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Pitru Paksha: पितरों तक श्रद्धा अर्पित करने का दूसरा नाम पितृ पक्ष
Pitru Paksha

Pitru Paksha: हिन्दू संस्कृति में पितृ पक्ष का काफी महत्व है। मान्यता है कि यदि पितरों को पिंड दान न दिया जाए या फिर उनका श्राद्ध न किया जाए, तो उनकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है। हमारे पुराणों में इसे लेकर कई प्रकार के तर्क और वैज्ञानिक कारण बताए गए हैं।

भौतिक सुखो की लालसा मे कभी- कभी हम नासमझ हो जाते है और अपनी सोच को संकीर्ण कर लेते है। हमको  इसी से मुक्त करता है पावन पितृपक्ष जो कि किसी अंधविश्वास और ढोग का नहीं, बल्कि विनम्र और सरल हो जाने का पर्व है।

‘श्राद्ध’ शब्द का महत्व

पितृ पक्ष मे पितरों का श्राद्ध किया जाता है। यह शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। ब्रह्म पुराण, मरीचि एवं बृहस्पति की परिभाषाओं से यह स्पष्ट है कि श्राद्ध एवं श्रद्धा में घनिष्ठ संबंध है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है, वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है। स्कंद पुराण का कथन है कि ‘श्राद्ध’ नाम इसलिए पड़ा है कि उस कृत्य में श्रद्धा मूल (मूल स्रोत) है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें न केवल विश्वास है, प्रत्युत एक अटल धारणा है कि व्यक्ति को यह करना ही है।

श्राद्ध क्यों महतवपूर्ण है

ॠग्वेद में श्रद्धा को ‘देवत्व’ नाम दिया गया है। मनु व याज्ञवल्क्य ऋषियों ने धर्मशास्त्र में नित्य व नैमित्तिक श्राद्धों की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए कहा कि श्राद्ध करने से कर्ता पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है तथा पितर संतुष्ट रहते हैं, जिससे श्राद्धकर्ता व उसके परिवार का कल्याण होता है। श्राद्ध महिमा में कहा गया है- ‘आयु: पूजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च। प्रयच्छति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता।।’ – अर्थात जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करते हैं, उनके पितर संतुष्ट होकर उन्हें आयु, संतान, धन, स्वर्ग, राज्य मोक्ष व अन्य सौभाग्य प्रदान करते हैं।

श्राद्ध का दर्शन

भारतीय जीवन दर्शन में माता-पिता व गुरु को विशेष श्रद्धा व आदर दिया जाता है, उन्हें देवतुल्य माना जाता है। ‘पितरं प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्वदेवता:’ – अर्थात पितरों के प्रसन्न होने पर सारे ही देवता प्रसन्न हो जाते हैं।यह एक अकाट्य सच है कि आत्मिक प्रगति के लिए सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है- ‘श्रद्धा।’ श्रद्धा में शक्ति भी है। वह पत्थर को देवता बना देती है और मनुष्य को नर से नारायण स्तर तक उठा ले जाती है। किंतु श्रद्धा मात्र चिंतन या कल्पना का नाम नहीं है। उसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी होना चाहिए। यह उदारता, सेवा, सहायता, करुणा आदि के रूप में ही हो सकती है। इन्हें चिंतन तक सीमित न रखकर कार्यरूप में, परमार्थपरक कार्यों में ही परिणत करना होता है। यही सच्चे अर्थों में श्राद्ध है। संसार के सभी देशों, सभी धर्मों व सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मृतकों का श्राद्ध होता है। मृतकों के स्मारक, कवच, मकबरे संसारभर में देखे जाते हैं। पूर्वजों के नाम पर नगर, मुहल्ले, संस्थाएं, मकान, कुएं, तालाब, मंदिर, मीनार आदि बनाकर उनके नाम तथा यश को चिरस्थायी रखने का प्रयत्न किया जाता है। उनकी स्मृति में पर्वों एवं जयंतियों का आयोजन किया जाता है। यह अपने-अपने ढंग के श्राद्ध ही हैं।

श्राद्ध में केवल श्रद्धा जरूरी 

मानव जीवन की संरचना कुछ इस तरह की है कि वो सामाजिक है और जब इस पितृपक्ष मे मानव अपनी क्षमतानुसार अन्न कपड़े या कुछ भी जरूरतमंद को दान करता है तो उसे एक अनोखा सुकून मिल जाता है। कुछ लोग तो अपने पितृ को याद करके जल ही दान कर देते है और वह भी पर्याप्त फलदायक है। यह जल भी सीधा पितृ ही ग्रहण करते है। भौतिकवाद मे फंसकर यह सोचना उचित नहीं कि जो मर गए, उन तक हमारी दी हुई वस्तु कैसे पहुंचेगी? पहुंचती तो केवल श्रद्धा है।

Pitru Paksha: पितरों तक श्रद्धा अर्पित करने का दूसरा नाम पितृ पक्ष
Only faith is necessary in Shradh

मत क्या कहते हैं

मरे हुए व्यक्तियों को श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ होता है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि- ‘होता है, अवश्य होता है।’ कुछ लोगों के मत से श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है- होम, पिंडदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से), किंतु ‘श्राद्ध’ शब्द का प्रयोग इन तीनों के साथ गौण अर्थ में उपयुक्त समझा जा सकता है। पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पृथ्वीलोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चन्द्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नजदीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्षभर करते हैं। वे चन्द्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाजे पर पहुंच जाते है और वहां अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।

 तर्पण आवश्यक क्यों

जो पितृगण दिवंगत हो चुके हैं उनके लिए तर्पण श्राद्ध का विधान है। श्रद्धांजलि पूजा-उपचार का सरलतम प्रयोग है। अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है तथा वे कभी उपलब्ध होती हैं, कभी नहीं। किंतु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यत: प्रयोग करते हैं। वह सर्वत्र सुविधापूर्वक मिल भी जाता है इसलिए पुष्पांजलि आदि श्रमसाध्य श्रद्धांजलियों में जलांजलि को सर्वसुलभ माना गया है। उसके प्रयोग में आलस्य और अश्रद्धा के अतिरिक्त और कोई व्यवधान नहीं हो सकता इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ्य, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ्य तथा पितरगणों को तर्पण का विधान है। प्रश्न यह नहीं कि इस पानी की उन्हें आवश्यकता है या नहीं? प्रश्न केवल अपनी अभिव्यक्ति-भर का है। उसे निर्धारित मंत्र बोलते हुए, गायत्री महामंत्र में अथवा बिना मंत्र के भी जलांजलि दी जा सकती है। यही है उनके प्रति पूजा-अर्चा का सुगमतम विधान। शास्त्रीय भाषा में इसे ‘तर्पण’ कहा जाता है। इसमें यह तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यह पानी उन पूर्वजों या सूर्य तक पहुंचा या नहीं?

1. आप जिनके संस्कार आगे लेकर जाने वाले है यह उनको धन्यवाद कहने का एक मर्यादित तरीका है ।

2. पितृऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है- ‘श्राद्ध’। श्राद्ध का प्रचलित रूप तो ‘ब्राह्मण भोजन’ मात्र रह गया है, पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक-कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।

 ऐसे श्राद्ध कृत्यों में समय की आवश्यकता को देखते हुए वृक्षारोपण ऐसा कार्य हो सकता है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है।

दूसरा समय आते ही फिर वह आवश्यकता जाग पड़ती है। उसे कोई दूसरा व्यक्ति कहां तक कब तक पूरा करता रहे। फिर यदि कोई व्यक्ति अपंग, मुसीबतग्रस्त या लोकसेवी नहीं है तो उसे मुफ्त में भोजन कराते रहने के पीछे किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।

3. वृक्ष वायुशोधन करते हैं। छाया देते हैं। फल-फूल भी मिलते हैं। हरे पत्ते पशुओं का भोजन बन सकते हैं। सूखे पत्तों से जमीन को खाद मिलती है। लकड़ी के अनेक उपयोग हैं। वृक्षों से बादल बरसते हैं। भूमि का कटाव रुकता है। पक्षी घोंसले बनाते हैं। उनकी छाया में मनुष्यों व पशुओं को विश्राम मिलता है। इस प्रकार वृक्षारोपण भी एक उपयोगी प्राणी के पोषण के समान है। 

श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाए जाएं, जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों। अपने पास कृषियोग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। केवल सींचने, रखवाली करने आदि की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेकर दूसरों की जमीन में वृक्ष लगा देने में भी पुण्य फल की प्राप्ति हो सकती है।

4. वृक्षों की भांति ही जलाशयों के निर्माण का भी उपयोग है। तालाबों में हर साल वर्षा के पानी के साथ मिट्टी भर जाती है और उनकी सतह ऊंची हो जाने से कम पानी समाता है, जो जल्दी ही सूख जाता है। इन्हें यदि हर साल श्रमदान से गहरे करते रहा जाए तो पशुओं को पानी, सिंघाड़ा, कमल जैसी बेलें तथा तल में जमने वाली चिकनी मिट्टी से मकानों की मरम्मत हो सकती है।

श्राद्ध पक्ष की वर्तमान में प्रासंगिकता?

हम लोग हमेशा बदलाव चाहते हैं। हमारी सोच दशा व समय के साथ बदल जाती है, लेकिन कुछ वस्तुएं हमेशा प्रासंगिक होती हैं। पितृपक्ष हमारे परिवार से जुड़ी एक परंपरा है व अपनों को याद करने का एक अवसर है। जो हमसे जुड़े हैं या जुड़े थे, वो हम सबके लिए हमेशा प्रासंगिक होते हैं। श्राद्ध पक्ष के वर्तमान में प्रासंगिक होने के कई कारण हैं-. हमारा समाज अत्यंत भौतिकवादी होता जा रहा है। बगैर स्वार्थ के कोई किसी की सहायता नहीं करना चाहता है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों के लिए जो भी दान या भोजन हम दूसरों को देते हैं, उससे समाज के गरीब एवं जरूरतमंदों की सहायता होती है तथा समाज में सहयोग एवं समन्वय की भावना जाग्रत होती है। जिनके कारण हम इस संसार का हिस्सा बन पा रहे हैं जिनका खून हमारी रगों में दौड़ रहा है, कम से कम एक पखवाड़ा हम उन्हें याद करते हैं। इस बहाने हम अपने पूर्वजों को याद करके अपने परिवार, समाज एवं धर्म में अपनी आस्था व्यक्त करते हैं।

हमारे पूर्वज एवं बुजुर्ग हमारी धरोहर हैं। वर्तमान में बुजुर्ग समाज की मुख्य धारा से कटते जा रहे हैं। इस एक पखवाड़े में हम सभी उनके प्रति सम्मान एवं सद्भाव व्यक्त करते हैं।4. किसी दस्तूर को सौहार्द से मना लेने पर समाज मे परस्पर प्रेम जागता है। पितृपक्ष को मनाने से हमारी नई पीढ़ी में सांस्कृतिक सोच के साथ बुजुर्गों के सम्मान की भावना का जागरण होता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। श्रद्धा को प्रकट करने का जो प्रदर्शन होता है, वह ‘श्राद्ध’ कहा जाता है। 

जीवित पितरों व गुरुजनों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व श्रद्धा करने के लिए उनकी अनेक प्रकार से सेवा, पूजा तथा संतुष्टि की जा सकती है, परंतु स्वर्गीय पितरों के लिए श्रद्धा प्रकट करने व अपनी कृतज्ञता को प्रकट करने का कोई निमित्त निर्माण करना पड़ता है। यह निमित्त श्राद्ध है। स्वर्गीय गुरुजनों के कार्यों, उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने से ही छुटकारा नहीं मिल जाता। 

 हम अपने अवतारों, देवताओं, ऋषियों, महापुरुषों और पूजनीय पूर्वजों की जयंतियां धूमधाम से मनाते हैं, उनके गुणों का वर्णन करते हैं, उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके चरित्रों एवं विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

आजकल तो कुछ सजग तथा जागरूक समूह इस तरह भी पितृपक्ष मनाने लगे है कि वो सब मिलकर इस पखवाड़े किसी अंध विद्यालय,  किसी विकलांग केंद्र या ऐसी जगह अपनी भावनानुसार समय और धन दान करते है जो कि सार्थक है । पंचतत्व का एक जीता जागता पुतला अगर इस पखवाड़े में जरा सी मदद पाकर खिल उठे तो यही हमारे पितरो को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।समाप्त

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