anger and consciousness
anger and consciousness

Conscious Anger: तुमसे क्रोध तभी होता है, जब तु हारी चेतना जाग्रत नहीं होती। अब ऐसा हो गया तो हो गया, बस भूल जाओ अब। बात खत्म। अब, इस समय, इस वर्तमान क्षण में रहो, जाग्रत हो जाओ।

विनम्रता हमारी आत्मा की पूर्णता का द्योतक है। क्रोध तो तु हारे चैतन्य की एक विकृति मात्र है, और यह तु हें नीचे की ओर ले जाता है। इसलिए इसे पाप कहा गया है। परंतु विकार तु हारी चेतना पर बहुत उथले रूप से छाए बादलों की भांति है भारत में एक पुरानी कहावत है कि पापों को धोने के लिए गंगा में डुबकी लगा लो और जैसे तु हारे शरीर से बाहर की धूल-मिट्ïटी और साबुन धुल जाता है, वैसे ही पाप भी धुल जायेंगे, क्योंकि या भी सिर्फ ऊपर लगी धूल मिट्ïटी के ही समान हैं। हृदय से निकली
एक प्रार्थना ही तु हें सारे भूतकाल के पापों से मुक्त कराने में पर्याप्त है।

तु हें अपनी गलती का पता ही तब चलता है, जब तुम निर्दोष हो जाते हो। जब तुम गलती कर चुकते हो और उससे बाहर आ जाते हो, तभी तहें उस गलती का ज्ञान होता है। बीते हुए काल में जो गलती तुमसे हुई या और भी जो कुछ हुआ, अब इस वर्तमान क्षण में, तुम अपने को पापी या उस गलती का कर्त्ता मानकर दुखी मत होओ, क्योंकि वर्तमान क्षण में तुम फिर से नए, शुद्ध और निष्कलंक हो। भूतकाल की गलतियां भूतकाल के साथ विलीन हो गईं। जब इस क्षण में ज्ञान का उद्घाटन हो गया
तो तुम एक बार फिर पूर्ण और पवित्र हो गए। यही विवेक है।

माताएं प्राय: ऐसा ही करती हैं। वे बच्चों पर बुरी तरह बिगड़ती हैं और उन्हें बुरा भला कहती हैं और बाद में अपराध भाव से भरकर कहती हैं, ‘ओहो बेचारा, मैंने इस पर इतना क्रोध किया, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था’, अब वे बहुत समय तक इसी पश्चाताप में घिरी रहती हैं और पश्चाताप के कारण वे अपने को फिर से क्रोध करने के लिए तैयार कर लेती हैं।
ठीक है, जीवन में कभी-कभी क्रोध के क्षण भी आते हैं। तुमसे क्रोध तभी होता है, जब तु हारी चेतना जाग्रत नहीं होती। अब ऐसा हो गया तो हो गया, बस भूल जाओ अब। बात खत्म। अब, इस समय, इस
वर्तमान क्षण में रहो, जाग्रत हो जाओ। बस। कृष्ण भी अजु र्न से यही कहते हैं, ‘अजु र्न, तुम सोचते हो, तुम वह नहीं करोगे, जो तु हें करना चाहिए? मैं कहता हूं यद्यपि तुम न चाहो तो भी तुम वही करोगे। कृष्ण बड़ी चतुराई से कहते हैं, ‘उचित तो यही है कि तुम स्वयं को मेरे प्रति समर्पण कर दो। सब कुछ छोड़कर मुझे समर्पित हो जाओ और जैसे मैं कहता हुं, वैसे ही करो। फिर कहते हैं, ‘मैंने जो भी तु हें
समझाना था, कहना था, कह दिया। अब तुम स्वयं सोचो और जो भी तु हें ठीक लगे, वैसा ही करो। फिर साथ ही कृष्ण कहते हैं ‘परंतु याद रखो, तुम करोगे वही, जो मैं चाहता हूं।’

संसार में जितना भी सृजनात्मक कार्य हुआ है, चाहे वह नृत्य के क्षेत्र में, संगीत में, ड्रामा या चित्रकला के क्षेत्र में, वह सब कुछ किसी अज्ञात शक्ति या केन्द्र से संचालित हुआ। बस सहज रूप से घट गया। तुम उसके कर्त्ता नहीं हो। इसीलिए एक कहानीकार या कवि कहता है, ‘यह सब मैंने नहीं लिखा। बस ऐसे ही यह मुझसे निकलना शुरू हो गया। एक मूर्तिकार भी ऐसा ही कहता है। एक अच्छे संगीतकार का भी यही अनुभव है और मैं कहता हूं कि यदि तुम किसी बड़े अपराधी से पूछो तो वह भी यही कहेगा, ‘मैं क्या करता, मैं रुक ही नहीं सका और मेरे से ऐसा हो गया।’
हमने जेलों में कई कोर्स करवाएं हैं और वहां हमने अनुभव किया कि अपराधी भी मनुष्य ही है, कोई पशु नहीं। वे भी भीतर से अच्छे होते हैं। वे स्वयं आश्चर्यचकित होते हैं कि उनसे ऐसा कैसे हो गया, क्योंकि वह भी महसूस करता है कि वह सब उसके द्वारा हुआ, उसने किया नहीं। यह ज्ञान ही तु हें
अपूर्णता से पूर्णता की ओर ले जा सकता है। इससे तु हारी चेतना पर पड़ी सलवटें और
झुर्रियां साफ हो जाती हैं।