ध्यान परमात्मा से जोड़ता है: Benefits Of Meditation
Benefits Of Meditation

Benefits Of Meditation: हमारा कर्तव्य है, ग्रहणशील होकर रहना, ताकि जब उनकी दया हमारी दिशा में आए, हम दिल की गहराई से उसे प्राप्त करने के लिए तैयार रहें।

आध्यात्मिक मार्ग से हमें प्रसन्नता एवं खुशी मिलनी चाहिए, पर आध्यात्मिक रास्ते की अनेक अवस्थाएं हैं। कभी-कभी हम प्रभु की ओर खिंचे चले जाते हैं, जबकि कभी हम कठिनाई का अनुभव करते हैं। हम जो चाहते हैं, उसे पाने की अपेक्षा रखते हैं, परन्तु हमारे लिए अच्छा क्या है, इसके बारे में हमारी जानकारी सीमित होती है। हालांकि जो कुछ भी होता है, वह हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ होता है और प्रभु की इच्छा से होता है। हमारे हर विचार, हर बोल और हर कार्य की जानकारी प्रभु को है। हम इस दुनिया में दूसरों से कुछ छुपा सकते हैं। हम एक व्यक्ति के साथ एक तरीके से और दूसरे के साथ दूसरे तरीके से व्यवहार कर सकते हैं। हम दूसरों को अपने चरित्र का वह पक्ष दिखाते हैं, जो हम उन्हें दिखाना चाहते हैं। परन्तु प्रभु हमारे बारे में सब कुछ जानते हैं।

हमारा लक्ष्य है अपनी आत्मा का मिलाप परमात्मा से कराना। इसके लिए पहले हमारे कर्मों का बोझ समाप्त होना चाहिए। कई बार हम मुश्किलों में से गुजरते हैं, ताकि हमारे कर्मों का हिसाब चुकता हो जाए। यदि हम ‘तेरा भाणा मीठा लागे’ की अवस्था में जीते हैं, तो हम प्रसन्नता एवं आनंद पाते हैं। प्रत्येक चीज अपने सही समय पर होती है।

जब हम अन्दर के मंडलों की खुशी एवं आनंद का अनुभव करते हैं, तभी हम समझ पाते हैं कि सत्गुरु क्या है वे हमें क्या दे रहे हैं और तब हमारी शिकायतें शुक्राने में बदल जाती हैं। ऐसा दृष्टिकोण हमें दूसरे चरण में पहुंचा देता है, जबकि शिकायत करने की बजाय, हमारे मुख से केवल शुक्राने के बोल निकलते हैं। आध्यात्मिक यात्रा में हम एक ऐसे बिन्दु पर पहुंच जाते हैं, जहां हम प्रभु की शक्ति को पहचानने लगते हैं। हम पाते हैं कि हमारे सत्गुरु हमें प्रभु के सिंहासन की ओर ले जा रहे हैं। उस अवस्था में पहुंचकर हम इतनी अधिक खुशी का अनुभव करते हैं कि उसे किन्हीं शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है। उसके बाद, बाहरी दुनिया का हम पर कुछ भी असर नहीं होता है। हम हमेशा आनंद में रहते हैं।

तब हम असलियत का अनुभव करते हैं। हम सत्गुरु से एक उच्चतर स्तर पर संवाद करते हैं। यह एक सच्चे भक्त की अवस्था होती है। संतों के जीवन की कहानियों में इस अवस्था का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए कुछ संत गरीब थे, फिर भी वे प्रसन्न रहते थे, जबकि दूसरे लोग उनसे अधिक संपन्न थे, फिर भी वे प्रसन्न रहते थे क्योंकि उन्होंने अन्दर की यात्रा का आनंद प्राप्त कर लिया था, जिसकी तुलना इस दुनिया के किसी भी आनंद से नहीं की जा सकती है। इस अवस्था में पहुंचना प्रभु की दया से ही संभव होता है।

उस अवस्था में पहुंचने के लिए हमें ग्रहणशील होना चाहिए। हम नहीं जानते कि प्रभु की दया किस क्षण में हमें दैवी खजाने दे देगी। लोग उस दया को प्राप्त करने के लिए एक सत्गुरु के पास जाते हैं। हम उस दया को शारीरिक रूप से उनकी उपस्थिति में पा सकते हैं या फिर ध्यान-अभ्यास के द्वारा हजारों मील दूर रहकर भी पा सकते हैं।

हम ध्यान-अभ्यास के दौरान दया-मेहर की नजर के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। परन्तु हमें इसकी मांग नहीं करनी चाहिए। हमारा कर्तव्य है, ग्रहणशील होकर रहना, ताकि जब उनकी दया हमारी दिशा में आए, हम दिल की गहराई से उसे प्राप्त करने के लिए तैयार रहें। परन्तु यदि यह हमारी ओर आए और हम ग्रहणशील न हों तो वह वापस मुड़कर कहीं ओर चली जाती है। प्रभु की इच्छा के प्रति ग्रहणशील होना और हमारे पास जो कुछ भी है, उसके लिए सदैव कृतज्ञ होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हम भाग्यशाली हैं क्योंकि हमें उतनी दया मिली है, जितनी हमने कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं की होगी।