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Anandmurti Gurumaa : जिसको अपना जीवन बिगाड़ना है न, वह बिगाड़ेगा ही! जो समझाने से समझ नहीं रहा हो, उसे बिगड़ने के बाद ही खुद से खुद को अकल आएगी, तो आएगी। नहीं तो, मरते दम तक भी नहीं आती कइयों को अकल!

पति-पत्नी, मां-बच्चा ये जितने रिश्ते हैं, ये सब इन रिश्तों की वजह से प्यारे नहीं हैं, ये ‘मुझ’ को सुख देते हैं, इसलिए प्यारे हैं। पत्नी, पत्नी के लिए प्यारी नहीं है। पति, पति के लिए प्यारा नहीं है। पत्नी या पति से सुख मिलता है, इसलिए प्यारे हैं। सुख मुझको मिलता है, तो फिर प्यारा मुझे सुख है या पति? बच्चा नहीं प्यारा, बच्चे से जो सुख मिलता है, वह प्यारा है। मकान नहीं प्यारा, उस मकान से जो सुख मिलता है, वह सुख प्यारा है।

पिछले दिनों एक सज्जन मेरे से कहने लगे कि ‘मुझे बहुत सारे लोग कहते हैं कि तुम्हारा घर वास्तुशास्त्र के मुताबिक गलत बना है। इसीलिए तुम बीमार रहते हो, तुम्हारा काम नहीं चलता है। तो अब हम सोच रहे हैं कि इस घर को बेच देंगे।

माने, घर नहीं प्यारा! जिस घर से सुख ना मिले, वह घर भी अच्छा नहीं लगता। बच्चा अगर आज्ञाकारी ना हो, सेवा ना करे, तो क्या करते हैं मां-बाप? ‘तेरा-मेरा कोई रिश्ता नहीं! ऐसी स्थितियां हो जाती हैं। जब बच्चा नालायक निकले और समझाने पर भी ना समझे, तो मेरी दृष्टिï में आप ममता से बंधे हुए, दुखी ना होते रहिए, बच्चे को बाहर का रास्ता दिखाइए। तुम ना बाहर हो जाओ, उन्हें घर के बाहर का रास्ता दिखा दो।

सच बात तो यह है कि तुम ना दिखाओगे, चार दिनों में तुम्हें तुम्हारा बोरिया-बिस्तर, सन्दूक समेत बच्चा ही उठाके बाहर पटक देगा कि ‘चल बुड्ढे बाहर!’ बुड्ढेा-बुढ़िया दोनों जिन्दा हों, तो चलो, एक-दूसरे का सहारा बन जाएंगे। पर एक मर जाए, और एक रह जाए, तो उनकी वह दुर्दशा होती है कि पूछो मत!

आश्रमों में अक्सर यह होता है। आश्रमों में, धर्मशालाओं में, तीर्थों में अक्सर ऐसा होता है कि अपनी बूढी माँ को या बूढ़ा बाप को ले आते घर से तीर्थ करने कि ‘चलो, तीर्थ कराते हैं’ रात चुप-चाप से बहू-बेटा बच्चे ले करके निकल जाते हैं। अब, वह बुड्ढïा या बुड्ढïी वहीं बैठी है। उस गरीब को घर का पता भी नहीं मालूम! धर्मशाला वाले कितने दिन रखेंगे। थोड़े दिनों में वे भी निकाल देते हैं। फिर वह क्या करें? भीख ही मांगेगा, और क्या! कहीं सड़क किनारे बैठ जाएगा। जो दूसरों को कभी दान देता था, वह खुद भीख मांगेगा!

आशक्ति और ममता में बंधके मरो क्यों! क्यों? जिसको अपना जीवन बिगाड़ना है न, वह बिगाड़ेगा ही! और मैं कहती हूं, बिगाड़ ही लें! जो समझाने से समझ नहीं रहा हो, उसे बिगड़ने के बाद ही खुद से खुद को अकल आएगी, तो आएगी। नहीं तो, मरते दम तक भी नहीं आती कइयों को अकल!

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