मैं जानता हूं। उन पचास प्रतिशत मित्रों को जो यहां हैं। उन्हें यहां नहीं होना चाहिए। यहां होने का उनका कोई कारण नहीं है। लेकिन मैं जिस तरह के काम में लगा हूं, यह काम ऐसा ही है जैसे कोई कुआं खोदता है। जब तुम कुआं खोदते हो तो पहले तो कूड़ा-करकट हाथ लगता है। स्वभावत:। ऊपर तो जमाने भर का कूड़ा-करकट जमीन पर इक_ा होता है। जब खुदाई करोगे तो कूड़ा-करकट पहले हाथ लगेगा। फिर और खोदोगे तो पत्थर-कंकड़-सूखी मिट्टी हाथ लगेगी। फिर और खोदोगे तो गीली मिट्टी हाथ लगेगी। फिर और खोदते ही चले जाओगे तो, जलधार हाथ लगेगी। फिर और खोदोगे तो, स्वच्छ धार के झरने मिलेंगे।

तो शुरू-शुरू में जब मैंने कुआं खोदना शुरू किया तो बहुत-सा कूड़ा-करकट भी आ गया। उसे हटाने की चेष्टा मैं लगा हूं। बड़ी मात्रा में तो हट गया है; मगर फिर भी कुछ लोग अटके रह गये हैं। वे त्रिशंकु की भांति हो गये हैं। वे मेरे साथ नहीं हैं। वे भी जानते हैं, मैं भी जानता हूं। वे मेरे  साथ हो सकते नहीं हैं, क्योंकि वे अपनी धारणाएं छोड़ने को राजी नहीं हैं।

मैं तो चाहूंगा कि ये मित्र धीरे-धीरे विदा हों यहां से। जिनका कोई मूल्य नहीं है।

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