दुनियाभर में नदियों के साथ मनुष्य का एक भावनात्मक रिश्ता रहा है, लेकिन भारत में आदमी का जो रिश्ता नदियों-खासकर गंगा, यमुना, नर्मदा गोदावरी आदि प्रमुख नदियों के साथ रहा है, उसकी शायद ही किसी दूसरी सभ्यता में मिसाल देखने को मिले। इनमें भी गंगा के साथ भारत के लोगों का रिश्ता जितना भावनात्मक है, उससे कहीं ज्यादा आध्यात्मिक है।
भारतीय मनुष्य ने गंगा को देवी के पद पर प्रतिष्ठित किया है। हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में इस जीवनदायिनी नदी का आदरपूर्वक उल्लेख मिलता है। संत कवियों ने गंगा की स्तुति गाई है तो आधुनिक कवियों, चित्रकारों, फिल्मकारों और संगीतकारों ने भी गंगा के घाटों पर जीवन की छटा और छवियों की रचनात्मक पड़ताल की है। इस महान नदी में जरूर कुछ ऐसा है, जो आकर्षित करता है।
आखिर गंगा ही क्यूं ?
- आखिर गंगा के अलावा संसार में ऐसी दूसरी नदी कौन सी है, जिसके किनारे लाखों लोग कुंभ स्नान के लिए स्वत: एक साथ जुटते हैं और धैर्यपूर्वक अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं-एक मोक्षदायिनी डुबकी के लिए।
- हमारे देश में और भी नदियां हैं लेकिन हमारी सरकारें सिर्फ गंगा को ही प्रदूषण मुक्त बनाने के अभियानों पर ही सबसे ज्यादा जोर क्यों देती हैं? औद्योगिक सभ्यता जैसे संसार की अनेक नदियों को चट कर गई है, वैसे ही उसने गंगा को भी बुरी तरह आहत किया है, लेकिन हमारे यहां सिर्फ गंगा शुद्धिकरण पर ही इतना ज्यादा जोर क्यों है? इसका उत्तर इसके अलावा और क्या हो सकता है कि गंगा जमीन पर ही नहीं, हमारे मनोलोक में हमारे अवचेतन में भी बहती है।
- उसने एक अलग तरह से हमारे मनोलोक को रचा है। हमारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक मनोलोक को। यही वह अद्भुत मनोलोक है, जिसके बारे में संत कवि रैदास ने कहा है- मन चंगा तो कटौती में गंगा।
- मुक्तिबोध ने कहीं लिखा है कि आदमी जब पढ़-लिख जाता है तो सुसंस्कृत दिखने के चक्कर में मानवीय ऊष्मा से हीन होने लगता है। आज भी हरिद्वार में किसी भी दिन आप हरकी पौढ़ी और अन्य घाटों पर हजारों लोगों को स्नान करते देख सकते हैं।
- हिमालय पर तमाम तरह की वनस्पतियों और औषधियों के बीच से बहकर आता गंगा का पानी, जो कभी सड़ता नहीं और जिसका हिंदू सांस्कृतिक अनुष्ठानों में खुलकर प्रयोग होता था, अब न तो आचमन करने लायक है और न ही स्नान करने लायक।
- गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए करीब ढाई दशक पहले गंगा एक्शन प्लान बना था, जिस पर 916 करोड़ रुपए खर्च कर गंगा को 2020 तक प्रदूषण मुक्त बनाने की बात की गई है। गंगा सचमुच आज दयनीय हो गई है। कई जगह उसका पाट कम चौड़ा रह गया है और उसकी गहराई भी कहते हैं, कम हुई है।
- गंगा को बचाना सिर्फ इसलिए जरूरी नहीं है कि उसके साथ आस्था जुड़ी है, बल्कि इसलिए भी कि वह आज भी हमारी संस्कृति, जीवन का अभिन्न भाग है। वह जैव विविधता की वाहिका है और वनों और वन्य जीवनों को ऊर्जा देने वाली है।
- वह समूचे उत्तर भारत की मिट्टी को सोना बनाती है। वह निश्चय ही इतनी साफ-स्वच्छ तो होनी ही चाहिए कि उसमें नहाते हुए किसी को भी कोई डर या चिंता न हो, क्योंकि उसमें नहाए बगैर हम भारतीयों का काम नहीं चलता। गंगा साफ रहेगी तो हमारा पर्यावरण भी साफ रहेगा और वे नदियां भी जो गंगा में गिरती हैं।
- लेकिन उसे साफ रखने का सबसे बड़ा कारण यह भी है कि गंगा युगों से हमारे पुरखों की राख और हड्डियों को संभाले हुए है। गंगा का स्पर्श अनजाने में अपने पूर्वजों का स्पर्श भी है।
(साभार – शशिकांत सदैव, साधना पथ)
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