विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत को अनेकता में एकता के वाहक देश के रूप में मान्यता दी गई है। भारत की अथाह जनता के बीच यहां पर होने वाले पर्वों का भी अपना विशेष महत्त्व है, यहां की स्नान पर्व की पंरपरा तो सबसे अलग और निराली है, इन्हीं स्नान पर्वों में से एक है कार्तिक स्नान।      

सूर्य के संक्रमण पर्व मकर संक्राति के पर्व से भारत में स्नान पर्व का सिलसिला शुरु हो जाता है। मकर संक्राति, मौनी अमावस्या, महाशिवरात्रि के मौके पर नदियों, सरोवरों में स्नान करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पहले की तरह ही बनी हुई है। इसके अलावा स्नान पर्व के लिए विश्व भर में ख्यात कुंभ में नदियों में स्नान करने वालों का सैलाब ही उमड़ पड़ता है। भारत के इन्हीं स्नान पर्वों की शृंखला में एक पर्व कार्तिक स्नान भी है। इस वर्ष कार्तिक स्नान का पर्व 12 नवंबर को है, इस दिन देश भर की सभी नदियों, सरोवरों में श्रद्धालु सूर्योदय से पहले ही डुबकियां लगाना शुरु कर देते हैं। कार्तिक स्नान शरद पूर्णिमा से शुरु होकर कार्तिक पूर्णिमा की कालावधि में किए जाते हैं। विभिन्न ग्रंथों में यह कहा गया है कि कार्तिक माह में, जो लोग सूर्योदय से पहले अपना बिस्तर छोड़ कर नदी, सरोवर में जाकर स्नान करते हैं और सूर्य पूजा करके भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, भगवान उनके सभी दु:खों का हरण करते हैं। कतिपय धार्मिक ग्रंथों में इस बात का भी उल्लेख है कि कार्तिक मास में भगवान विष्णु जल में निवास करते हैं। कुछ धार्मिक ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि कार्तिक माह धार्मिक कार्यों के लिए बहुत अच्छा होता है। कार्तिक माह में अगर देवी जागरण, कीर्तन, दीपदान, तुलसी पूजन और आंवले के पेड़ की पूजा की गई तो वह बहुत फलदायी होती है। कार्तिक माह में गीता पाठ करने वालों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कार्तिक स्नान के बारे में यह भी कहा जाता है कि जो लोग सुबह होने से पूर्व नहाते हैं, उन्हें सुख समृद्धि के साथ साथ अच्छा स्वास्थ्य लाभ भी होता है। इतना ही नहीं, जो लोग कार्तिक माह में नदी, सरोवर में स्नान करते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ करने का पुण्य प्राप्त होता है। पुराण भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कार्तिक माह में स्नान, दान और व्रत करने से पापों का शमन होता है। कतिपय विद्वानों का कहना है कि जिस तरह का फल कुंभ मेले में स्नान करने से प्राप्त होता है, उसी तरह का फल कार्तिक माह में किसी पवित्र नदी, सरोवर में स्नान करने से प्राप्त होता है। यहां यह भी उल्लिखित करना जरूरी है कि कार्तिक स्नान का केवल धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, बल्कि इसे विज्ञान की कसौटी पर भी अच्छी तरह से कसा गया है।  मानसून समाप्त होने के बाद आने वाले कार्तिक माह में आसमान पूरी तरह से साफ हो जाता है, इस कारण सूर्य की किरणें धरती पर सीधे पड़ती हैं। इन किरणों से धरती पर जो भी हानिकारक जीव जंतू होते हैं, वे पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं, इसके फलस्वरूप वातावरण शुद्ध हो जाता है, जो मानव के स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही लाभदायी होता है। 

पुण्य मास कहा जाता है कार्तिक

कार्तिक मास को शास्त्रों में पुण्य मास कहा गया है। पुराणों के अनुसार जो फल सामान्य दिनों में एक हजार बार गंगा स्नान का होता है तथा प्रयाग में कुंभ के दौरान गंगा स्नान का फल होता वही फल कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व किसी भी नदी में स्नान करने मात्र से प्राप्त हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास स्नान की शुरूआत शरद पूर्णिमा से होती है और इसका समापन कार्तिक पूर्णिमा को होता है। पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति पूरे कार्तिक माह में सूर्योदय से पूर्व उठकर नदी अथवा तालाब में स्नान करता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है। भगवान विष्णु की उन पर असीम कृपा होती है। पद्म पुराण के अनुसार जो व्यक्ति कार्तिक मास में नियमित रूप से सूर्योदय से पूर्व स्नान करके धूप-दीप सहित भगवान विष्णु की पूजा करते हैं वह भगवान विष्णु के प्रिय होते हैं। पद्मपुराण की कथा के अनुसार कार्तिक स्नान और पूजा के पुण्य से ही सत्यभामा को भगवान श्री कृष्ण की पत्नी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भगवान विष्णु ने जब श्री कृष्ण रूप में अवतार लिया तब रूक्मिणी और सत्यभामा उनकी पटरानी हुई। सत्यभामा पूर्व जन्म में एक ब्राह्मण की पुत्री थी। युवावस्था में ही एक दिन इनके पति और पिता को एक राक्षस ने मार दिया। कुछ दिनों तक ब्राह्मण की पुत्री रोती रही। इसके बाद उसने स्वयं को विष्णु भगवान की भक्ति में समर्पित कर दिया, वह सभी एकादशी का व्रत रखती और कार्तिक मास में नियम पूर्वक सूर्योदय से पूर्व स्नान करके भगवान विष्णु और तुलसी की पूजा करती थी। बुढ़ापा आने पर एक दिन जब ब्राह्मण की पुत्री कार्तिक स्नान के लिए गंगा में डुबकी लगायी तब बुखार से कांपने लगी और गंगा तट पर उसकी मृत्यु हो गयी। उसी समय विष्णु लोक से एक विमान आया और ब्राह्मण की पुत्री का दिव्य शरीर विमान में बैठकर विष्णु लोक पहुंच गया।  जब भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया तब ब्राह्मण की पुत्री ने सत्यभामा के रूप में जन्म लिया। कार्तिक मास में दीपदान करने के कारण सत्यभामा को सुख और संपत्ति प्राप्त हुई। नियमित तुलसी में जल अर्पित करने के कारण सुन्दर वाटिका का सुख मिला। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक मास में किये गये दान पुण्य का फल व्यक्ति को अगले जन्म में अवश्य प्राप्त होता है।

सुबह के स्नान का वैज्ञानिक कारण

सुबह स्नान करने की वर्षों पुरानी परंपरा के पीछे का एक और वैज्ञानिक कारण यह है कि सुबह के समय हवा प्रदूषण मुक्त रहती है, जिसके कारण हवा में ऑक्सीजन का प्रमाण अत्यधिक होता है, इसके लाभ यह होता है कि शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बहुत ज्यादा है, जिसके कारण मनुष्य बीमारियों से बचा रहता है। स्कंद पुराण में एक स्थान पर कहा गया है कि कार्तिक माह किया गया स्नान तथा व्रत करना साक्षात् भगवान विष्णु की आराधना करने जैसा ही है। एक मान्यता ऐसी भी है कि कार्तिक पुर्णिमा के दिन तड़के स्नान करने के बाद व्यक्ति जो कुछ दान करता है, वह उसके लिए स्वर्ग में सुरक्षित रहता है, जो मृत्यु लोक से मुक्त होने के बाद स्वर्ग में जाने के बाद मिलता है। एक धारणा ऐसी भी है कि कार्तिक पूर्णिमा को रात के समय व्रत करके बैल का दान करने से शिव पद की प्राप्ति होती है। साथ ही गाय, हाथी, रथ, घी जैसी वस्तुओं का दान करने से संपत्ति में वृद्धि होती है।      

ऐसे करें स्नान

स्नान पर्व की जो परंपरागत मान्यता है, वह यह है कि इसमें सूर्योदय से पहले स्नान करना ज्यादा शुभ माना जाता है। कार्तिक स्नान की परंपरा भी इससे कुछ अलग नहीं है। सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों के बाद नदी, तालाब में इस तरह प्रवेश करें आधा शरीर ही पानी डूबे। कार्तिक स्नान की जो वर्षों पुरानी परंपरा है, उसके आधार पर खड़े होकर स्नान करने का विधान है। कार्तिक स्नान की विधि में एक बात यह भी शामिल है कि जो गृहस्थ हैं, वे काले तिल और आंवले के चूर्ण को शरीर पर लगाकर स्नान करें, जबकि संन्यासी व्यक्ति तुलसी के पौधे की जड़ में लगी मिट्टी को अपने शरीर में स्नान करे। स्नान के पश्चात शुद्ध वस्त्र पहन कर विधिपूर्वक भगवान विष्णु की आराधना पूजा करनी चाहिए। तुलसी, केला, पीपल और पथवारी का दीपक प्रज्ज्वलित करके पूजन अर्चन करना चाहिए, यदि नदी, सरोवर में स्नान संभव ना हो पाए तो घर में भोर होने से पूर्व जब तारे दिखायी दे रहे हों, तभी स्नान कर लेना चाहिए, इसके पश्चात मंदिर जाकर भगवान विष्णु का नमन करें, अगर मंदिर जाना संभव न हो तो घर में भी पूजा की जा सकती है। द्वितिया, सप्तमी, नवमी, दशमी, त्रयोदशी और अमावस्या के दिन तिल तथा आंवले से स्नान न करें। कार्तिक स्नान करने वाले इस बात का ध्यान रखें कि उनके लिए कार्तिक मास में सिर पर तेल लगाना वर्जित है, सिर्फ नरक चौदस को तेल लगाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।  

दान

कार्तिक माह में कुछ वस्तुओं के दान का भी विधान है। इस मास में अन्न दान के अलावा केला तथा आंवले का दान करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। गरीब लोगों को शीत काल में गरम तथा ऊनी कपड़ों का दान करके पुण्य अर्जन किया जा सकता है। इतना ही नहीं निराश्रित लोगों को भोजन कराके समाजिक ऋण को उतारने का सबसे अच्छा समय कार्तिक मास ही माना जाता है। इसके अलावा भगवान के मंदिर में कलर पेंट आदि में सहयोग तथा भगवान के लिए वस्त्र आभूषण आदि देकर भी पुण्यार्जन किया जा सकता है।

त्याग 

कार्तिक स्नान और व्रत करने वालों के लिए कुछ वस्तुएं प्रतिबंधित होती है। व्रत करने वाले सदैव इस बात की ओर ध्यान दें कि उन्हें कार्तिक माह के दौरान किन वस्तुओं का परित्याग करना है। कार्तिक स्नान के समय जिन वस्तुओं को छोड़ने की बात विभिन्न ग्रंथों में कही गई हैं, उनमें राई, खटाई, सभी मादक वस्तुएं, दाल, तिल, पकवान, दान किया हुआ भोजन, मांस सेवन, पान, तंबाकु, धूम्रपान, नींबू, मसूर, बासी और जूठा खाना, गाजर, मूली, लौकी, काशीफल, तरबूज, मठ्ठा,मसूर, प्याज, सिंघाडा, कांसे में भोजन, भंडारे का भोजन, सूतक या श्राद्ध के अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा व्रत करने वाले के लिए प्रतिपदा को कोहड़ा, द्वतियों को कटहल, तृतीया को युवती के साथ संभाषण नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त व्रत करने वालों को चतुर्थी के दिन मूली, पंचमी के दिन बेल, षष्ठी को तरबूज, सप्तमी को आंवला, अष्टमी को नारियल, नवमी को मूली, दशमी को लौकी, एकादशी को परवल, द्वादशी को बेर, त्रयोदशी को मठ्ठा, चतुदर्शी को गाजर और पुर्णिमा के दिन शाक का सेवन वर्जित है, इसके अलावा व्रत करने को रविवार के दिन आंवला का सेवन न करने का निर्देश भी दिया गया है।    

कड़वे वचन का त्याग

कार्तिक स्नान करने वालों को यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि उन्हें किसी के लिए कड़वे वचन का प्रयोग नहीं करना है।  झूठ बोलने, ईर्ष्या, द्वेष जैसे बातों को अपने जीवन से पूरी तरह दूर रखना है, इसके अतिरिक्त गुरु, नारी, महात्मा, देवी- देवता, ब्राह्मण समेत समग्र मानव समाज के प्रति आदर भाव रखना भी कार्तिक स्नान करने वालों को आजीवन रखना होगा।  

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