वट सावित्री का पर्व विवाहिताओं के लिए अक्षत सुहाग की कामना का प्रतीक है। सीता और सावित्री की संस्कृति वाले देश में वट अमावस्या स्त्रियों के अदम्य साहस को भी दर्शाती है। वैवाहिक परंपरा में आज कितना ही अवमूल्यन क्यों न हो गया हो, लेकिन आज भी एकता का तार भारतीय विवाह परंपरा को मजबूती से बांधे हुए है। पाश्चात्य संस्कृति के बाद भी भारतीय परंपराएं पुरानी नहीं पड़ी हैं। इसी में एक परंपरा का द्योतक ‘वट सावित्री अमावस्या’ है। 

सावित्री उन नारी शक्तियों में से एक है जिनके आगे यमराज को भी हारना पड़ा। सावित्री का परिचय कराने की शायद ही कोई जरूरत हो, अगर मजबूत इरादे वाली नारी की बात हो रही हो तो पौराणिक कथाओं में सावित्री का नाम जरूर आता है। सावित्री ही वो स्त्री हैं, जिसने वट वृक्ष का पूजन और व्रत करके ही अपने सतीत्व और तप के बल से अपने मृत पति सत्यवान को धर्मराज से जीतकर पुन: जीवित कर लिया था। यही कारण है कि इस व्रत का नाम ‘वट सावित्रीÓ पड़ा। शास्त्रों में कहा गया है कि वट (बड़, बरगद) वृक्ष के मूल भाग में ब्रह्मï, मध्य में श्री विष्णु तथा अग्रभाग में महादेव का निवास होता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष पर ही श्री कृष्ण ने मार्कंडेय ऋषि को अपने बाल रूप के दर्शन कराए थे।

पूजन विधि- इस व्रत को ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से अमावस्या अथवा पूर्णिमा तक करने का विधान है, लेकिन ज्यादातर लोग इस व्रत को अमावस्या को ही करते हैं। यह एक प्रभावी व्रत है। उक्त तिथि को वट-अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु तथा अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिनों का उपवास रखती हैं। इस दिन वट वृक्ष का पूजन किया जाता है। जिस प्रकार वट वृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है, उसी तरह दीर्घ आयु, अक्षय सौभाग्य तथा पूर्ण सुख-समृद्धि के लिए वट वृक्ष की आराधना की जाती है। इसके साथ ही सत्यवान, सावित्री और यमराज की भी पूजा की जाती है। बड़ की जड़ में पानी भी दिया जाता है। जल से वट वृक्ष को सींचकर व्रती स्त्रियां तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करती है। इसके उपरांत व्रत रखने वाली स्त्रियां सत्यवान सावित्री की कथा सुनती हैं।

मौत पर यों कोई विजय प्राप्त नहीं कर पाता। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर इच्छा शक्ति और अदम्य साहस हो तो मौत भी दरवाजे से लौट सकती है। मद्रदेश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने यही कर दिखाया। राजकन्या की कुंडली देखकर ज्योतिषियों ने पहले ही कह दिया था कि वह सर्वगुणी होगी, लेकिन उसका पति अकाल की मौत के मुंह में चला जाएगा। सावित्री ही उसको जीवनदान दिलाएगी। नन्हीं सी बालिका की शक्ति पर किसको यकीन होता। वह चंद्रमा की भांति बढ़न लगी। 

एक दिन ऐसा भी अवसर भी आया जब वह विवाह योग्य हो गई। राजा द्युमुत्सेन के पुत्र सत्यवान से उसका विवाह तय हो गया। नारद को पता लगा तो उनसे रहा नहीं गया। वह भागे-भागे राजा के पास पहुंचे और कहा कि अपनी पुत्री को विवाह करने से रोकिए, वह जानती नहीं कि सत्यवान की आयु नहीं है। एक ही साल के भीतर उसके प्राणंत हो जाएंगे। राजा भी परेशान हुए लेकिन सावित्री ने अपने सवालों से उनको निरुत्तर कर दिया। सावित्री ने कहा कि विवाह जीवन में एक बार होता है। वह तो सत्यवान को अपना वर मान चुकी है। यदि उसकी आयु नहीं लिखी है तो कोई क्या कर सकता है, लेकिन यदि विवाह के बाद आपको सारी जानकारी मिलती तो आप क्या करते? राजा ने कन्या को काफी समझाया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई। आखिरकार सावित्री के विवाह के बाद भी उसकी परेशानियां कम नहीं हुई। विवाह सूत्र में बंधकर आई तो ससुर का राजपाट शत्रुओं ने छीन लिया। दुखियारी सावित्री को इतनी मुसीबतों में भी ईश्वर याद रहते। वह सोचती कि ईश्वर संभवतया उसकी परीक्षा ले रहे हैं। पति की मृत्यु से तीन दिन पहले उसने व्रत रखना शुरू कर दिया। पति की मृत्यु तिथि पर सावित्री ने पितरों का तर्पण किया। प्रतिदिन की तरह सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने लगा। उस दिन सावित्री भी उसके साथ चली गई। अचानक सत्यवान के सिर मेें असहनीय पीड़ा हुई। सावित्री समझ गई कि सत्यवान की मौत निकट आ गई। सत्यवान अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर लेट गया। तभी उसको सामने से यमराज आते दिखाई दिए। सत्यवान के प्राण लेकर वह जैसे ही आगे बढ़े, सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दी। यमराज ने रोका-टोका लेकिन सावित्री चलती रही। यमराज ने कहा कि मृत्यु तो शाश्वत सत्य है। यह यात्रा हर व्यक्ति को अकेले ही तय करनी पड़ती है। तुम्हारे पति की आयु इतनी ही थी। यही ईश्वर का विधान है। आदमी अकेला आता है और अकेला ही जाता है, लेकिन सावित्री पर यमराज की बातों का कोई असर नहीं पड़ा। अंत में यमराज ने सावित्री से कहा कि तुम चाहो तो वर मांग लो। सावित्री ने पहला वर मांगा कि उसके सास-ससुर नेत्रहीन हो गए हैं। उनको नेत्र ज्योति प्रदान करिए। यमराज ने हंसते हुए तथास्तु कह दिया। इस वर प्राप्ति के बाद भी सावित्री यमराज के पीछे चलती रही। दूसरे वर के रूप में सावित्री ने अपने ससुर का छिना हुआ राजपाट मांग लिया। अन्य दो वरों में उसने सदा-सर्वदा ईश्वरीय भक्ति और कृपा मांगी। पांचवे वर के रूप में सावित्री ने अक्षत सुहाग का वरदान मांग लिया जैसे ही यमराज तथास्तु कह आगे बढ़े, सावित्री ने उनको रोक दिया। सावित्री ने कहा कि आपने ही अक्षत सुहाग का वरदान दिया है और आप ही उसके पति को ले जा रहे हैं। पति ही नहीं होगा तो अक्षत सुहाग कहां रहेगा। यमराज हतप्रभ रह गए। वह सावित्री के आगे हार गए थे। यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और व्यवस्था भी दी कि जो कोई ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मेरा स्मरण करेगा, उसका सुहाग अक्षत रहेगा।

यह अमावस्या वट सावित्री के नाम से जानी जाएगी। अस्तु, वरदान प्राप्त करके सावित्री वट वृक्ष के नीचे आई। यहां उसके पति की निर्जीव देह पड़ी थी। थोड़ी देर में ही निर्जीव देह में प्राणों का संचार हो गया। इसी व्रत के माहात्म्य से सत्यवान सावित्री ने सौ पुत्र पैदा किए। इस प्रकार सौभाग्य की रक्षा के लिए यह व्रत प्रचलित हुआ।

वट सावित्री व्रत में वट वृक्ष के पांच पत्तों की पूजा होती है। ये पत्ते पंचतत्त्वों और सावित्री द्वारा मांगे गए पांच वरदान के प्रतीक हैं। वट सावित्री व्रतोपवास तीन दिन होता है। यह उस घटना का स्मरण है जब सावित्री ने पति के मृत्यु दिवस से तीन दिन पहले ही व्रत रखना शुरू कर दिया था। इसलिए वट सावित्री का पर्व हर दृष्टि से काल पर विजय का पर्व है। 

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