चित है कि वह संगीत दिल्ली में रेडियो स्टेशन के प्रसारण-कक्ष में चल रहा होगा। वस्तुत: रेडियो सेट अपना कोई संगीत प्रसारित करने में समर्थ नहीं है। इसी तरह देवतुल्य ऋषि जिन्होंने परमात्मा से तादात्म्य किया है, वे ईश्वरीय संगीत को ही अभिव्यक्त करते हैं। उनका कुछ भी कहना अन्यथा नहीं हो सकता। उनके मन में जो भी विचार प्रस्फुटित होते हैं वे दिव्य हैं।
भारतीय दर्शन के सभी वेदों में यह तथ्य निर्विवाद रूप से माना गया है कि ध्यान की उच्चतम अवस्थाओं के विषय में, केवल उन चुने हुए थोड़े से शिष्यों को ही ज्ञान दिया जा सकता है जिन्होंने आध्यात्मिक विकास की सीढ़ी चढ़ ली हो तथा जिनके विचार और भावनायें शुद्ध हों। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लेना चाहिए। कि ब्राहृ विद्या, एकान्त में किसी निर्जन मंदिर के अंधेरे कोने में छुपा कर रखी जाने वाली एक गोपनीय विद्या है और ब्राह्मण पुजारी उसका रक्षक है। उपनिषदों में संग्रहीत ज्ञान के कोश को जानने वाले ब्राह्मण वर्ग को चाहिए कि आनन्द प्राप्त करने के हेतु आए हुए पुरुषों को इस तरह न भगाये जैसे कि अन्न गट्ठर की रखवाली करने वाला कुत्ता क्रोधित होकर भोलीभाली भूखी गाय को वहां मुंह मारने से रोककर भगा देता है।
आजकल के पंडित चाहे कहीं से कितने भी विद्धतापूर्ण दृष्टांत लाकर यह सिद्ध कर दें कि यह ब्रह्मज्ञान एक विशिष्ट वर्ग के लिए ही है किन्तु है यह धोखा ही। साथ ही उनका ऐसा सिद्ध करना, उन ईश्वर तुल्य आख्यानों के विपरीत कथन करना है जिन्होंने समस्त शास्त्रों की रचना की है। जिस प्रकार योग्य शिष्य विरले होते हैं उसी प्रकार सदैव सारगर्भित तथ्यों का निरूपण करने वाले सच्चे आचार्य भी दुर्लभ होते हैं।
सच्चा गुरु वह है जिसने न केवल ब्राहृ का आत्मरूप से साक्षात्कार किया है, अपितु उसे उपनिषद् इत्यादि शास्त्रों का पूर्ण ज्ञाता भी होना चाहिए। श्रोत्रिय (शास्त्रों का ज्ञाता) तथा ब्रह्मनिष्ठ (स्वात्मरूप से ब्रह्मज्ञानी) होना- ये सच्चे गुरु की दो अनिवार्य विशेषताएं हमारे ग्रंथों में बतायी गई हैं। पंडितों में पहली विशेषता (शास्त्र-ज्ञान) तो प्राय: दिखाई देती है किन्तु ब्रह्मनिष्ठता उनमें नहीं मिलती। इसी प्रकार ऐसे कई संत और महात्मा हैं जिन्होंने स्वयं ब्रह्म से साक्षात्कार किया है किन्तु दुर्भाग्य से शास्त्रों के संबंध में उन्हें अधिकारपूर्वक ज्ञान नहीं है। ये दोनों ही प्रकार के लोग वास्तविक गुरु नहीं बन सकते। यही बात ध्यान में रखकर यमराज ने कहा है कि सच्चे गुरु का होना आश्चर्य ही है।
यह भी पढ़ें –आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया से गुजरो -स्वामी चिन्मयानद
धर्म -अध्यात्म सम्बन्धी यह आलेख आपको कैसा लगा ? अपनी प्रतिक्रियाएं जरूर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही धर्म -अध्यात्म से जुड़े सुझाव व लेख भी हमें ई-मेल करें-editor@grehlakshmi.com
