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Sufi Sant koi dhram ya panth nahi

Sufi Sant koi dhram ya panth nahi

बभी सूफीवाद या सूफी पंथ की बात उठती है या सूफी शब्द सुनने या पढ़ने में आता है तो खुद-ब-खुद इस्लाम धर्म की याद जुड़ जाती है। शायद इसलिए क्योंकि जो सबसे पहले सूफी हुए वह मज़हब से मुसलमान थे। हालांकि सूफी की यदि कोई वास्तविक परिभाषा या पहचान है तो वह यह है कि वह कोई धर्म नहीं, क्योंकि धर्म वह होता है जिसे धारण किया जाए, जिसके सिद्धांतों पर स्वयं को ढाला जाए। जिसके रीति-रिवाजों पर अमल किया जाए। जिसके उसूलों को जीवन में उतारा जाए। परंतु सूफीवाद कोई धर्म नहीं है, न ही इसका किसी धर्म से कोई नाता है। यदि सूफी की कोई परिभाषा है तो वह है ‘प्रेम’ वह भी असीम, निर्भय, स्वच्छंद प्रेम।

हैरत की बात तो यह है कि खुद सूफी से पूछा जाए कि सूफी कौन होता है? या तुम कौन हो? तो वह कहता है ‘कोई नहीं, कुछ नहीं’ शायद ‘कुछ न होना’ ही सूफी की पहचान है और सूफी की परिभाषा भी।
तुकस्तान में सूफियों को लेकर एक प्रसिद्ध कहावत है ‘जो दिख गया वह सूफी नहीं, जो पहचाना गया वह सूफी नहीं।’ किसी ने सूफी संत मंसूर से पूछा था कि ‘सूफी संत की सबसे बड़ी ऊंचाई क्या है? सूफी संत का उच्चतम अनुभव क्या है?’ तो मंसूर ने हंसकर एक ही जवाब दिया और कहा ‘शब्दों में जिसे कहा जा सके वह सूफी संत नहीं होता।’

सूफियों को किसी धर्म, जाति, संप्रदाय आदि में नहीं बांटा जा सकता यहां तक कि सूफी लिंग भेद की पहचान से भी बहुत ऊपर होते हैं। भले ही उनका शरीर किसी भी लिंग, जाति, धर्म या संप्रदाय आदि से ताल्लुक रखता हो परंतु स्वयं उनकी कोई जात नहीं होती। संत ‘बुल्लेशाह’ बड़ी ही प्यारी बात कहते हैं-

‘कि जाणां मैं कोई रे बाबा, कि जाणां मैं

कोई। जो कोई अंदर बोले चाले ज़ात असाडी साई। जिसदे नाल मैं नेहुं लगाया ओहो जिहा मै होई।’

बुल्लेशाह कहते हैं ‘मुझे क्या पता कि मैं कौन हूं। मैं खुद नहीं जानता मैं कौन हूं। मैं तो बस इतना जानता हूं जो मेरे अंदर बैठा है मेरा भगवान, बस मैं उसी से बातचीत करता हूं। उसी के साथ मस्त रहता हूं। वही मेरा यार है वही मेरी जात है। उसी के साथ मेरा नेह जुड़ा हुआ है और मैं बस उसका ही हूं।’
सूफी संत कहते हैं ‘जो इश्क में अपनी खुदी (अहं) और हस्ती को गंवा देता है वही सच्चा फकीर है’ और अपने अहं को मुहब्बत के ज़रिये ही मिटाया जा सकता है।

सूफी संत ‘सुल्तान बाहू’ कहते हैं ‘नफ्स (अहं) एवं मन ही आत्मा को परमात्मा से अलग रखने वाली शक्ति है। जिसके कारण माया खुदी, द्वैत, संशय आदि जैसे कई विकार पैदा होते हैं। केवल प्रेम ही मन को वश में करके इन दुखों से छुटकारा दिला सकता है। प्रेम खुदी को मारने का अचूक उपाय है तथा इसी के ज़रिये रूहानी राह पर तरक्की होती है।’

प्यार हमें ताजा, नया, कोरा एवं ऊर्जावान बना देता है। प्यार हमें पवित्र कर देता है और यही पवित्रता हमें परमात्मा को पाने का पात्र बनाती है। किसी सूफी ने कहा है ‘वह पाकों का पाक परवरदिगार, पाक लोगों को ही अपनाता है।’ शायद यही कारण है कि प्रभु भक्ति के मार्ग पर चलने वालों ने पूजा-पाठ एवं बाहरी आडंबरों आदि को छोड़कर प्रेम का मार्ग अपनाया जिसे हिंदुओं में ‘प्रेम मार्गी निर्गुण भक्ति’ तथा इस्लाम में ‘सूफी भक्ति या साधना’ कहा गया। फकीरों, दरवेशों, संतों और महात्माओं ने प्रेम को कई नाम दिए हैं- जैसे मुहब्बत, प्यार, इश्क, प्रीति, भाव, भक्ति, अनुराग स्नेह आदि।

सूफियों का कहना है ‘सच्चा इश्क ही मालिक की दरगाह में पहुंचने की सीढ़ी है। सूफी, इश्क को दो भागों में विभाजित करते हैं ‘इश्क-ए-मजाज़ी’ तथा ‘इश्क-ए-हकीकी’। इश्क-ए-मजाज़ी अर्थात् लौकिक, सांसारिक, शारीरिक प्रेम, जिसे पाकर सिर्फ मिजाज़ ठीक हो जाए, पल भर को मजा मिल जाए। और ‘इश्क-ए-हकीकी’ अर्थात् अलौकिक, आत्मिक, रूहानी प्रेम। उस हकीकत से प्रेम जो है। जो सबसे बड़ी हकीकत है यानी खुदा। जिसको पाने के बाद, पाने को कुछ और नहीं बचता। जिस पर इंसान का सच्चा हक है, ऐसी हकीकत से प्रेम ही इश्क-ए-हकीकी कहलाता है। और सूफी का प्यार इश्क-एक-हकीकी है इश्क-ए-मजाज़ी नहीं।

सूफी समा जाना चाहता है। मिल जाना चाहता है उस परम शक्ति, परम सत्ता, खुदा की दुनिया में। सूफी खाक हो जाना चाहता है, फना होना चाहता ताकि उसका द्वैतवाद छूट सके और वह अद्वैत में खो सके, उस नूरानी शक्ति के साथ एक हो सके। यही फर्क है आम मुहब्बत और सूफी मुहब्बत में। इश्के मजाज़ी और इश्के हकीकी में। खुदा रूपी सागर में जो जितना गहरा जाता है उतना ही ऊपर उठता है। यही सच्चे प्रेम की निशानी है और यही उंचाई। सूफियों का प्रेम सच्चा प्रेम है इसलिए उनका प्रेम उच्च है और वह श्रेष्ठ है।

सूफी अपने गुरु में, परमात्मा में, महबूब में ऐसे समा जाता है कि वह खुद नहीं बचता। उसका खाक हो जाना ही उसकी ऊंचाई है। यह सूफी की वह स्थिति जब रांझा और हीर, हीर-रांझा हो जाते हैं। कृष्ण और राधा, राधा-कृष्ण हो जाते हैं। लाख टके की बात तो यह है कि इश्क की इस स्थिति में आत्मा-परमात्मा में विलीन हो जाती है। आत्मा ही परमात्मा हो जाती है। बूंद सागर हो जाती है।

सूफी अर्थात् जिसका प्रेम ही पथ है और प्रियतम ही मंजिल। ऐसे में अपने प्रियतम तक पहुंचने के लिए प्रिय के कोई बने-बनाए रास्ते या बंधे-बंधाए नियम, सिद्धांत या कानून नहीं होते, क्योंकि प्रेमी सदा परीक्षा में जलता है और प्रियतम तक पहुंचाने वाला शेख अर्थात् गुरु कब, कौन सी, कैसी परीक्षा लेगा? यह स्वयं शिष्य या सूफी भी नहीं जानता। इसलिए सूफी के लिए चारों दिशाएं हैं। कोई बने-बनाए पुराने रास्ते नहीं होते, कोई नक्शा या तरकीब नहीं कि किसी दूसरे को देखा और पहुंच गए।

सूफी तो बस अपने प्रियतम के प्यार में दिवाना होता है। उससे मिलने के इंतजार में बावला होता है। और सच तो यह है बेकरों या बेखबरों का भी कोई दर्शन होता है? कोई धर्म होता है? वह तो बस अपने के मिलन में व्याकुल होता है। तो ऐसे में सूफी को या सूफीवाद को किसी धर्म से जोड़ना गलत ही नहीं निरर्थक भी है, क्योंकि अपने ईष्ट के प्रति यह अवस्था किसी की भी हो सकती है और जब भी कोई इस स्थिति से गुज़रता है तो वह हर बंधन से परे हो जाता है।

सूफी वह है जो अपने भगवान को अपने शरीर से बाहर, संसार में नहीं, अपने भीतर, अंतस ही खोजता है और अंदर ही महसूस भी करता है। वह अपने रब को अपने अंदर ही पाता है। उसके सारे सुकून के रास्ते भीतर की ही ओर रुख करते हैं। वह अपने अंदर की पुकार के अनुसार चलता है। अंदर का प्रकाश ही उसे राह दिखाता है। भीतर झांकना और उस प्रकाश की लौ से रूबरू होना जटिल कार्य है, एक गहरी साधना है। सूफियों का मार्ग या जीवन भी इन्हीं की तरह के गूढ़, सूक्ष्म रहस्यों से सराबोर होते हैं। जिसे शब्दों के माध्यम से परिभाषित करना या धर्म की दीवारों में कैद करना सूफीवाद के खिलाफ होगा।

एक सूफी का जीवन तर्क और सिद्धांतों से कोसों दूर होता है। उसका सारा प्रयास अपनी आत्मा के उत्थान के लिए होता है। सारी कोशिश स्वयं को ऊंचा उठाने की होती है। स्वयं के निरीक्षण-परीक्षण की होती है।

इसके बावजूद कि सूफीवाद कोई, धर्म, संप्रदाय या पंथ आदि नहीं है फिर भी यह इस्लाम धर्म से जुड़ गया या संप्रदाय या पंथ भी बन गया क्योंकि इसका आरंभ इस्लामी देशों से, मुसलमानों द्वारा हुआ तथा जो इस्लामी संत प्रेम के सहज भाव के कारण पहुंचे थे उनकी देखा-देखी कुछ लोग उनका अनुकरण करने लगे। और अनुकरण सदा बनावटी ही होता है कभी सहज एवं स्वत: नहीं होता। इसलिए उस पथ का नाम सूफी पथ हो गया।

परमात्मा की प्यास कोई भी किसी के अंदर पैदा नहीं कर सकता वह स्वत: ही पैदा होती है। असली तड़प के लिए असली लगन चाहिए। वह खुमारी चाहिए। लेकिन धीरे-धीरे समय के चलते सूफी प्रैक्टिस अर्थात् सूफी अभ्यास चालू हो गया। अर्थात् अंतर जगत में झांकने के अंतर्ज्ञान को उपलब्ध होने के, अपने प्रियतम तक पहुंचने के कई मार्ग, कई ढंग बन गए। कई विधियां निर्मित हो गईं और लोग अभ्यास द्वारा उन विधियों को पकड़कर उनका अनुकरण करने लगे। और ऐसे ही परमात्मा को प्रेम, प्रज्ञा व आत्मबोध से पाने के नियम व सिद्धांत बन गए। और सूफी सूफीवाद, सूफी धर्म या सूफी पंथ आदि के नामों से पहचाना जाने लगा।

सूफी का जीवन अपने आप में एक त्याग, तपस्या या साधना होता है। क्या प्रेम, लगन, भक्ति आदि अभ्यास से आ सकती है? क्या प्रेम करने के लिए किसी के प्रशिक्षण की जरूरत है? क्या अनुयायी होने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत है? वह साधना ही कैसी जिसमें सारी परीक्षाएं पहले से ही ज्ञात हों? वह प्रेम ही कैसा जो सीखकर किया जाए? लेकिन ऐसा हुआ। यह क्यों हुआ, कैसे हुआ? यह एक मुद्दे का विषय है लेकिन यह सत्य है कि वास्तविक सूफी का किसी धर्म, संस्था, पंथ या संप्रदाय आदि से कोई नाता नहीं? यदि सूफी का नाता है, तो वह है आत्मा से। सूफी का कोई मार्ग है तो वह है प्रेम मार्ग। सूफी की परिभाषा है, जो मिट गया, जो मिल गया, जो घुल गया अपने उस प्रियतम, परमात्मा के रहस्यमयी संसार में और एक हो गया। जिसे उसके रब ने आत्मसात कर लिया या वह उसमें समा गया।
सूफी सिर्फ अपने शरीर को मंदिर ही नहीं मानते बल्कि उसकी (खुदा) खोज के लिए यात्रा भी अंदर की करते हैं। सूफी संत शरीअत को यानी धार्मिक कर्मकांडों को भी पाखंड मानते हैं तथा उसके सख्त विरोधी होते हैं। सूफी कहते हैं ‘काबा हमने दिल में ही पा लिया है। हम अंदर ही नमाज़ पढ़ते हैं तथा नमाज़ अदा करने के सभी सामान जैसे कूज़ा, मुसल्ला आदि भी हमारे अंदर ही मौजूद हैं। परमात्मा के प्रेम में लीन होकर हम अंदर ही अंदर तवाफ (परिक्रमा) व सजदा करते हैं। हम सही अर्थ में हाजी बन गए हैं।’

सूफियों का मानना है कि धर्म-कर्म, रीति-रिवाज, शरीअत-कर्मकांड आदि सभी बाहर की क्रियाएं हैं। यह इंसान को रूहानियत का जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं, लेकिन यह अपने आप में रूहानियत नहीं है। असली रूहानियत उस रूहानी ताकत से लगन लगाने में हासिल होती है और जिन्हें अपने अंदर रूहानी दौलत मिल जाती है, वह बाहरी कर्म कांडों की परवाह नहीं करते।

सूफी किसी लालच में प्रेम नहीं करता। उसकी इबादत में न बहिश्त (स्वर्ग) की चाह होती है न ही दोज़ख (नरक) का भय। वह इन सब से बहुत ऊपर होता है। राबिआ की प्रार्थना, सूफी के दिल का, उसकी प्रार्थनाओं का यही भाव दर्शाती है। राबिआ इबादत में खुदा से कहती है-


हे मालिक! इस लोक में तूने मेरे लिए जो कुछ पुरस्कार निश्चित किया हो, वह तू अपने विरोधियों को दे दे। इसी प्रकार परलोक में मेरे लिए जो इनाम तूने तय किए हैं, वे अपने प्रेमियों को दे दे। मेरे अपने लिए तो केवल एक तू ही पर्याप्त है। तेरे अतिरिक्त मैं और कुछ भी नहीं चाहती। यदि मैं दोज़ख (नरक) के डर से तेरी आराधना करती हूं तो मुझे उसी दोज़ख की आग में फेंक दे और यदि मैं बहिश्त (स्वर्ग) के लोभ से तेरी सेवा करती हूं तो मेरे लिए बहिश्त का दरवाजा सदा को बंद कर दे, किंतु यदि मैं तेरी प्राप्ति के लिए ही तेरी पूजा करती हूं तो अपने परम प्रकाशमय, पूर्ण पवित्र, निर्मल, निर्दोष, अपार सुन्दर स्वरूप के दर्शन से मुझे वचिंत मत करना।’

सूफी का इश्क ‘रब्बी इश्क’ होता है। सूफी सारे बंधनों, मान्यताओं, नियम एवं सिद्धांतों आदि को तोड़कर प्यार करता है। सूफी वह है जो आशिक है रब का। जो खुद को लुटाना जानता है, जिसका मान-ईमान सब खुदा है। जिसकी बस एक ही प्यास है, एक ही जरूरत है और वह है परमात्मा की प्राप्ति अर्थात् उसके साथ एक होने की ख्वाहिश। जिसके आगे दुनिया के सभी सुख-साधन फीके हैं। प्रेम ही रब है, वही सर्वोच्च है। सूफी कहते हैं संसार में रहकर, आकर यदि जिसने प्रेम नहीं किया, समझो उसने कुछ नहीं किया। ऐसे इंसान की पूजा व दुनियादारी सभी बेकार है।

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