बागानों में पत्तियों की शक्ल में पैदा होने वाली चाय एक मशीनी व सूक्ष्म रासायनिक प्रक्रिया से प्यालों तक पहुंवती है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के प्रमुख राज्य आसाम में करोड़ों -अरबों रुपये से स्थापित चाय कंपनिया इस प्रक्रिया को सुलभ बनाती हैं। कई-कई हजार की तादाद में श्रमिक व अन्य कर्मचारी जन कंपनियों में शिफ्टों में दिन-रात काम करके इस काम को अंजाम देते हैं। चाय को गुणत्ता के आधार पर प्रायः 3 किस्मों में बांटा जाता है जिनमें अव्वल दर्जे की किस्म का निर्यात होता है। दोयम दर्जे की दानेदार चाय बेहतरीन डिब्बों  व पैकटों में पैक होकर देश की खपत के अनुसार बाजार में भेजी जाती है और चूरा वाली चाय भी जो अपेक्षाकृत कड़क और तेज होती है, देश के ही बाजारों में बिकती है।  चाय की कंपनियों की स्थापना में चूंकि बेशुमार दौलत लगती है, अतः स्थानीय उद्योगपतियों व व्यवसायियों के तो चाय उद्योग नाम मात्र के ही हैंं। पिछले 7 दशकों से भी ज्यादा समय से ज्यादातर बागान मारवाड़ी सेठों के ही हैं।

बात शुरु की जाए चाय के बागानों से। हरियाली से यूं तो असम राज्य के लगभग तमाम जिले ही समृद्ध माने जाते हैं, पर जिन जिलों में चाय के बागान हैं उनके सौंदर्य का तो शब्दों में बखान करना संभव नहीं है। जहां तक नजर जाए दूर-दूर तक फैले चाय के बागान और उनकी हरियाली ऐसे प्राकृतिक सौंदर्य की कहानी कहते हैं कि बस मन उनमें रम कर रह जाए। जी हां, कुछ ऐसा ही नजारा है चाय के बागानों से सजे कोकराझाड, जोरहाट, शिवसागर, गुहाटी  आदि जिलों के चाय बागानों का। चाय चुनती असम की युवतियां और बच्चियां बागों में तितलियों सी नजर आती हैं, जो गुनगुनाकर अपने काम में बडे़ उत्साह से लगी रहती हैं। यों तो चाय की खेती असम की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल़ के न्यू जलपाई गुड़ी व दार्जिलिंग आदि क्षेत्रों में भी होती है पर बहुतायत में चाय की खेती के लिए असम ही ज्यादा मशहूर है। इन जिलों में प्राकृतिक सौंदर्य तो बिखरा पड़ा ही है, साथ ही साथ चाय के बागान वहां के बाशिंदों को रोजगार के साधन भी मुहैया कराते हैं। इस इलाके की गणना यदि समृद्ध क्षेत्रों में नहीं की जा सकती, तो कम से कम खाते-पीते क्षेत्रों में तो की ही जा सकती है।  इस पर्यावरणीय सौंदर्य में चार चांद लगाते हैं वे जंगली जानवर जो इन क्षेत्रों में अधिकता से पाए जाते हैं। चाय बागानों में तो खरगोश, सांप, लोमड़ियां आदि ही होते हैं क्योंकि बागानों की लंबाई कम होने के कारण बडे़ व ऊंचे जानवर इनमें छिप ही नहीं सकते। हां, बागानों से लगे बांस, टीक और अन्य प्रजातियों के पेड़ों, झाड़ियों व दरख्तों के जंगल भी हैं, जिनमें हाथी, गेंडे, रीछ बहुत अधिक संख्या में पाए जाते हैं। शाम को तो पक्षियों का कोलाहल, हाथियों की चिंघाड़ व गेंडों की आवाज सुनकर सुंदर संयोग की अनुभूति होती है।
बागान की पत्तियों से डिब्बों में बंद होने वाली चाय की पत्ती की कहानी इस तरह है। बागानों में पीठ पर टोकरे लटकाए महिलाएं सबसे पहले चाय की पकी पीली पड़ चुकी पत्तियों को चुनकर टोकरे में भरती हैं। टोकरा भर जाता है, तो उसे पास ही खड़ी मालवाहक गाड़ी यानी ट्रक में लाकर डाल दिया जाता है। इस तरह बागान से चुनी चाय की पत्तियां कंपनी के बाहर बने हौजों में भर दी जाती है। 40-50 मीटर चैडे़  इस हौज में नीचे बहुत बारीक जाली लगी होती है। और जाली के नीचे हीट ब्लोअर पंखे लगे होते हैं। पंखे व हीटर चलाकर इन पत्तियोंं को हौज में 24 से 30 घंटे तक रखा जाता है और इस बीच पत्तियों को तीन-चार बार उलट-पलट कर दिया जाता है।
फिर इस हौज से उठाकर पत्तियों को एक लंबे स्वचालित ग्रिल व चैडे़ पट्टे पर एक मिक्सर लगी मशीन से गुजारा जाता है। जहां मशीन पत्तियों को पीसकर थोड़ा बारीक करने का काम करती है। पत्तियां चूंकि तब तक काफी गीली रहती हैं, अतः दो या तीन चैडे़ या लंबे छोटे- छोटे टुकड़ों में अलग हो जाती है। वहां से यह पत्तियां फिर एक हीट कंटेनर के ऊपर से स्वचालित जाली में गुजारी जाती है। यहां थोड़ा सूख जाती है। इसके बाद निश्चित मात्रा में तैयार किए गए घोल में से होकर गुजरती हुई यह पत्तियां हीट कंटेनर के ऊपर से निकलती हैं। यहां एक अन्य रासायनिक घोल का बारीक फब्बारा इन पर गिरता रहता है और हीट कंटेनर के ऊपर धीरे-धीरे पत्तियां सूख जाती हैं। यहां से यह ऊपर से नीचे तक चल रही तीन जालियों में छनती है और एकत्रित होकर आगे स्टील या अन्य धातु के बने हौज में गिरती रहती है। छनाई के क्रम में पत्तियां तीन प्रकारों से विभक्त हो जाती है। ऊपरी जाली में से होकर गुजरी और एक अलग रखे स्टील के हौज में इकट्ठी हुई पत्तियां आकार में काफी बड़ी होती है। इनमें बाद में कोई कैमिकल नहीं लगाया जाता है। इन्हें सिर्फ बहुत बढ़िया किस्म का फ्लेवर (खुशबूदार रसायन) लगाकर डिब्बों में बंद करके निर्यात करने हेतु रख दिया जाता है। यह किस्म देश में भी बिकती है। पर बहुत मंहगी होने के कारण इसे धनी वर्ग ही खरीद पाता है। अतः ज्यादा तादाद में इसी का निर्यात होता है।
ऊपर से नीचे की जाली में गुजरकर दोयम दर्जे व आकार की पत्तियां एक अन्य स्टील के टब या हौज में एकत्र होती है। इनमें से कुछ कड़क बनाने के लिए अलग निकाल ली जाती है। जो टब में शेष बचती है उसे फ्लेवर देकर डिब्बे में पैक करके देश में खपत हेतु जारी कर दिया जाता है। कड़क बनाने के लिए रखी हुई नई पत्ती में रसायन का छिड़काव किया जाता है, फिर फ्लेवर लगाकर डिब्बों में पैक करके देश में ही बिक्री हेतु जारी कर दिया जाता है। सबसे नीचे की छलनी में जो चूरा बचता है उस पर एक किस्म का रासायनिक घोल इस्तेमाल किया जाता है और फ्लेवर हल्का लगाया जाता है। जिन लोगों की पसंद कड़क चाय है यह उनके प्यालों तक पहुंचती है। यह अपेक्षाकृत सस्ती भी होती है।
तो यह सफरनामा है चाय के बागानों की पत्तियों के परिशोधित व परिष्कृत होकर आपके प्याले तक पहुंचने की।