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भैरव जी की महिमा अपरम्पार है: Bhairav Baba Mandir
Bhairav Baba Mandir

Bhairav Baba: दिल्ली के किलकारी बाबा- दिल्ली के पुराने किले में किलकारी बाबा का मंदिर है यहांं पर दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं देश की राजधानी दिल्ली में किलकारी बाबा का ये मंदिर पांडवों के समय का है। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में सफलता के लिए पांडवों ने राजसूय यज्ञ शुरू किया परन्तु यज्ञ शुरू होते ही बाधाओं का तांता ही लग गया। कोई न कोई विघ्न आता और यज्ञ अधूरा रह जाता था तब भगवान श्री कृष्ण के कहने पर भीम काशी से काल भैरव को लाने के लिए गए। क्योंकि कृष्ण के अनुसार काल भैरव में ही राजसूय यज्ञ को र्निविघ्न संपन्न कराने की क्षमता थी।
तब भीम ने काशी जाकर काल भैरव को इन्द्रप्रस्थ चलने के लिए मना तो लिया परन्तु इसके साथ ही भैरव जी ने भी अपनी एक शर्त रखी थी कि भीम को भैरव जी को काशी से इन्द्रप्रस्थ अविराम उठाकर लेकर जाना होगा। अगर भीम ने उनको बीच में कहीं भी रख दिया तो वे वहीं स्थापित हो जाएंगे और फिर आगे नहीं जाएंगे। भीम ने उनकी शर्त मान ली और वे काशी से इन्द्रप्रस्थ के लिए भी रवाना हो गए। इस स्थिति में बिना रुके चलते-चलते काफी दिन बीत गए। कई दिनों का सफर तय करते-करते जब भीम पुराने किले के द्वार पर पहुंचे तो थकावट व खुशी के कारण भैरव जी को अपना दिया वचन भूल गये। और थोड़ी देर विश्राम करने के विचार से उन्होंने भैरव जी को द्वार के गेट पर रख दिया। कुछ देर विश्राम करने के बाद जब भीम ने उन्हें किले में ले जाने के लिए पुन: उठाया तो भैरव जी हिले ही नहीं क्योंकि वो तो स्थापित हो चुके थे।
तब भीम ने भैरव जी के चरणों पर गिरकर क्षमा मांगी कि हे प्रभु! अब मैं क्या करूं? भीम द्वारा काफी मनाने के बाद भी भैरव बाबा आगे तो नहीं गए परन्तु उन्होंने भीम को वचन दिया कि जब पांडव अपना राजसूय यज्ञ शुरू करेंगे तो वे ऐसी किलकारी मारेंगे कि असुरी शक्तियां तुरन्त भाग जाएंगी। इसके बाद ऐसा ही हुआ। यज्ञ शुरू होते ही काल भैरव ने ऐसी किलकारी मारी कि सारी असुरी शक्तियां भाग गईं और राजसूय यज्ञ सही तरह से संपन्न हो गया। तभी से काल भैरव यहां किलकारी बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गए। किलकारी बाबा के बारे में माना जाता है कि ये शराब का प्रसाद चढ़ाने से जल्दी प्रसन्न होते हैं। मंदिर के परिसर में काल भैरव की दो मूर्तियां हैं, जिनमें से एक काल भैरव की व दूसरी लाल चोला चढ़ी लाल भैरव की है। भैरव जी के अलावा यहां महाबली भीम की भी मूर्ति है, जिसकी पूजा भी की जाती है।

काशी के कोतवाल

Bhairav Baba Mandir
Kaashi ke Kotwal

अब बताते हैं काशी के कोतवाल कहे जाने वाले भैरव जी के बारे में। इनके विषय में कहा जाता है कि ब्रह्मïा व कृतु के विवाद में ज्योतर्लिंगात्मक शिव का जन्म हुआ। तब ब्रह्मïा जी ने अपने घमंड में आकर अपने पांचवें मुख से भगवान शिव का अपमान किया। ब्रह्मïा को दंड देने के लिए शिव की शक्ति से भैरव जी की उत्पत्ति हुई और शिव ने भैरव को ब्रह्मïा को दंडित करने का आदेश दिया। उस वक्त शिव ने भैरव को कालभैरव कहकर संबोधित किया और कहा कि आप से काल भी सदा डरेगा अत: आपको लोग काल राज या काल भैरव कहकर पुकारेंगे। काशी में जो भी पाप करेगा उसको आप दंड देंगे। दुष्टïों का नाश करने के कारण लोग आपको अमर्दक कहेंगे तब भैरव जी ने शिव जी के आदेश से ब्रह्मïा का पांचवां सिर अपने नाखून से नोच लिया परन्तु ऐसा करते ही ब्रह्मïा का सिर उनके हाथ से चिपक गया और इससे उनको ब्रह्मï हत्या का पाप लगा। तब इस पाप से बचने के लिए वो शिव जी की आज्ञा से कापाल व्रत धारण करके तीर्थों में विचरण करने लगे। सभी लोकों और तीर्थों से होकर जब वे बैकुंठ लोक पहुंचे तो उनको भगवान विष्णु ने काशी जाने की सलाह दी। जिसके बाद बाबा भैरव काशी पहुंचे। वाराणसी में प्रवेश करते ही ब्रह्मïहत्या पाताल लोक चली गयी और मत्स्योदरी व गंगा के संगम में स्नान करने से भैरव के हाथ से छूटकर ब्रह्मïा जी का कपाल वहीं गिर गया। तभी से उस स्थान का नाम कपाल मोचन पड़ा। और तभी से कालभैरव काशी के कोतवाल कहे जाते हैं और काशी के लोगों को पापों का दंड भी देते हैं। काशी में विश्वनाथ शिव की पूजा का लाभ तब तक नहीं मिलता जब तक कि काल भैरव की पूजा भी न की जाए। जो कालभैरव की पूजा नहीं करता उसको अनेक कष्टïों का सामना करना पड़ता है।
शिव पुराण भैरव जी को भगवान शिव का रूप ही कहता है। भैरव ये तीन शब्द ब्रह्मïा, विष्णु, महेश कहे जाते हैं। भगवान भैरव के मुख्य रूप से आठ रूप कहे गए हैं परन्तु जनलोक में भैरव जी के बटुक व कालभैरव रूप की ही पूजा की जाती है। बाबा के बटुक रूप की भी एक कथा है। आपद नामक एक राक्षस था जिसने कठोर तप करके वर प्राप्त कर लिया था, जिसके परिणाम स्वरूप वह सभी देवी-देवताओं से भी अधिक शक्तिशाली बन बैठा था। आपद को वरदान था कि वो बस पांच वर्षीय बालक के हाथों ही मारा जा सकता है। किसी बड़े के द्वारा नहीं। इस वर के मद में चूर होकर वह देवी देवताओं तक पर अत्याचार करने लगा। तब सभी देवता एक स्थान पर एकत्रित हुए और उन्होंने अपनी-अपनी शक्तियां एक पुंज में समाहित करके एक पांच वर्षीय बालक का निर्माण किया। इसी बालक ने आपद का संहार किया। आपद का संहार करने के कारण ही इस बालक को सभी देवी-देवताओं ने आपदुद्वारक बटुक भैरव का नाम देकर पूजित किया।

उज्जैन के काल भैरव

Bhairav Baba Mandir
Ujjain ke Kaal Bhairav

यहां बाबा काल भैरव को ये वरदान है कि शिव से पहले उनकी पूजा होगी इसलिए 12 ज्योतिॄलगों में से एक महाकालेश्वर जी के दर्शन के साथ ही भक्त महाकाल भैरव के भी दर्शन जरूर करते हैं।
इस मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने करवाया था। मंदिर में भैरव बाबा की विशाल मूर्ति है। इस प्रतिमा के चमत्कार की चर्चा दूर-दूर तक है क्योंकि यहां बाबा पलक झपकते ही सारी शराब प्रसाद रूप में ग्रहण कर लेते हैं। दिन भर चढ़ने वाली शराब जाती कहां है? ये एक रहस्य है। आज तक इस बात का पता नहीं चल पाया यहां मंदिर के आस-पास की दुकानों में शराब ही मिलती है। लोगों का मानना है कि शराब के प्रसाद से बाबा जल्दी खुश हो जाते हैं। इस मंदिर को हजारों साल पुराना कहा जाता है। यहां भक्त तंत्र साधना भी करते हैं।
बाबा भैरव की पूजा की तीन विधियां हैं। सात्विक, तामसिक, राजसी। सात्विक पूजा के अंदर बाबा को गंध, दीप, अक्षत, रोली, पुष्प, फल, नारियल का भोग लगाते हैं। राजसी पूजा में उपरोक्त सभी चीजों के साथ पशु बलि भी दी जाती है व तामसिक पूजा में उपरोक्त सभी चीजों के साथ शराब व पशु बलि व शास्त्रीय गायन भी सुनाया जाता है। परन्तु तामसिक पूजा किसी विशिष्टï ज्ञानी गुरु के सान्निध्य में ही की जाती है। इसलिए सबसे सुलझी पूजा सात्विक ही मानी जाती है। जिस तरह इन पूजाओं के विधान अलग हैं उसी तरह इनके प्रभाव भी अलग हैं। जैसे-
सात्विक पूजा- के लाभ से अकाल मृत्यु का नाश, आयु वृद्धि, आरोग्य वृद्धि होती है।
राजसी पूजा- के लाभ से धर्म ज्ञान की वृद्धि, धन की वृद्धि होती है और सम्मान व सुख-सुविधाएं भी बढ़ती हैं।
तामसिक पूजा- के लाभ से शत्रु दमन, भूत-प्रेत बाधा से बचाव होता है। रविवार व मंगलवार को भैरव जी की पूजा का दिन माना जाता है।

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