yaad rahegi yeh adbhut yatra
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नील को उपहार देने के बाद फिर शुरू हुई उसी तरह पानी के पाइप के सहारे ही उतरने की कवायद।

पर सांता उतर रहा था तो एक गड़बड़ हुई। पुरानी दीवार की कुछ ईंटें खिसकीं और नीचे सड़क पर जाकर गिरीं। शोर सुनकर गली के कुत्ते जाग गए और उनकी भीषण भौं-भौं…भौं-भौं ने आफत कर दी।

सांता को डर था, किसी ने उसे इस तरह पाइप से उतरते देख लिया तो क्या सोचेगा? उसने जितनी फुर्ती दिखा सकता था, दिखाई। किसी तरह उतरकर वह झटपट बग्घी में सवार हुआ और फिर बग्घी को जितना तेज दौड़ा सकता था, दौड़ा दिया।

“ओह…! आज की तो यह अद्भुत यात्रा याद रहेगी…याद रहेगी सचमुच!…और सुबह उठकर नील जब अपने सुंदर उपहारों के साथ-साथ वह चिट्ठी देखेगा तो कितना खुश होगा, कितना खुश!” सांता ने एक गहरी साँस ली और पल भर के लिए आँखें बंद कर लीं।

इस समय उसका पूरा चेहरा एक अलौकिक रोशनी से दिप-दिप कर रहा था। फिर वह अगले पड़ाव की ओर चल पड़ा।

अब सांता की बग्घी अपरंपार तेजी से उस छोटी सी बच्ची पिंकी के घर की ओर बढ़ रही थी, जिसे घर में हर वक्त डाँट पड़ती थी और इसी चक्कर में वह जाने-अनजाने सब गलत कर देती थी। उसके आँसू और सिसकियाँ सांता के मन को भारी कर रहे थे।

उसने सोती हुई पिंकी के पास चाकलेट, टाॅफियाँ, एक सुंदर सी लाल फ्रॉक रखी। और हाँ, एक हँसी का पिटारा भी, जिसमें किस्म-किस्म के जोकर अपने मजेदार किस्से-कहानियों और चुटकुलों से हर किसी का दिल खुश कर देते थे।

“यह पिंकी के लिए अच्छा उपहार है, शायद एकदम सही…! उसे इसकी जरूरत है।” सांता धीरे से बुदबुदाया।

सांता वहाँ से चलने को हुआ, पर नहीं, कुछ था जो उसके पैरों को अभी जकड़े हुए था। भला क्या…? तभी सांता की नजर अपने विशाल पिटारे के एक कोने में रखे गुलाब के पौधे पर गई।

“ओह, मैं भी कितना भुलक्कड़ होता जा रहा हूँ! यह गुलाब के सुंदर फूलों वाला पौधा मैं पिंकी के लिए ही तो लाया था। पर हड़बड़ी में भूला ही जा रहा था। अच्छा रहा कि मुझे याद आ गया, वरना मुझ जैसे बुड्ढे को फिर इतनी दूर से दौड़कर आना पड़ता…!”

सांता हँसा तो उसकी उज्ज्वल हँसी उसकी लंबी सफेद दाढ़ी पर शुभ्र चाँदनी की तरह फैलती चली गई।

सुंदर-सुंदर फूलों से लदा गुलाब का वह पौधा सांता ने बड़ी सावधानी से उठाया, और बड़े उत्साह से पिंकी के लॉन में एक जगह गड्ढा खोदकर लगा दिया। वह पानी से भरा एक जग भी साथ लाना नहीं भूला था। उसी जग से उसने पौधे की जड़ों में पानी डाला। थोड़ा उस पौधे की पत्तियों और उसके महक भरे गुलाबों पर भी डाला।

ऐसा लगा कि गुलाब के वे फूल एकाएक खिलखिलाकर हँस पड़े हों, और उनमें से खुशबुओं की एक महीन सी धारा निकलकर, हवा को भी धीरे-धीरे महकाने लगी।

अहा-हा, कैसी लाजवाब खुशबू थी उन गुलाबों की! ऐसी खुशबू, जिसमें कहीं कोई उदास रह ही नहीं सकता था।

सांता ने होंठों में ही बुदबुदाकर कहा, “बस पिंकी, अब तुम्हारी मुश्किलें खत्म। इसलिए कि यह गुलाब का पौधा असल में प्यार का पौधा भी है। इसकी खुशबू दिलों में बस जाती है और सारी बुराई खत्म कर देती है। इसके आसपास रहने वाला कोई किसी को डाँट ही नहीं सकता। तो यानी कि अब तुम्हारी मम्मी या घर के लोग तुम्हें नहीं डाँटेंगे। खुश रहो पिंकी। खुश और अलमस्त…!”

फिर सांता की बग्घी रमजानी के घर की ओर दौड़ पड़ी।

रमजानी के सिरहाने चाॅकलेट, टाॅफी और रंग-बिरंगे गुब्बारों का पैकेट रखने के बाद सांता ने उसके लॉन में भी वैसा ही प्यार की महक वाला सुर्ख गुलाब का एक पौधा लगाया। फिर धीरे से बुदबुदाया, “तुम्हारे मम्मी-पापा अब नहीं झगड़ेंगे रमजानी, कभी नहीं…! और हाँ, अपनी गलती के लिए वे जरूर शर्मिंदगी भी महसूस करेंगे। तुम्हें अब पहले की तरह परेशान नहीं होना पड़ेगा, मेरे प्यारे रमजानी…!”

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)