साधारणतया हम एक दोष या त्रुटि से दूसरे दोष या त्रुटि की ओर गति कर जाते हैं। जैसे कोई लोभी है और उसके इस विकार के कारण तुम क्रोधित हो उठे। यदि उसके एक दोष के कारण तुममें एक दूसरा दोष उत्पन्न हो जाता है तो तुम उससे भिन्न कैसे रहे? ऐसा करने में तुम केवल त्रुटियों के स्वाद ही बदल रहे हो। किसी भी विकृति को दूसरी विकृति में बदल देने से तुम पूर्ण नहीं हो जाते। प्राय: ऐसा ही होता है कि व्यक्ति विकृतियों को ही बदलता रहता है-कामवासना क्रोध बन जाती है। क्रोध, ईर्ष्या या लोभ या भ्रम का रूप ले लेता है। हम एक अपूर्णता या विकार या दोष से दूसरे विकार में चढ़ते-उतरते रहते है। तुम्हें हर कीमत पर अपने मन को इनसे बचाना है। यदि तुम भिन्न-भिन्न कार्य और उनके दोषों को गहराई में देखो तो तुम पाओगे कि वे कार्य किन्हीं परिस्थितियों और नियमों के अंतर्गत घट रहे हैं, इसलिए उनके दोष या अपूर्णताओं को अपने भीतर हृदय में मत उतरने दो और क्रोधित मत हो। ईर्ष्या क्रोध से भी बुरी है। हम दूसरों के कृत्यों में कोई अभिप्राय: देखते हैं उससे हमारा मन मलिन हो जाता है।

एक अशुद्धि के स्थान पर दूसरी अशुद्धि आ जाती है, जिससे और भी गड़बड़ हो जाती है। इन विकारों से हम साधना के द्वारा ही बच सकते हैं। केवल साधना ही हमारा आंतरिक सन्तुलन स्थिर रखने में सहायक हो सकती है। यह सारा अस्तित्व प्रकृति और उसकी विकृति से मिलकर बना है। प्रकृति का स्वभाव और उसमें होने वाला विकार। क्रोध हमारा स्वभाव नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वभाव के प्रतिकूल है। ऐसे ही ईर्ष्या हमारा स्वभाव न होकर उसके विपरीत आया हुआ विकार है। हम क्यों क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और कामवासना को अशुद्धि मानते हैं? ये सब प्रकृति में हैं। तुम किसी कुत्ते को छेड़ कर देखो तो कैसे वह तुम्हारे ऊपर गुर्राता है, या किसी छोटे बच्चे को तंग करो तो वह भी क्रोध में आ जाता है। कामवासना तो सारी प्रकृति में विद्यमान ही है व इसी से तो सृष्टिï का सृजन हुआ है। इच्छाएं और वासनाएं भी प्रकृति का ही भाग हैं। फिर हम उन्हें विकृति या विकार की संज्ञा क्यों देते हैं? क्यों वे अशुद्ध हैं? क्योंकि इनके द्वारा हमारी चेतना पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती।

पाप वही है जिसके कारण हमारी चेतना (आत्मा) की आभा पूर्ण रूप से चमक नहीं पाती। यदि हम कुछ ऐसा करते हैं, जिससे हमारी आत्मा या हमारा अन्तरंग स्वभाव खिल नहीं पाता या जिससे हमारी सत्य-परायणता फीकी पड़ती है या उसमें कमी आती है, उसे हम पाप कहते है।। पाप तुम्हारा स्वभाव नहीं है। पाप तो केवल कपड़े की सतह पर पड़ी हुई सलवटें हैं। बस उन सलवटों को ठीक तरह से निकाल देना है। उनको सीधा कर देना है। बस। शुद्धता तीन प्रकार की है। एक है कृत्य में, दूसरी वाणी में शुद्धता, और तीसरी भावना में। ये तीनों प्रकार की परिपूर्णताएं एक ही व्यक्ति में होनी अत्यन्त दुर्लभ हैं। यह असंभव तो नहीं परंतु दुर्लभ अवश्य हैं। कुछ लोग कार्यकुशल तो बहुत होते है। परंतु भीतर से क्रोध और क्लेश के भाव से भरे हुए होते हैं। यद्यपि वे बाह्यï कार्य तो बहुत बढ़िया करते हैं, परंतु वे वाणी और भावना के स्तर पर सम्पूर्ण नहीं होते। कुछ लोग बाहर से झूठ आदि भी बोलते हों या उनकी वाणी इतनी शुद्ध न भी हो, परंतु भीतर के भाव सुंदर होते है।। जैसे एक डॉक्टर मरीज को कह देता है कि ‘तुम जल्दी ठीक हो जाओगे, यद्यपि भीतर से वह जानता है कि मरीज ठीक नहीं भी हो सकता, परंतु वह मरीज को निगाह में रखकर ऐसा बोलता है। भीतर उसकी भावना शुद्ध है, चाहे बोलने में वह थोड़ा झूठ भी कह रहा है। वाणी तो अशुद्ध है, परंतु पीछे छिपा भाव शुद्ध और पूर्ण है।

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