प्रत्येक संत जो इस पृथ्वी पर आया है उसने ईश्वर की समस्त मानवीय संतानों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए ईश्वर की इच्छा पूर्ति हेतु योगदान दिया है। महान संत दो उद्देश्यों से आते हैं। अनेक लोगों अथवा कुछ लोगों को प्रेरित एवं प्रबुद्ध करने के लिए और उन शिष्यों को प्रशिक्षण देने के लिए, जो गुरु के जीवन के अनुसार अपना जीवन ढाल लेते हैं। बाद में आने वाले सच्चे शिष्य संत के सच्चे ‘परिवार’ के सदस्य होते हैं, जिनसे एक अतरंग समूह बनता है, जिसमें संत अपना आध्यात्मिक जीवन रोपित करते हैं। जीसस के ऐसे बारह शिष्य थे और भी थे, परन्तु बारह में एक ने उनके प्रेम एवं विश्वास को धोखा दिया। ईश्वर-नियुक्त आध्यात्मिक शिक्षक के लिए दूसरों को अपने जैसा बनाना सबसे कठिन कार्य होता है, परन्तु जीसस ने यथार्थ में अपने जैसे पुनीत शिष्य बनाए थे।
आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध प्रत्येक गुरु का यह प्रयास रहता है कि अनेक भक्त ईश्वर के साथ संपर्क करने के योग्य बनें। फिर भी प्रत्येक महान संत कुछ ‘अधूरा कार्य’ छोड़ जाते हैं। क्योंकि वह अधूरा रह गया है, इसलिए उस गुरु को दोबारा आना पड़ता है, परन्तु इसका समय ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है।
जीसस ने प्राय: दूसरों को आरोग्य तो प्रदान किया, परन्तु उन लोगों ने सदैव इसकी सराहना नहीं की। और वह उनको शारीरिक आरोग्य प्रदान करते-करते थक गए थे। वह चाहते थे कि लोग ईश्वर को जान लें। उन्होंने केवल उनकी उच्चतम भलाई चाही, परन्तु उन लोगों ने उन्हें सूली पर चढ़ा दिया और इस प्रकार उनके आध्यात्मिक विकास के लिए ईश्वर की इच्छा पूर्ण नहीं हुई। यद्यपि उन्होंने अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लिया होता है, परन्तु दूसरों की प्रसन्नता एवं पूर्णता की उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई है। वे अपने भूले-भटके भाइयों को ईश्वर तक वापस ले जाना चाहते हैं। मानव जाति के ईश्वर नियुक्त उद्धारकों को पृथ्वी पर दोबारा आना ही होता है, परन्तु वे कब आएंगे कोई नहीं बता सकता। महान संत केवल परमात्मा की ही आज्ञा से आते हैं। कुछ परिस्थितियों में जब समय निश्चित हो जाता है, तो सिद्ध संत इस विषय में बता देते हैं, परन्तु अन्य अवतार बिना बताए ही आते हैं। इसी तरह से आते रहते हैं।
स्वघोषित गुरु, गुरु नहीं होता है, इसलिए गुरु वह है जिसे ईश्वर दूसरों को उनके पास वापस लाने के लिए कहते हैं। जब थोड़ी-सी आध्यात्मिक इच्छा होती है, तो ईश्वर आपको और अधिक प्रेरित करने के लिए पुस्तकें तथा शिक्षकों को भेजते हैं और जब आपकी इच्छा प्रबल हो जाती है, तो वे एक सद्गुरु को भेज देते हैं। ‘इसको समझें! स्वयं को (गुरु के समक्ष) समर्पित करने से, प्रश्न पूछने से (गुरु और अपने आन्तरिक बोध) और गुरु की सेवा करने से, वे सन्त जिन्होंने सत्य की प्राप्ति कर ली है, तुझे भी ज्ञान प्रदान करेंगे।’ ऐसे भी शिक्षक होते हैं जो सदा अपने अनुयायियों से आशा रखते हैं, कि वे उनके ही इशारे पर नाचें, तुरन्त आज्ञापालन के लिए तैयार रहते हैं और यदि वे ऐसा नहीं करते तो शिक्षक नाराज हो जाते हैं। परंतु एक आध्यात्मिक शिक्षक, जो ईश्वर को जानता है और वास्तव में एक सद्गुरु है, वह स्वयं को एक शिक्षक के रूप में बिल्कुल नहीं सोचता।
हिन्दू धर्मशास्त्र कहते हैं कि जो भक्त एक सद्गुरु के ज्ञान के साथ अपना अन्त:सम्पर्क कर लेते हैं, गुरु के द्वारा उनकी सहायता करना संभव हो जाता है। गुरु और शिष्य के बीच मित्रता शाश्वत होती है। जब कोई शिष्य गुरु के प्रशिक्षण को स्वीकार कर लेता है, तो उसमें पूर्ण समर्पण होता है, कोई बाध्यता नहीं होती।
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