दुनिया में अगर कोई वास्तव में ईश्वर रहित संस्कृति है, तो वह भारत की संस्कृति है। यह एकमात्र ऐसी जगह है जहां इस बात को लेकर कोई एक मान्यता नहीं है कि ईश्वर क्या है। अगर आप अपने पिता को ईश्वर की तरह देखने लगें, तो आप उनके सामने ही सिर नवा सकते हैं। अगर आपको अपनी मां में ईश्वर के दर्शन होते हैं, तो आप उसके सामने सिर झुका सकते हैं। इसी तरह अगर किसी को किसी फूल में ईश्वर नजर आता है, तो वह उसकी पूजा करने को स्वतंत्र है। लोगों को अपने-अपने ईश्वर की कल्पना करने की पूरी आजादी है। इसे इष्ट देवता कहा जाता है। अगर हर कोई अपने भगवान की रचना कर रहा है, तो जाहिर है कि कहीं न कहीं हम ही भगवान बनाते हैं। तो दुनिया के इस हिस्से में सबसे ऊंचा लक्ष्य भगवान कभी नहीं रहा, सबसे ऊंचा लक्ष्य हमेशा मुक्ति रही है।

इन्सान की मुक्ति सबसे महत्त्वपूर्ण चीज रही है। यहां तक कि भगवान को भी इसी दिशा की ओर उठने वाले एक कदम की तरह देखा जाता है। गुरु एक जीवित मानचित्र है। हो सकता है, आप अपनी मंजिल तक बिना मानचित्र के पहुंच जाएं, लेकिन जब आप अनजाने क्षेत्र में यात्रा कर रहे होते हैं, तो आपको नक्शे की आवश्यकता होगी ही। अगर आप बिना किसी मार्ग दर्शन के आगे बढ़ेंगे तो इधर-उधर ही भटकते रह जाएंगे, भले ही आपकी मंजिल अगले कदम पर ही हो। बस इसी मार्गदर्शन के लिए आपको गुरु की जरूरत पड़ती है। क्या गुरु जरूरी है? बिल्कुल जरूरी नहीं है। अगर आप अपना रास्ता और मंजिल अपने आप ही हासिल करना चाहते हैं तो आप ऐसा कर सकते हैं। पर हो सकता है कि इस काम में आपको अनंत काल लग जाएं।

 आप गुरु को खोजने नहीं जाते। अगर आपकी इच्छा गहरी हो जाए, यदि आप अपने अस्तित्व की प्रकृति को न जानने के दर्द से फट रहे हैं, तो आपको गुरु खोजने की जरूरत नहीं होगी। वह खुद आपको खोज लेंगे।  आप कहीं भी हों, यदि आपकी इच्छा बलवती हो जाती है और अज्ञानता का कष्ट आपको अंदर ही अंदर साल रहा है, तो निश्चित रूप से गुरु आप तक पहुंच ही जाएंगे। गुरु कोई व्यक्ति नहीं होता, वह तो बस एक संभावना है। गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है- गु और रु। ‘गु’ के मायने हैं अंधकार और ‘रु’ का मतलब है भगाने वाला। कोई भी चीज या शख्स, जो आपके अंधकार को मिटाने का काम करता है, वह आपका गुरु है। यह कोई ऐसा इन्सान नहीं है, जिससे आप कभी मिलते हैं। यह कोई ऐसा शख्स भी नहीं है, जिसके साथ आप हाथ मिलाएं और न ही वह कोई ऐसा शख्स है, जिसके सामने आप झुकते हैं। गुरु तो एक सेतु है, एक संभावना है। गुरु एक तरह की रिक्तता है, एक विशेष प्रकार की ऊर्जा है। अगर आप उसे पाना चाहते हैं, जो शाश्वत है, सर्वव्याप्त है, अपने में सबको समाहित किए हुए है, फिर जो ऊर्जा आपके पास है, वह काफी नहीं है। अगर आप ईश्वर को पाना चाहते हैं, फिर आपको उस ऊर्जा की जरूरत होगी, जो गुरु है। 

गुरु कोई व्यक्ति ही हो, यह तो जरूरी नहीं है, लेकिन आप किसी सशरीर गुरु के साथ अपने को बेहतर तरीके से जोड़ सकते हैं, क्योंकि आपको हर चीज के बारे में बात करने की आवश्यकता होती है। एक सच्चा जिज्ञासु, एक ऐसा साधक जिसके दिल में गुरु को पाने की प्रबल इच्छा होती है, वह हमेशा उसे पा ही लेता है। इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं है। जब भी कोई वास्तव में बुलाता है या याचना करता है तो अस्तित्व उसका उत्तर जरूर देता है।

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