yah bhi dadaji ne kaha tha
yah bhi dadaji ne kaha tha

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कुंभकोणम मंदिर के रास्ते पर एक बहुत ही पुराना घर था। जहाँ शिवानंद पिल्लै अपने परिवार के साथ निवास करते थे। वे नादस्वरम (शहनाई जैसा वाद्य) के विद्वान थे। सूर्योदय के पहले ही उठकर वे संगीत साधना के लिए तैयार हो रहे थे।

वह पिछवाड़े में बैठा हुआ नारियल के बागान को देख रहा था, पाँच फुट की दूरी में गोशाला में दो गायें घास चर रही थी और एक बछड़ा चरक-चरक कर रस्सी खींच रहा था। उसकी लार की नमी से उसकी जकड़न धीरे-धीरे नरम हो गई थी। गोशाला में 25 वाट का बल्ब बहुत कम रोशनी दे रहा था, परन्तु पिल्लै को संगीत साधना के लिए यह रोशनी पर्याप्त थी।

शिवानंद पिल्लै नादस्वरम बजाने में तन्मय हो गए। अभी सूर्योदय नहीं हुआ था, अतः दूसरों की नींद में बाधा उत्पन्न न हो, इसे ध्यान में रखकर वे बहुत ही धीमी और मधुर स्वर में नादस्वरम बजाने लगे। पाँच से छः बजे तक वे यहीं बैठकर स्वर साधना करते थे।

सूर्योदय होने पर वे घर के आगे बरामदे में बैठ जाते, यहां वे मंदिर के शिखर को देखते हुए, अपने को भूलकर, नादस्वरम बजाने में ध्यानमग्न हो जाते थे।

शांत वातावरण, कोलाहल से दूर, सूर्योदय का समय वे आनंद में मग्न होकर, कल्याणी राग में नादस्वरम की मधुर ध्वनि वातावरण में गुंजित कर रहे थे। प्रतिदिन दो घंटे की नियमित साधना से
ही उन्हें आत्म संतुष्टि होती थी और इसी से वे दिन भर प्रसन्न रहते थे। यही उनकी दिनचर्या थी।

लगातार संगीत साधना से उनका सारा शरीर पसीने से भीग जाता था। तौलिए से उन्होंने शरीर को पोंछा, थोड़ा-सा विश्राम किया और गटागट एक लोटा पानी पी गए। हमेशा की तरह पान-सुपारी चबाने लगे। इसके बाद उसने पत्नी रुक्मणी से कॉफी देने की फरमाईश की। “रुक्मणी, जल्दी से कॉफी लाओ, मैं कब से इन्तजार कर रहा हूँ।” तुरंत पत्नी या उसकी एक बेटी काफी लेकर आती है। प्रतिदिन यही होता है। यह उनकी हर रोज की नियमित दिनचर्या थी।

कॉफी पीने के बाद वे स्वयं अपने आप से बातें करने लगे, “आज मैंने कल्याणी राग में नादस्वरम बजाई, मुझे असीम आनंद का अनुभव हुआ है। अन्य लोग नादस्वरम सुने या नहीं, मुझे उसकी चिंता नहीं। मुझे संगीत साधना में ही आत्मसंतुष्टि है।”

इतने में बाहर कुछ शब्द आने लगे, गेट खटखटाने की आवाज, उनकी संगीत साधना टूट गई। सामने रामामृदम एक थैली लटकाये खड़े थे।

“आइए, आइए,” कहते हुए दरवाजा खोला। “आप कब आये, आपका स्वागत है।”

रामामृदम ने तुरंत उत्तर दिया, “मैं कल रात को ही आ गया हूँ। आपके नादस्वरम की मधुर ध्वनि ने मुझे जगा दिया। बरबस आपकी ओर आकर्षित हो गया। आपके नादस्वरम की मधुर ध्वनि मेरे कानों में महीनों गूंजती रहेगी।”

“आजकल कोई भी नादस्वरम विद्वान इतने मधुर ध्वनि में राग नहीं अलापते, आज आपने अपनी विद्वता साबित कर दी। आपकी स्वर साधना को सुनना ही मेरा अहोभाग्य है।”

आगे वे कहते हैं कि, “जब-जब मैं कुंभकोणम आता हूँ, केवल आपके वाद्यस्वर को सुनने के लिए ही आता हूँ। इससे मुझे असीम आनंद की अनुभूति होती है। मैं अपने को भूल जाता हूँ।”

शिवानंद पिल्लै तुरंत उत्तर देते हैं कि, “सब कुछ ईश्वर की कृपा है, मेरे हाथों में कुछ भी नहीं है। इससे अधिक मैं कुछ नहीं कह सकता।”

“आप कैसे संगीत प्रेमी, मुझे पहचानकर, मेरी विद्वत्ता को परखकर कुंभकोणम आए, नादस्वरम सुनकर आनंदित हुए, यह आपकी महानता है और मेरा भाग्य है। अजकल नादस्वर में रुचि रखने वाले बहुत ही कम हैं।”

रामामृदम ने तुरंत एक थाली में फल, फूल और बिस्कुट के कुछ पैकेट उनके सामने रख दिया।

“इन सबकी क्या जरूरत थी?” पिल्लै ने भावावेश में कह दिया। “आपने मेरे संगीत को सुना, यही मेरे लिए पर्याप्त है।”

“नहीं, नहीं, यह सब मैंने आपकी बेटियों के लिए खरीदा है, इसे आप रखें।” इतना कहकर रामामृदम ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

कल उनकी पत्नी रुक्मणी ने जो कुछ कहा था, उसे सोच-सोचकर पिल्लै दुःखी हो रहे थे। रुक्मणी ने कहा था कि, “केवल नादस्वरम विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है। यदि ऐसा ही था, तो आपको मुझसे विवाह नहीं करना था, और दो बेटियों के पिता बनकर कर्तव्य भी निभाना था। अब तक आपने उनके विवाह के बारे में सोचा तक नहीं, उनके लिए कुछ भी नहीं बचाया। केवल नादस्वरम विद्वान ही बनकर रह गए। क्या कभी आपने यह सोचा भी है कि अपनी बेटियों की शादी में नादस्वरम बजा सकेंगे? क्या वाद्य संगीत द्वारा अर्जित धन विवाह के लिए पर्याप्त होगा?” रुक्मणी के इन बातों से वे बहुत दु:खी थे। उसकी पत्नी ने उसे यथार्थता से अवगत कराया। पत्नी ने ठीक ही कहा था, वह बेचारी क्या करती? सब कुछ बिक गया था।

किसी तरह वह अपनी कुशलता के कारण परिवार का भार सँभालकर चल रही थी।

पिल्लै अपने आप में कहने लगे कि, “मैं अपनी रुचि के अनुसार ही नादस्वरम विद्वान बन गया। वह अब मुझसे अलग नहीं है और इस वाद्य के संगीत से मैं धनी भी नहीं बन सकता। इतने वर्षों से मैं इसी प्रकार रहा और रुक्मणी भी परिवार का सारा बोझ संभालकर चल रही थी, पर आज उसे न जाने क्या हो गया?”

आगे वे कहते हैं कि, “मेरे दादा जी नादस्वरम के विद्वान थे, उनके कारण ही बचपन से ही मेरे मन में नादस्वरम सीखने की प्रबल इच्छा जागृत हुई। उनके मार्गदर्शन के कारण ही आज मैं नादस्वरम विद्वान हो गया हूँ। मैं जो भी राग बजाता हूँ, लोग मंत्रमुग्ध होकर मेरी ओर खिंचे चले आते हैं।”

मेरे पिता बहुत ही निपुण और बुद्धिमान थे। उन्होंने लोहे का व्यापार किया, इससे उनकी आमदनी बहुत ही बढ़िया थी। उन्होंने अपने दोनों बेटों और बेटी की शादी धूमधाम से कर दी। अब मेरे दोनों भाई और बहन आराम से जिंदगी-यापन कर रहे हैं। उन्हें कोई समस्या नहीं है। कॉलेज की पढ़ाई समाप्त कर मैं नादस्वरम विद्वान बन गया। यही मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य था। मेरे पिता जी ने कई बार मुझे समझाया कि मैं दूसरा कोई व्यवसाय चुन लूँ परन्तु मैंने अस्वीकार कर दिया।

मेरे पिताजी ने संपत्ति के नाम से मेरे लिए यह घर दिया, जिसे मेरी पत्नी ने अपनी कुशलता से बचाकर रखा, अन्यथा मेरे पास संपत्ति के नाम पर केवल यह नादस्वरम ही बचता।

इतने में दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी। दरवाजा खोला, सामने मेरी बड़ी बहन खड़ी थी। उसे देखकर मुझे माँ की याद आ गई। वह पूर्ण रूप से मेरी माँ की ही छाप थी। “नागम्मा अंदर आ, मैंने प्यार से उसे पुकारा।”

रुक्मणी ने भी बहन का स्वागत किया। शिवानंद पिल्लै बरामदे में जाकर बैठ गए। वे ध्यानमग्न होकर अपनी पत्नी और बहन की बातों को सुन रहे थे।

रुक्मणी कह रही थी कि, “तुम्हारे भाई को रुपयों की चिंता नहीं है, घर और बच्चों की शादी की चिंता नहीं है। उनकी मर्जी होने से नादस्वरम बजायेंगे, अन्यथा घर में ही रहेंगे। नादस्वरम विद्वान होने का उन्हें गर्व है, पर यह अभिमान किस काम का?”

नागम्मा ने तुरंत कहा कि, “भाई बरामदे में बैठकर सब सुन रहा है। वह दु:खी होगा। उसे ढूँढकर बड़े-बड़े विद्वान आते हैं और भाई ने अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा भी दी है। मेरे भाई को किसी भी प्रकार की बुरी संगत नहीं है, इसलिए उनपर आक्षेप करना उचित नहीं है।”

रुक्मणी ने उत्तर दिया कि, “क्या शिक्षा देना ही सब कुछ है? शादी के लिए एक-एक बेटी को कम से कम दस-दस सवरन देने होंगे, मेरे पास देने के लिए एक सवरन तक नहीं है।”

तुरंत नागम्मा ने जवाब दिया कि, “केवल तर्क-वितर्क से कोई लाभ नहीं। हमें आगे क्या करना है, इस पर विचार करें।” बड़ी बहन ने कहा, “मेरे पास सोना है, वह दोनों बेटियों को दे दूंगी। अभी जाकर तुम भोजन तैयार करो। मैं अभी भाई से बातें कर आती हूँ।”

नागम्मा ने शिवानंद से कहा कि, “भाई दोनों बेटियों के शादी के लिए कुछ तो इंतजाम करना होगा। अपने जान-पहचान के लोगों से कुछ रुपये उधार ले सकते हो।” शिवानंद- “यह मेरे उसूल के विरुद्ध है। हमारे माता-पिता भी चल बसे। दादा जी के समान मैं केवल नादस्वरम विद्वान हूँ। रुपयों के पीछे भागना मुझे पसंद नहीं। वाद्य-संगीत के सिवाय मुझे बाह्य-आडंबर का ज्ञान भी नहीं। दादी ने कभी भी दादा जी को डाँटा-फटकारा नहीं, अतः मैं भी पूर्ण रूप से दादा जी की ही छाप हूँ। मेरे उसूलों को कोई नहीं बदल सकता।”

इतना सुनते ही नागम्मा ने भाई के दोनों हाथों को जोर से पकड़ लिया। शिवानंद ने ऐसा महसूस किया मानो उसकी माँ ने ही उसके हाथों को पकड़कर सहारा दिया हो। मैं केवल नादस्वरम विद्वान हूँ। ऐसे ही दादा जी ने भी कहा था।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’