जाहिर है, कोई बीमारी नहीं चाहता। कोई भी रोगी होने का चुनाव नहीं करेगा, है कि नहीं? कोई भी बीमार पड़ना नहीं चाहता; हर व्यक्ति स्वस्थ होना चाहता है, यह ठीक है, लेकिन इसके साथ-साथ तुम यह जरूर समझ लो कि जब तुम्हारे पास एक शरीर है फिर बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु जीवन की नैसर्गिक प्रक्रियाएं हैं। तुम बीमार होने का चुनाव नहीं कर रहे हो, लेकिन तुम यह जान लो कि जब तुम्हारे पास एक भौतिक शरीर है, किसी भी क्षण बीमार पड़ सकते हो। यह बिल्कुल ठीक है, तुम इसका खयाल रखते हो कि तुम बीमार नहीं हो। लेकिन अगर तुम बीमारी या स्वास्थ्य के संबंध में बहुत अधिक चिन्तित रहते हो, तो यह स्वयं एक बीमारी बन जाती है।

बीमारी तुम्हें सीमित करके रखती है, यही कारण है कि तुम इसे पसंद नहीं करते हो, है कि नहीं? तुम बीमारी को पसंद नहीं करते हो, क्योंकि कई तरह से यह तुम्हारे जीवन को सीमित करके रखती है, लेकिन बीमारी का बस डर भी तुम्हारे जीवन को सीमित करता है और संभवत: तुम्हारे जीवन काल को भी, है कि नहीं? यह स्वयं में एक बीमारी है। केवल तुम ही नहीं हो, कई सारे लोग हैं जिन्हें यह डर है। विशेषकर जब वे चालीस या पैंतालीस वर्ष की अवस्था को पार करते हैं, बीमारी का उनका डर विशाल हो जाता है। जब वे युवा थे, वे ऐसा नहीं सोचते थे। तुम्हारा डर बीमारी का नहीं, तुम्हारा डर मृत्यु का है। बीमारी तो एक निकास है। तुम जानते हो कि बीमारी मृत्यु की ओर पहला कदम है।

इसलिए मूल रूप से, भय हमेशा मृत्यु का होता है। प्राय:, सामाजिक परिस्थितियों में, लोग तुम से कहते आ रहे हैं, तुम्हें विश्वास दिलाते आ रहे हैं कि मृत्यु का डर विल्कुल स्वाभाविक है। समस्या यह है कि बहुसंख्यक वर्ग जो भी कर रहा होता है, लोग कहते हैं कि वह स्वाभाविक है। अगर सिगरेट पीने वाले लोग बहुसंख्यक होते तो लोग कहते, ‘धूम्रपान एक स्वाभाविक चीज है, हां या नहीं? एक खास वर्ग के लोग अभी भी ऐसा कहते हैं, ‘धूम्रपान के साथ गलत क्या है? यह बिल्कुल स्वाभाविक है। एक मनुष्य धुआं पीने के लिए नहीं बना हुआ है; तुम कोई मोटर गाड़ी या ऐसा कुछ नहीं हो! (हंसते हैं)। तुम्हारे लिए धुआं पीना स्वाभाविक नहीं है, लेकिन लोग इसे स्वाभाविक बना देंगे। इस तरह से मृत्यु का भय सामाजिक स्थितियों के द्वारा स्वाभाविक बना दिया गया है, लेकिन यह ऐसा नहीं है।

एक खास तरह की अज्ञानता और अचेतनता के कारण मृत्यु का भय समा गया है। यह स्वाभाविक नहीं है। संभवत: अधिकांश लोगों ने यह मान रखा है, लेकिन मृत्यु से डरना कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है, है कि नहीं? मौत से डर लगता है। इसका बुनियादी कारण यह है कि तुम वास्तविकता के संपर्क में नहीं हो। इस शरीर के साथ तुम्हारी पहचान इतनी मजबूत हो गई है, क्योंकि तुमने दूसरे आयामों का कभी अन्वेषण नहीं किया। अगर तुमने अनुभव के दूसरे आयामों का अन्वेषण किया होता, फिर शरीर कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं होता, लेकिन अभी तुम्हारे जीवन का संपूर्ण अनुभव इस शरीर तक सीमित है। अगर तुम से कोई कहता है, ‘तुम शरीर नहीं हो, कोई तुमसे कहता है, ‘तुम आत्मा हो, यह कोई मायने नहीं रखता। चाहे जो भी अनर्गल चीजें वे तुम्हें सिखाएं, तुम्हारे अनुभव में यही तुम हो। चाहे कितनी भी गीता वे तुम्हें सुना दें, तुम्हारा अनुभव भौतिक शरीर तक सीमित रहता है। इसे खोने का भय स्वाभाविक है, लेकिन अगर तुम अनुभव के दूसरे आयामों में प्रवेश करते हो, अगर तुम स्वयं को अनुभव के दूसरे आयामों में आरूढ़ करते हो, फिर शरीर को संचालित करना एक आसान सी बात होगी। जीवन या मृत्यु कोई बहुत बड़ा अंतर पैदा नहीं करेगा। तुम जो कुछ भी कर रहे हो, केवल उसी संदर्भ में जीवन या मृत्यु होता है।

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