vishwaroop puranon ki kathayen
vishwaroop puranon ki kathayen

Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है-जब देवराज इन्द्र को स्वर्ग का ऐश्वर्य प्राप्त हुआ तो वे अहंकार में चूर हो गए । धर्म-मर्यादा और सदाचार का उल्लंघन करने लगे ।

एक दिन देवराज इन्द्र पत्नी शची के साथ स्वर्ग की सभा में अपने सिंहासन पर विराजमान थे । सूर्य, अग्नि, वरुण, कुबेर आदि देवगण अपने-अपने आसनों पर बैठे हुए थे । गंधर्व, किन्नर, नाग, पक्षी, अप्सराएँ और अनेक ऋषिगण उनकी स्तुति कर रहे थे । चारों ओर मधुर स्वर में इन्द्र की यश-कीर्ति का गान हो रहा था । इस सभा में इन्द्र नक्षत्रों में चन्द्रमा के समान आलोकित हो रहे थे । इतने में वहाँ देवगुरु बृहस्पति पधारे । वे इन्द्र सहित समस्त देवताओं के प्रधान आचार्य हैं । देवगण, ऋषि, मुनि, नाग, गंधर्व, किन्नर, अप्सराएँ और मनुष्य – सभी उनका आदर करते हैं । यद्यपि देवराज इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति को सभा में आते देख लिया था, तथापि न तो वे अपने आसन से खड़े हुए और न ही उन्होंने उनका स्वागत किया । देवेन्द्र का यह व्यवहार देखकर बृहस्पति समझ गए कि यह सब स्वर्ग के ऐश्वर्य और सुखों का दोष है। इसलिए वे किसी को कुछ कहे बिना शांत भाव से लौट गए।

उसी क्षण इन्द्र को अपनी गलती का अहसास हुआ । वे समझ गए कि उन्होंने देवगुरु बृहस्पति का सत्कार न कर उनका तिरस्कार किया है । उन्हें अपने व्यवहार पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ । वे शीघ्रता से अपने आसन से उठे और देवगुरु बृहस्पति के घर पहुँच गए । देवगुरु उस समय अपने योगबल द्वारा अंतर्धान हो गए । इन्द्र चारों दिशाओं में उन्हें ढूँढने लगे, किंतु उनका कहीं पता नहीं चला । बहुत दिन बीत गए ।

देवगुरु बृहस्पति की अनुपस्थिति में देवगण स्वयं को असुरक्षित अनुभव करने लगे । उनका मन अशांत हो गया ।

‘देवगुरु रुष्ट होकर कहीं चले गए हैं ।’ यह समाचार शीघ्र ही तीनों लोकों में फैल गया । जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य को इस बात का पता चला तो उन्होंने दैत्यों को युद्ध के लिए प्रेरित किया । इससे दैत्यों में उत्साह का संचार हो गया । उन्होंने स्वर्ग जीतने के लिए युद्ध की तैयारियाँ कर देवताओं पर धावा बोल दिया और उन्हें पराजित कर वहाँ अधिकार कर लिया ।

सभी देवगण ब्रह्माजी की शरण में गए और उनसे सहायता की विनती की । देवताओं की दुर्दशा देखकर परम दयालु ब्रह्माजी का हृदय करुणा से भर आया । वे सांत्वना देते हुए बोले -“देवेन्द्र ! तुमने बड़ा अनुचित कार्य किया है । ऐश्वर्य के अहंकार में चूर होकर तुमने वेदों के ज्ञाता और परम ज्ञानी बृहस्पति का सम्मान नहीं किया । यह तुम्हारे उसी कर्म का फल है कि तुम्हें पराजित होना पड़ा । देवेन्द्र! शिष्य को गुरु की महिमा को कभी कम करके नहीं आँकना चाहिए । वे जिन पर कृपा करते हैं, उनका कभी अमंगल नहीं होता । इस विपत्ति से बचने के लिए अब तुम त्वष्टा मुनि के पुत्र विश्वरूप के पास जाओ और उन्हें प्रसन्न करो । वे परम तपस्वी हैं । किंतु ध्यान रहे उनके मन में असुरों के प्रति भी समान प्रेमभाव है । यदि तुम उनके इस गुण को भूलकर उन्हें अपना गुरु बना लो तो वे तुम्हारी रक्षा अवश्य कर सकते हैं ।”

देवताओं की चिंता समाप्त हो गई । वे तत्क्षण विश्वरूप के पास गए । विश्वरूप के तीन सिर थे । अतः उसका एक अन्य नाम त्रिशिरा भी था । उसका स्वरूप आकर्षक और मनोहारी था । वे एक मुख से वेदों का पाठ करते थे, दूसरे मुख से मदिरा पान और तीसरे मुख से सम्पूर्ण दिशाओं का निरीक्षण करते थे । देवताओं को देख विश्वरूप ने उनसे आने का प्रयोजन पूछा ।

तब इन्द्र बोले – “मुनिवर ! हम यहाँ याचक के रूप में आए हैं, कृपया हमारी अभिलाषा अवश्य पूर्ण करें ।” कुछ रुककर इन्द्र पुन: बोले -“मुनिश्रेष्ठ ! दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया है । हम बड़े विश्वास से यहाँ आए हैं । आप अपने तप के बल से हमारा यह दुःख दरिद्रता और पराजय टाल सकते हैं । हम आपको अपना गुरु बनाना चाहते हैं ।”

विश्वरूप बोले -“देवेन्द्र ! आचार्य का पद ब्रह्मतेज को क्षीण कर देता है, इसलिए धर्मात्मा मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं । किंतु आप मेरे स्वामी हैं और देवगण होकर भी मेरे आश्रम में आकर मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं । ऐसी अवस्था में भला मैं आपकी प्रार्थना कैसे अस्वीकार कर सकता हूँ? मैं आपकी प्रार्थना का यथोचित आदर करूँगा । मैं आपका आचार्य बनने को तैयार हूँ ।”

तदंतर विश्वरूप ने गुरु पद पर आसीन होकर देवताओं को भगवान् विष्णु का प्रिय नारायण कवच धारण करवा दिया । इस कवच के प्रभाव से देवताओं ने दैत्यों को पराजित कर खोया हुआ सम्मान पुन: प्राप्त कर लिया ।

चूंकि विश्वरूप की माता दैत्यकुल की थीं, अतः उनके मन में दैत्यों के प्रति भी प्रेम का भाव था । वे स्नेहवश गुप्त रूप से दैत्यों को भी यज्ञ- भाग दिया करते थे । जब देवराज इन्द्र को यह बात ज्ञात हुई तो वे सोचने लगे कि कहीं दैत्य अपना बल बढ़ाकर उनका नाश न कर दें । इसलिए उन्होंने क्रुद्ध होकर विश्वरूप के तीनों मस्तक काट दिए ।

उनका सोमरस पीने वाला मस्तक पपीहा सुरापान करने वाला गौरैया तथा अन्न खाने वाला मस्तक तीतर बन गया । इसके बाद प्रायश्चित्तस्वरूप देवराज इन्द्र ने शांतभाव से ब्रह्म हत्या का पाप स्वीकार कर लिया और एक वर्ष तक उससे छूटने का कोई उपाय नहीं किया । फिर उन्होंने ब्रह्म हत्या को चार भागों में विभक्त कर पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों को दे दिया । इस प्रकार वे ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो गए ।

कुछ दिनों के पश्चात् इन्द्र को क्षमा कर देवगुरु बृहस्पति भी अपने पद पर पुन: आसीन हो गए ।

ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)