प्रत्येक घटना के पीछे सदा एक दैवी प्रयोजन होता है। उस दैवी इच्छा के बिना कुछ नहीं घटता। मनुष्य का बड़ा होना, मानव जीवन का खिलना, इन सबके पीछे दैवी क्रम है। प्रत्यक्ष रूप में किसी भी घटना का जो भी कारण लगता है, वह उसका वास्तविक कारण नहीं। वास्तविक कारण तो उसमें ईश्वर की लीला है चाहे वह अच्छा हो अथवा बुरा सही हो या गलत। जब भी हम कहते हैं ‘ऐसा नहीं होना चाहिए था’, हम भूतकाल में चले जाते हैं। सच्ची भक्ति और प्रेम में तो भूत, वर्तमान और भविष्य पूर्ण स्वीकार होता है। वर्तमान की पूर्ण स्वीकृति ही वास्तविक भक्ति है।

इसका अर्थ कदापि नहीं कि कोई आलसी या निठल्ला हो जाए अथवा भविष्य का आयोजन ही न करे। यदि आप दिव्य और सात्विक गुणों से भरे हैं तो आपसे हर कार्य अच्छा व ठीक ही होगा और अगर आप तनाव और नकारात्मक वृत्तियों से ग्रसित हैं तो आपके शुभ विचार भी क्रिया में अशुभ परिणाम में बदल जाते हैं। अत: प्रगति की प्रक्रिया को सहज (निर्बाध) रूप से बहने देने के लिए यह अनिवार्य है कि हमारा मन भांति-भांति की बाधाओं से मुक्त हो। फिर भी यह बाधाएं आ ही जाएं तो इन्हे रास्ते के पत्थर की तरह नहीं बल्कि प्रगति की सीढ़ी की तरह स्वीकार लेना ही उचित है। फिर नीचे की ओर देखने की न कोई आवश्यकता है और न अवसर। नीचे देखा कि गिरे। प्रगति के पथ पर बाधा तो एक अवश्यम्भावी पड़ाव है। ऐसी प्रतीति होते ही बीते कल को स्वीकारना सहज हो जाता है। यदि तुम किसी चित्रकार की कलाकृति में त्रुटियां निकालने लगो कि ‘यहां ऐसा नहीं होना चाहिए था’ आदि, तो दोषी तो तुम चित्रकार को ही ठहरा रहे हो न? जैसे यदि नृत्य में दोष निकालते हैं तो नर्तक पर ही दोष आता है। ऐसे ही सृष्टि में अवगुण इंगित करना सृष्टा के अवगुण गिनना है। जब भी तुम्हें अपूर्णता का भास हो, या पीड़ा और दुविधा की अनुभूति हो कोई वस्तु या स्थिति तुम्हें तंग करती हो, जिसके साथ तुम जीना नहीं चाहते, तब तुम कहते हो कि यह तो अपूर्ण है, यह तो गलत है, ऐसा तो नहीं होना चाहिए था- क्या नहीं होना चाहिए था, जिससे तुम्हें पीड़ा, दुख-दर्द या बेचैनी होती है? यह तो भक्ति नहीं हुई। भक्ति और प्रार्थना में तो जीवन की पूर्णता का ज्ञान व सम्मान जुड़ा हुआ है।

देखो, सत्य, सुख-दुख दोनों से परे है। यदि तुम केवल सुखी होना चाहते हो तो क्षणिक रूप से हो सकते हो। परन्तु वह क्षणिक सुख बाद में किसी समस्या को पैदा कर सकता है। जो कुछ भी इस समय दुख देता मालूम होता है, वह बाद में वैसा नहीं रहता। हमें तो सुख-दुख से परे उसे देखना है, जो कभी नहीं बदलता। तुम में शाश्वत क्या है? तुम में अपरिवर्तनीय क्या है? तुम्हारे विचार, संवेदनाएं, भावनाएं बदल रही हैं, परिस्थितियां और लोग भी बदलते रहते हैं। इस परिवर्तन चक्र में देखो, क्या तुम में कुछ ऐसा है, जो कभी नहीं बदल रहा?

एक और विचारणीय तथ्य यह है कि तुम्हारा मन एक शीशे के समान है। कोई घटना घटी और यदि उसे तुम पकड़ कर बैठ जाओ कि ‘ऐसा तो नहीं होना चाहिए’ तो फिर बहुत समय तक तुम्हारा मन उसे घसीटता रहता है, और इस घटना की छाप मन पर जमी रहती है। मन तो शीशा है। शीशे के सामने यदि कोई भला व्यक्ति आ जाए तो शीशा उसे देर तक ठहरने के लिए नहीं कहता, और यदि कोई बुरा व्यक्ति आ जाए तो उसे दूर नहीं धकेलता। वह तो केवल उसे ऌप्रतिबिंबित करता है और जो है, उसे होने देता है। इसी तरह हमारा मन भी जब शीशे के समान सभी घटनाओं का साक्षी बन जाता है, तो ऐसी स्थिति में कर्मों के बंधन कट जाते हैं, भस्मीभूत हो जाते हैं। मन को शीशा ही रहना- बस इसका बोध सदा बना रहे। जब हम घटनाओं की अस्थिरता और क्षणिकता के प्रति जागरूक होने लगें, संसार में हम एक दिन आए हैं और एक दिन चले जाएंगे- इस सत्य के प्रति चेतन होने लगें। इधर-उधर की छोटी-छोटी बातें हमें अशांत कर देती हैं। किसी का कहा-सुना, किसी घटना का घटित होना या किसी घटना का घटित न होना, अपनी मान-मर्यादा, दूसरों की नजर में मेरा स्थान-ऐसी सब छोटी-मोटी बातें हमें हमारे वास्तविक स्वरूप से अलग किए रखती हैं।

प्रत्येक वस्तुस्थिति के दो पक्ष होते हैं। एक उज्ज्वल और दूसरा अंधेरा पक्ष। यदि दृष्टि उज्ज्वल पक्ष पर है तो हम अहोभाव से भर जाते हैं और यदि अंधेरे पक्ष पर हैं तो शिकवा-शिकायत करते हैं और निराश हो जाते हैं। किन्तु हमें इन दोनों पक्षों की अनुभूतियों से ऊपर जाना है और यही है आध्यात्मिक उन्नति।

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