मॉल जब भी जाएं, थैला साथ ले जाएं
Author Views: साथियों, इन दिनों छोटे-बड़े सभी शहरों में शॉपिंग मॉल का बोलबाला है। छुट्टियों में लोग अक्सर मॉल में खरीदारी के लिए जाते हैं और वहां जमकर खरीदारी करते हैं। प्राय: देखा जाता है कि सप्ताह के अंत तथा त्यौहारों से पहले ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए मॉल में विभिन्न प्रकार के ऑफर चलाए जाते हैं। इन लुभावने ऑफर्स के चक्कर में पड़कर लोग उन चीजों की भी खरीदारी कर लेते हैं जिनकी उन्हें उस समय कोई विशेष आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में अनावश्यक खर्च तो बढ़ता ही है, साथ ही साथ सामान का बोझ भी बढ़ जाता है।
आपने एक बात गौर की होगी कि मॉल जाते समय अक्सर लोग अपने साथ सामान रखने के लिए कोई थैला नहीं ले जाते। जबकि छोटी-बड़ी हर खरीदारी के बाद सामान रखने के लिए थैले की आवश्यकता पड़ती है, ऐसे में हमें मजबूरन मॉल से थैला खरीदना पड़ता है।
सामान की अधिकता होने के कारण अक्सर एक थैले से काम भी नहीं चलता और हमें मजबूरन तीन-चार थैले लेने पड़ते हैं। मॉल से लिए गए ये थैले इतनी बेहतर क्वालिटी के भी नहीं होते कि हम इनका कई बार उपयोग कर सकें। घर पर सामान ले जाने के बाद हम इन थैलों को इधर-उधर फेंक देते हैं और जब कभी दोबारा मॉल जाते हैं तो सामान रखने के लिए दोबारा थैला खरीदते हैं। अब आप
सोचिए कि अगर आप महीने में दो-तीन बार भी मॉल जाते हैं और सामान खरीदने के लिए दो-तीन थैले खरीदते हैं तो इस तरह आप साल में सैकड़ों रुपये थैलों की खरीदारी पर खर्च करते हैं। अत: अगली बार आप जब भी मॉल जाएं तो साथ में थैला अवश्य ले जाएं तथा एक बात का और ध्यान रखें, मॉल से वही सामान खरीदें जिनकी आपको आवश्यकता है। लुभावने ऑफर्स के चक्कर में
पड़कर फिजूलखर्ची कतई न करें। ऐसा करके आप साल में अच्छी खासी पूंजी बचाने के
साथ-साथ अपने पर्यावरण को भी दूषित होने से बचा सकते हैं।
सुनील कुमार
बहराइच (उ.प्र.)
गृहलक्ष्मी सदैव अग्रसर रहो
आशा है तुम सतत् ऊंचाइयों की ओर अग्रसर होगी। तुम जब से अस्तित्व मे आई हो, तुमने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और सचमुच तुमसे यही अपेक्षा थी। तुम वास्तव मे गृहलक्ष्मी ही हो क्योंकि तुमने घर बैठी महिलाओं के हाथ मे कलम पकड़ा कर उनको कवयित्री, लेखिका, उद्यमी, सफल स्त्री, सफल पत्नी और सफल मां बना कर उनका व्यक्तित्व विकसित कर दिया। तुम अपने अंदर साहित्य, कला, आलेख, कविता, कहानी, व्यंजन, सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को सहजता से समेटने के गुर सिखाती हुई सामग्रियों से सुसज्जित इस अनमोल खजाने की पत्रिका के नाम को न केवल
सार्थक किया है, वरन देश-विदेश में खुद की अहमियत और प्रतिष्ठा को एक पहचान दी है और अभी भी वही कर रही हो। मेरी यही आशा है कि तुम नित नए कलेवर के साथ यूं ही सजती-संवरती रहो और साहित्य और समाज को पत्रिका के माध्यम से सुसंस्कृत करती रहो। मेरी ओर से सदैव यही शुभेक्षा रहेगी- सदा अग्रणी रहो।
बिन्दु त्रिपाठी
भोपाल (म.प्र.)
अंक नहीं है जीवन की कसौटी

आज के जमाने में सफलता को अंको से जोड़कर देखा जाता है। परीक्षा में प्राप्त अंक आपको थोड़ा आगे बढ़ने में तो मदद करते हैं। लेकिन अंक जीवन नहीं है। किसी भी परीक्षा में प्राप्त अंक जीवन की सफलता की गारंटी प्रदान नहीं करते। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षाओं के अंको पर सभी
की दृष्टि गड़ी हुई होती है। अंको को स्टेटस सिंबल बनाया जाता है। रिश्तेदार भी पूछ-पूछ कर जीना मुहाल कर देते हैं। एक 14-15 साल का बच्चा अपने ऊपर कितना प्रेशर लेकर जी रहा है, इस विषय में भी सोचा है।
वह बच्चा 90 परसेंट लाया तो मेरे बच्चे की भी इतने मार्क्स आने चाहिए। ऐसी मानसिकता क्यों? 70 से 80 परसेंट लाने वाले बच्चों के नंबर भी कम आंके जाते हैं, उन माता-पिता द्वारा जो स्वयं कभी 50
परसेंट भी नहीं लाए। जो खुद सुप्प्लिमेंट्री से पास हुए, बच्चों से 95 परसेंट की उम्मीद रखते हैं। माता-पिता की असफलताओं का भुगतान करने का नाम है यह मासूम बच्चे।
कितनी मासूम बच्चे परीक्षा में कम नंबर आने या अपने पेरेंट्स की अपेक्षाओं पर खरा न उतरने के कारण सुसाइड कमेंट कर लेते हैं। कितनी भयावह स्थिति है, क्या यह एक साइलेंट किलिंग नहीं है? जरूरी तो नहीं हर बच्चा डॉक्टर और इंजीनियर ही बने। बहुत सारे विकल्प हैं। किसी अन्य क्षेत्र में भी
करियर बनाया जा सकता है।
रिंकी अग्रवाल (प्राची लेखिका)
खुर्जा-बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश)
मेरे मन की बात
आपकी पत्रिका गृहलक्ष्मी का हर अंक पढ़ना मेरे लिए जैसे अपनेपन की गर्माहट महसूस करना है। हर कहानी, हर अनुभव, हर सलाह दिल को छू जाती है। आज मैं भी अपने मन की कुछ बातें आपसे बांटना चाहती हूं। कभी-कभी लगता है कि जिंदगी की दौड़ में हम महिलाएं अपने लिए ही वक्त
निकालना भूल जाती हैं। घर, बच्चे, काम और जिम्मेदारियों के बीच कहीं हमारा ‘मैं’ पीछे छूट जाता है। पर जब गृहलक्ष्मी का नया अंक हाथ में आता है, तो लगता है जैसे कोई दोस्त मेरे कान में धीरे से कह रहा हो’थोड़ा अपने लिए भी जियो।’ आपकी पत्रिका ने मुझे यह एहसास दिलाया है कि गृहलक्ष्मी केवल घर की लक्ष्मी नहीं, बल्कि अपने सपनों की भी रचयिता है। अब मैं हर दिन थोड़ी देर अपने मन की सुनने लगी हूं-कभी डायरी लिखती हूं, कभी चाय की प्याली के साथ अपने ख्यालों से बातें करती हूं। आपका धन्यवाद, जो आपने हम जैसी महिलाओं को खुद से जुड़ने की प्रेरणा दी।
अलका ढाढणिया
कानपुर (उत्तर प्रदेश)
पुरस्कृत पत्र
सुनील कुमार (बहराइच- उ.प्र.)
