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मृत्यु का भय – सद्गुरु

इस शरीर के साथ तुम्हारी पहचान इतनी मजबूत हो गई है, क्योंकि तुमने दूसरे आयामों का कभी अन्वेषण नहीं किया। अगर तुमने अनुभव के दूसरे आयामों का अन्वेषण किया होता, फिर शरीर कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं होता, लेकिन अभी तुम्हारे जीवन का संपूर्ण अनुभव इस शरीर तक सीमित है।

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