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बालमन की कहानियां
Bharat Katha Mala

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

हम शंकर भगवान के मंदिर कई बार जाते हैं। शंकर भगवान को एक गांव से दूसरे गांव जाना होता है, तो वह किस पर सवारी करते हैं? शंकर भगवान नंदी पर सवार होते हैं। शंकर भगवान का पुत्र गणेश जी है। गणेश जी को एक गांव से दूसरे गांव जाना होता है तो वह किस पर सवार होते हैं, जानते हो? गणेश जी चूहे पर सवार होकर जाते हैं। आज तुमको गणेश जी के चूहे के बारे में बताऊंगा।

एक बार गणेश जी को गांव से बाहर जाना था।

चूहा भाई को हिलाकर कहा कि हमें बाहर गांव जाना है। चूहा भाई ने कहा, “चलो महाराज, मुझ पर बैठ जाइए।”

अभी तुमको जो गांव जाना हो वहां पहुंचा दूंगा। गणेश जी तो चूहा भाई की पीठ पर बैठ गए। चूहा भाई चूं धूं धूं …करते हुए इधर-उधर देखा करते थे। चूहा भाई ने थोड़ी देर में गणेश जी को दूसरे गांव पहुंचा दिया।

गणेश जी को उस गांव में पूरा दिन रूकना था। इसलिए चूहा भाई ने कहाः “महाराज मैं जरा इधर-उधर घूम आऊँ, शाम तक वापस आ जाऊँगा। मुझे घूमने की छुट्टी दीजिए न!”

गणेश जी ने कहाः “ठीक है, खुशी से घूम आओ। साथ में यह बैग भी ले जाओ। इसमें सात लड है, तुमको काम आएंगे।”

लड्डू का बैग पीठ पर रखकर चूहा भाई निकल पड़े। चूं-धूं-धूं करते जाते और इधर-उधर देखते जाते। रास्ते में कोई घर पूछे: “कौन हो तुम?” तो कहतेः “मैं तो गणेश जी का चूहा। चूं-चूं-चूं… मैं तो गणेश जी का चूहा!”

चूहा भाई तो गांव के बाहर आ गए। उसने देखा तो एक पिल्ला सिर हिला रहा था। पिल्ला मतलब कुत्ते का बच्चा। चूहा भाई ने पिल्ले से पूछाः “पिल्ला भाई क्यों रो रहे हो?”

पिल्ले ने कहाः “मेरे पास एक मीठी पुड़ी थी। वह लेकर मैं यहां आराम से खाने बैठा। मुझे पता नहीं कि कौआ भाई कहां से टपके और मीठी पुड़ी ले गए!”

चूहा भाई ने कहाः “देखो पिल्ला भाई, तुम रोओगे तो भी तुम्हारी पुड़ी वापस तो मिलेगी नहीं। लो, यह एक लड्डू तुमको देता हूँ, मौज से खाओ।”

पिल्ला भाई तो खुश हो गए। उसने कहाः “तुम कौन हो? इसलिए चूहा भाई ने कहाः “मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं चूं चूं… मै तो गणेश जी का चूहा!”

चूहा भाई तो आगे चल दिए। चूं-धूं-धूं करते जाते और इधर-उधर देखते जाते। रास्ते में कोई खेत पूछताः “कौन हो तुम?” तो कहतेः “मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं-चूं-चूं…मैं तो गणेश जी का चूहा!”

चूहा भाई तो अब जंगल के पास आ गए। यहां उसने देखा तो पेड़ के नीचे बोटडू खड़े-खड़े रो रहा था। बोटडू मतलब ऊँट का बच्चा। बोटडू भाई तो पिछला पैर पटकाते जाते और रोते जाते। चूहा भाई ने करीब जाकर पूछाः “क्यों रो रहे हो?” बोटड ने कहाः “मैं तो अकेला चरने के लिए निकला था। चरते-चरते इस पेड़ के पास थोड़ी-सी नींद आ गई। इतनी देर में तो कोई मेरे अगले पैरों में रस्सी बांध गया। अब मैं पहुँचूंगा कैसे?”

चूहा भाई तो उसके पैर में बंधी रस्सी को काटने लगे। तब पेड़ के ऊपर से आवाज आईः “कौन है? रस्सी मत काटना। मैंने बांधी है। चूहा भाई ने ऊपर देखा तो बंदर! उसने कहा- मैंने तो मस्ती करने के लिए पैर बांधे है। उसको छोड़ना मत। मुझे अब उसकी पूंछ का मजा लेना है। “चूहा भाई ने कहाः “किसी को परेशान करके मजे नहीं लूटने चाहिए। मैं रस्सी काटूंगा, काटूंगा और काटूंगा।”

बंदर ने पूछाः “कौन हो तुम?” मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं-चूं-चूं… “ऐसा कहते चूहा भाई ने रस्सी काट डाली। बोटडू भाई खुश हुए। चूहा भाई ने उसको दो लड्डू दिए। इससे तो वे और ज्यादा खुश हुए। लड्ड देखकर उस बंदर के मुंह में पानी आ गया। पर चूहा भाई ने उसे कुछ नहीं दिया। जो दूसरों को तंग करता है, उसको कौन दुलार करेगा? कोई न करेगा। बंदर मुंह लटकाकर बैठा रहा और बोटडू भाई तो दोपहर की धूप में नाचते-कूदते अपनी मम्मा के पास दौड़ गए।

चूहा भाई के पास अब लड्डु रहे चार। उसका बैग लेकर वह तो आगे चलने लगे। चूं-धूं-धूं करते जाते और इधर-उधर देखते जाते। रास्ते में किसी पेड़ ने पूछाः “कौन हो तुम?” तो कहाः “मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं-चूं-चूं…मैं तो गणेश जी का चूहा!

चूहा भाई तो अब जंगल के बीचो-बीच आ गए। देखा तो रास्ते के बीच मदनिया खड़ा-खड़ा रो रहा था। मदनिया मतलब हाथी का बच्चा! चूहा भाई ने उससे पूछाः “मदनिया भाई, क्यों रोते हो? “मदनिया भाई ने कहाः “मैं खो गया हूँ। मम्मी को कहे बिना अकेला अकेला घूमने के लिए निकला था। “चूहाभाई ने कहाः “अब क्या करोगे?”

मदनिया भाई ने कहाः “यह रास्ता नदी की ओर जाता है। उसका मुझे पता है। मेरी मम्मी सुबह इस रास्ते आएगी, आएगी और आएगी।”

चहा भाई ने कहाः “तो सबह तक यहीं रूकना। जंगल में मम्मी को ढूंढने जाओगे तो भूल में पड़ जाओगे। रात को डर नहीं लगेगा?”

मुझे डर नहीं लगता है, भूख लगती है। मैं खाली पेट रात कैसे काढूंगा? “मदनिया भाई ने ऐसा कहा इसलिए चूहा भाई ने अपनी पीठ पर के बैग में से मदनिया भाई को तीन लड्डु दिए। मदनिया भाई ने एक के बाद एक लड्डू सूंड में लेकर मुंह में डाल दिए। फिर कहाः “और हो तो एक लड्डू दीजिए न!”

चूहा भाई ने अंतिम सातवां लड्ड मदनिया भाई को दे दिया। मदनिया भाई तो बहुत खुश हुए। उसने कहाः “कौन हो तुम, यह तो कहो!” और वही उत्तर मिला “मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं-चूं-चूं… मैं तो गणेश जी का चूहा!”

अब तो शाम होने को आई। गणेश जी के पास वापस लौटने का वक्त हो गया। चल-चलकर थके हुए चूहा भाई को अब तो बहुत भूख लगी थी। लड्डू तो पूरे हो गए थे। एक पिल्ले को, दो बोटडू को और चार मदनिया को दे दिए थे। चूहा भाई उन सभी की खुशी को याद करते हुए जाते हैं और चूं-धूं-धूं करते जाते हैं। चूहा भाई जंगल, खेत और सीमा को पार करके आ गए गांव गणेश जी के पास।

गणेश जी ने कहाः “मजे में न? कहां घूम आए चूहा भाई?”

चूहा भाई ने मंद आवाज में सारी बात कही। इस बात को सुनकर गणेश जी तो बहुत ही खुश हुए। उन्होंने चूहा भाई को और ग्यारह लड्ड दिए। चूहा भाई तो एक ही लड्डू खाकर ताजे-माजे हो गए। इसलिए बाकी के दस लड्डू उसने गली में जाकर बच्चों में बांट दिए।

बच्चे बड़े चाव से लड्डू लेते जाते और पूछते जातेः “कौन हो तुम?” तो कहाः “मैं तो गणेश जी का चूहा! चूं-चूं-चूं… मैं तो गणेश जी का चूहा!”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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