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Gautam Buddha : धर्म के केवल सैद्धांतिक पक्ष को ही नहीं जानें, बल्कि उसके व्यावहारिक पक्ष को भी जीवन में उतारे तो ही आचरण में संपन्न हुआ जा सकता है।

जो व्यक्ति बुद्ध होता है, वह सम्यक संबोधि हासिल कर लेता है, वह अनन्त गुणों से भर जाता है। उसके गुणों का ध्यान करते-करते धर्म उजागर होने लगता है। ऐसे में बुद्ध के गुणों का वर्णन करने वाले एक-एक शब्द को समझना आवश्यक है। जो इस प्रकार है-
भगवान- जो बुद्ध होता है, वह भगवान हो जाता है यानी अपने भीतर का समस्त राग-द्वेष और मोह मग्न कर लेता है और इस प्रकार भाग्यवान हो इसी जीवन में विमुक्ति के वैभव का ऐश्वर्यमय जीवन जीता है। वह किसी भक्त मण्डली के द्वारा यह नाम नहीं ग्रहण करता। यह कोई प्रशंसा की अतिश्योक्ति नहीं है।
अरहंत- जो बुद्ध होता है, वह अपने सभी अरियों यानी शत्रुओं का हनन कर लेता है। कौन है शत्रु? कोई बाहरी व्यक्ति शत्रु नहीं हुआ करता। हमारे आन्तरिक मनोविकार, क्लेष, काषाय ही सही मायने में हमारे शत्रु हैं और इन्हीं शत्रुओं का हनन करके कोई व्यक्ति अरहंत होता है- बुद्ध होता है। वह संसार चक्र को धर्म के आरे से काट देता है। प्रतीत्य समुत्पाद को नष्टï कर देता है। दुखनामिनी प्रतिपदा को नष्टï कर देता है। कैसे? ‘वेदना पच्चया त्रण्हाÓ पर बार-बार वार करते हुए। सुखद और दुखद वेदना को समभाव से देखते-देखते भव चक्र नष्टï होता जाता है।
सम्यक संबुद्ध- जिसकी बोधि जाग गई, ज्ञान जाग गया, जितनी जानने योग्य बातें थीं वह बगैर किसी गुरु की सहायता के स्वयं जान लीं। केवल सुनी-सुनाई, पढ़ी-पढ़ाई बात से कोई संबुद्ध नहीं हो सकता। केवल श्रद्धा से या बुद्धि से मात्र स्वीकार कर लेने से भी कोई संबुद्ध नहीं हो सकता है। न ही कोई केवल शील के बल पर, केवल चित्त को अडोल, अविचलित करने वाली समाधि के बल पर भी संबुद्ध नहीं बन सकता। प्रज्ञा द्वारा स्वानुभूति के आधार पर चित्त और शरीर के अनित्य धर्मा स्वभाव का साक्षात्कार करके और फिर इस अनित्य क्षेत्र की परिधि पार कर अनित्यधर्मा परम सत्य निर्वाण का स्वयं साक्षात्कार कर लेता है तो ही सम्यक संबुद्ध होता है। संबुद्धि यानी स्वयं बोधि प्राप्त कर लेता है।
इन्द्रिय क्षेत्र की सभी सुखद-दुखद अनुभूतियां अनित्य धर्मा है, अनात्मधर्मा है और इसी कारण दुखधर्मा है। इस दुख आर्य सत्य का स्वयं साक्षात्कार करता है। राग-द्वेष मयी तृष्णा जगाने के कारण ही दुख की उत्पत्ति होती है। इस समुदाय सत्य को भी स्वानुभूति द्वारा जान लेता है जिसकी उत्पत्ति कारण से हो, उसका निवारण किया जा सकता है। कारण के निवारण से उसका निवारण साध्य है, यह समझकर दुख के कारण तृष्णा का पूर्णतया निवारण करके दुख विमुक्ति की अनुभूति करके साक्षात्कार कर लेता है। तृष्णा निवारण की विधि को स्वयं भावित करके अनुभूति के स्तर पर जान लेता है दुख से छुटकारा प्राप्त कर लेता है। इसीलिए सम्यक संबुद्ध कहलाता है।
आचरण में सम्पन्न- कोई व्यक्ति बुद्ध होता है, तो विद्या और आचरण दोनों में संपन्न हो जाता है। क्या है विद्या और आचरण? विद्या वह जो अविद्या को दूर करे। अविद्या वह जो सच्चाई पर आवरण डाले, उसके प्रति भ्रम पैदा करे। जो वस्तुत: अनात्म है, मैं नहीं, मेरा नहीं, मेरी आत्मा नहीं। जो वस्तुत: दुख है उसके प्रति सुख होने का भ्रम पैदा करे। यह भ्रम दूर हो तथा अनित्य, दुख और अनाम के स्वभाव को वास्तविकता के स्तर पर समझ लें, तो अविद्या दूर हुई, विद्या स्थापित हुई। इसी प्रकार जो दुख है, दुख का मूल कारण है, जो दुख का निवारण है, और जो दुख निवारण का उपाय है, उसे भली-भांति जान लें, तो अविद्या दूर हुई। विद्या स्थापित हुई।
केवल विद्या से संपन्न होना पर्याप्त नहीं है। इन सच्चाइयों को केवल बुद्धि के स्तर पर समझकर न रह जाए, बल्कि वास्तविक प्रत्यक्ष अनुभूति के स्तर पर जान लें तथा धर्म के केवल सैद्धांतिक पक्ष को ही नहीं जानें, बल्कि उसके व्यावहारिक पक्ष को भी जीवन में उतारे तो ही आचरण में संपन्न हुआ जा सकता है।
सुगतो- जो बुद्ध होता है, सुगत होता है। उसने अच्छे मार्ग पर गमन किया है। कायिक कर्म और वाधिक कर्म को सुधारते हुए मनोकर्म को इस प्रकार सुधार लिया है कि अन्य कोई ऐसा कर्म कर ही नहीं सकता, जो किसी की किंचित मात्र भी हानि कर दे। लोक कल्याण ही लोक-कल्याण करता है। ऐसा व्यक्ति मानस के ऊपरी-ऊपरी विकारों का प्रह्मïण करके नहीं रह गया। बल्कि अन्तरमन की गहराइयों तक अनेक जन्मों के संचित अनुशाप क्लेशों को भी जड़ से उखाड़ चुका और पूर्णतया: विकार विमुक्त हो गया है। स्थूल सत्यों का साक्षात्कार करते-करते स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से सूक्ष्मता, सूक्ष्मता से सूक्ष्मतम परम पद निर्वाण तक का साक्षात्कार कर चुका है। विपश्यना साधना करते हुए स्रोतापन्न, सकदागामी, आनागामी के मार्ग पर सुगमता से चलता हुआ अरहंत मार्ग-फल की अवस्था तक जा पहुंचा है, तो ही सही मायने में बुद्ध हुआ-सुगतो। रास्ता इतना अच्छा है कि बढ़तेे-बढ़ते ही वह भवचक्र से मुक्त हो गया। आज के वैज्ञानिक की भांति भौतिक जगत की सच्चाइयों में नहीं उलझा रहता। यदि वह ऐसा करता तो सुगत नहीं होता। जिस कारण बंधन वाले रास्ते का परित्याग करता हुआ बंधन मुक्त होता है, वहीं लोगों को बताता है तो ही सुगत है।
लोक विदु- जो बुद्ध होता है वह लोकों को जानने वाला होता है। ऋद्धि बल से वह समस्त लोकों की यात्रा कर सकता है। उन्हें जब चाहे तब अपने दिव्य चक्षुओं से देख सकता है। सर्वज्ञ हो जाने के कारण उनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर सकता है। लेकिन वह इन्हीं अर्थों में लोक विदु नहीं है। स्ववेदन की आधार पर इस साढ़े तीन हाथ की काया में सारे लोकों का अनुभव कर लेता है। नीचे लोक से लेकर मनुष्यलोक, देवलोक, रूप ब्रह्मïलोक और अरुप ब्रह्मïलोक की अनुभूति इसी कायपिण्ड में की जाती है। ठीक ही कहा गया है कि लोकों की उत्पत्ति उनकी उत्पत्ति का कारण, उनका निरोध और उनके निरोध के उपाय इस साढ़े तीन हाथ की काया के भीतर ही है। लोक का अन्त किए बिना कोई व्यक्ति बुद्ध नहीं बन सकता। बुद्ध होता है तो समस्त लोकों को अपने भीतर जानकर उनका निरोध कर उनके परे लोकोत्तर निर्वाण प्रवस्था का अपने भीतर ही साक्षात्कार कर लेता है।
अनुतरो- बुद्ध तो अनुत्तर होता है, यानी जिस अवस्था पर व्यक्ति पहुंच गया, उससे ऊंची अन्य कोई अवस्था नहीं। इस अर्थ में वह अनुत्तर है। वह अमृत अवस्था तक की राह बताता है।
पुरिस सम्म सारथी- जिस प्रकार एक अनुभवी सारथी बिगडै़ल घोड़ों को सुशिक्षित बना देता है, ऐसे ही गलत रास्ते पड़े हुए लोगों को सही रास्ते पर लगाने में वह कुशल होता है।
सत्था देव मनुस्सान- जो बुद्ध होता है वो देवताओं और मनुष्यों का शास्ता होता है, शिक्षा देता है। बुद्धत्व प्राप्त करने पर उसके मन में असीम, अपरिमित करुणा भर उठती है। संसार में कितने दुखियारे हैं? यह सच है कि अधिकांश लोग विभिन्न दार्शनिक मान्यताओं के जंजाल में उलझे हैं, साम्प्रदायिक जकड़न में जकड़े हैं, कर्म कांड के कारागार में कैद हैं, शुद्ध धर्म, जो कुदरत का सार्वजनिक कानून है, उसे समझने की कोशिश भी नहीं करेंगे। किंतु इनमें से अनेक लोग ऐसे अवश्य हैं जिनकी आंखों पर बड़ा झीना सा पर्दा पड़ा है। यदि वह पर्दा हट जाए, तो उनका भी कल्याण हो। ऐसे बहुतों का हित हो, सुख सधे। कोई भी व्यक्ति जो बुद्ध हुआ, वह इन मंगल भावों से भरकर बिना किसी भेदभाव से अपनी ओर से सबको शुद्ध धर्म बांटता है। लोगों को शुद्ध धर्म में अनुशासित करता है। अत: उनका शास्ता कहलाता है। शास्ता गरीबों का भी, अमीरों का भी, शास्ता विद्वानों का भी, अनपढ़ों का भी। शास्ता पुरुषों का भी, नारियों का भी। शास्ता राजाओं का भी, प्रज्ञा का भी, शास्ता देवों का भी, मनुष्यों का भी। अरुप ब्रह्मï लोक के प्राणियों को छोड़कर सबका शास्ता। महाकरुणिक शास्ता। जब-जब बुद्ध की वंदना करें तो समझें कि सही वंदना तभी होगी जब बुद्ध के उपर्युक्त गुणों को याद रखें। इन गुणों को यादकर अपने भीतर प्रेरणा जगाएं और वैसे ही गुण अपने में जगाने के सत्यप्रयत्न में लग जाएं, तभी सही मायने में हमारा मंगल कल्याण है।

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