Tum, Mein or Wo Takkar
Tum, Mein or Wo Takkar

Hindi Love Story: दोपहर की तेज़ धूप और दिल्ली की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर ट्रैफिक अपनी ही धुन में रेंग रहा था। एक मोड़ पर स्कूटी सवार अनाया ने जैसे ही राइट मोड़ लेने की कोशिश की, पीछे से एक कार ने ज़ोर से टक्कर मार दी। वह सड़क पर गिर गई, उसका स्कूटी सड़क के बीचोंबीच लुढ़क गई।

लोग इकट्ठा हो गए। किसी ने कहा, “अरे भाई, देख के नहीं चला सकते क्या?”

कार से उतरा एक लड़का घबरा गया। उसकी आंखों में अफसोस साफ झलक रहा था।

“आई एम सॉरी…आप ठीक हैं?” उसने जल्दी से आगे बढ़कर अनाया को सहारा दिया।

अनाया ने हल्के से आंखें मींचते हुए खुद को संभाला, पैर से खून निकल रहा था और हाथ छिल चुके थे।

“म…मुझे भी ध्यान देना चाहिए था,” अनाया ने धीमे से कहा, “रॉन्ग साइड से स्कूटी निकाल रही थी।”

भीड़ में सब हैरान थे, ज़्यादातर लोग लड़के को कोसने आए थे, लेकिन लड़की ने खुद ही ज़िम्मेदारी ली।

लड़का—विवान, अब भी बेचैनी से उसे देख रहा था।

“प्लीज़, मैं आपको अस्पताल ले चलूँ?”

“नहीं, मैं मैनेज कर लूंगी,” अनाया ने जबरन मुस्कराहट लाते हुए कहा और जैसे-तैसे स्कूटी स्टार्ट की।

विवान को चैन नहीं पड़ा। वो अपनी कार में बैठा और धीरे-धीरे उसकी स्कूटी को फॉलो करने लगा। करीब 700 मीटर चलने के बाद, अनाया एक पेड़ की छांव में रुकी, स्कूटी साइड स्टैंड पर लगाई और हाथ से खून साफ करने लगी।

विवान ने कार साइड में रोकी और उसके पास पहुंचा।

“फिर से माफ़ी चाहता हूँ…मुझे बहुत बुरा लग रहा है। प्लीज़, स्कूटी यहीं छोड़िए। मैं आपको अस्पताल ले चलता हूँ।”

अनाया ने उसे घूरकर देखा। एक पल को लगा, ये लड़का बस फॉर्मेलिटी कर रहा है। पर उसकी आंखों में सच्चा पछतावा था।

कुछ देर की बहस के बाद, वो कार में बैठी। पिछली सीट पर। रास्ते भर चुप्पी रही, लेकिन विवान बार-बार रियर व्यू मिरर से उसकी ओर देखता रहा।

अस्पताल में पट्टी करवाने के बाद वह उसे स्कूटी तक वापस छोड़ने गया। जब अनाया स्कूटी स्टार्ट करने लगी, तब विवान ने पूछा:

“क्या… क्या मैं आपका नंबर ले सकता हूँ? बस हालचाल पूछने के लिए।”

अनाया थोड़ा झिझकी, लेकिन कुछ था विवान में… कुछ अलग। वह नंबर दे देती है।

रात करीब 8 बजे, उसके फोन पर मैसेज आया:

“घर पहुंच गईं? उम्मीद है ज्यादा दर्द नहीं हो रहा। Take care.”

वो मुस्कराई, अनायास ही।

अगले दिन फोन आया—”अगर पैर में दर्द हो तो एक अच्छा ऑर्थोपेडिक जानता हूँ…”

बातों का सिलसिला शुरू हो चुका था। कभी सुबह की गुड मॉर्निंग, कभी रात की गुड नाइट। कभी किसी किताब की बात, तो कभी मूवी की सिफारिश।

तीन महीने बीत गए, और वो अब एक-दूसरे के दिन का हिस्सा बन चुके थे।

“तो… आज सच में मिलने का प्लान बना ही लेते हैं?” विवान ने एक दिन कहा।

“ठीक है… लेकिन मुझे कॉफी पीने ले जाना होगा!” अनाया ने हँसते हुए कहा।

वे एक बुक कैफे में मिले। दोनों थोड़े नर्वस, लेकिन उत्साहित। बातें निकलीं, तो रुकने का नाम नहीं लिया।

“तुम्हारे हाथ का निशान अभी भी है?” विवान ने पूछा।

“हाँ… पर अब जब देखती हूँ, तो गुस्सा नहीं आता।” अनाया ने मुस्कराकर कहा।

उस दिन कॉफी ने जो शुरुआत की, वो कई डेट्स तक फैली। पार्क में वॉक, पुराने किले में घूमना, अचानक बारिश में भीग जाना।

विवान उसे हमेशा कार में दरवाज़ा खोलकर बैठाता, और अनाया हँसकर कहती—”इतनी तहज़ीब तो फिल्मों में होती है।”

एक शाम, जब वो दोनों इंडिया गेट के पास बैठे थे, विवान ने कहा:

“अनाया, अगर उस दिन एक्सीडेंट न हुआ होता… तो शायद हम कभी नहीं मिलते। लेकिन अब, तुम्हें खोने का ख्याल भी डराता है।”

अनाया ने धीरे से उसका हाथ थामा।

“मैं भी अब तुम्हारे बिना दिन की शुरुआत सोच नहीं पाती।”

दोनों ने एक-दूसरे को देख कर मुस्कराया। ये इकरार था—बिना कहे कह देना।

छह महीने बाद, बारिश की एक शाम, विवान ने घुटनों के बल बैठकर पूछा:

“क्या तुम ज़िंदगी भर मेरी टक्कर झेल सकती हो?”

अनाया हँसी—”अगर तुम हर बार ऐसे ही संभालोगे, तो क्यों नहीं?”

शादी की तैयारियां शुरू हो गईं। हल्दी की रस्म में विवान ने मजाक किया—”अब तो तुम मेरे नाम की पट्टी बंधवा लो।”

अनाया ने मुस्कराकर कहा, “पहले ज़िंदगी भर साथ निभाना सीखो!”

दोनों के परिवार मिलते हैं, रिश्तेदार हँसी-ठिठोली करते हैं—”ये एक्सीडेंटल लव स्टोरी बड़ी प्यारी है!”

शादी की शाम, जब अनाया लाल जोड़े में सजी मंडप की ओर बढ़ रही थी, विवान की आंखें भर आईं।

“उस दिन अगर मैं कुछ सेकंड देर से ब्रेक मारता…”

“तो शायद मैं किसी और की दुल्हन होती,” अनाया ने हँसते हुए कहा।

विवान और अनाया की कहानी किसी फिल्म जैसी थी—एक छोटी सी गलती, जो किस्मत की सबसे बड़ी भेंट बन गई।

आज भी जब कोई उनसे पूछता है—”आप दोनों की पहली मुलाकात कैसे हुई?”

तो दोनों एक-दूसरे को देख मुस्करा कर कहते हैं—
“एक टक्कर में दिल टकरा गए थे।”

शादी के बाद की सुबह, जब अनाया नींद में कुनमुनाई, तो खुद को एक अनोखे सुकून में पाया। बगल में विवान था, जो चुपचाप उसकी तरफ देख रहा था।

“क्या देख रहे हो?”

“सोच रहा हूँ… अब तुम्हें हर सुबह ऐसे ही देखूंगा। क्या तुम्हें रोज़ इतनी ही खूबसूरत दिखना ज़रूरी है?”

अनाया हँस पड़ी।

शादी के बाद भी विवान ने अपने वादे को निभाया—उसे हमेशा पलकों पर बैठाकर रखा। कभी किचन में उसके साथ खड़ा हो जाता, कभी बिना वजह गिफ्ट लाकर उसे चौंका देता। ऑफिस से लौटते हुए रास्ते में उसकी पसंदीदा कुल्फी लेकर आना विवान की आदत बन चुकी थी।

अनाया भी उससे कम नहीं थी। जब विवान देर से घर लौटता, तो उसका पसंदीदा खाना तैयार होता। जब कभी वो परेशान होता, तो अनाया बिना कुछ पूछे उसका सिर गोद में रख लेती और बालों में हाथ फेरती रहती।

उनका रिश्ता अब “आई लव यू” से ज़्यादा कुछ बन चुका था—एक समझ, एक साथ चलने का अहसास।

कुछ महीनों बाद…अस्पताल का कमरा था। अनाया थकी हुई थी, लेकिन उसकी आंखों में चमक थी। पास में विवान था, जिसकी गोद में एक नन्हा सा बच्चा था।

“देखो, ये मेरी सबसे प्यारी गलती है,” अनाया ने थकते हुए कहा।

विवान ने बच्चे को झुकाकर उसके माथे से छुआया और बोला-
“अगर उस दिन तुम स्कूटी पर न होतीं, तो मेरी ज़िंदगी कभी इतनी पूरी नहीं होती।”

वो टक्कर सिर्फ दो गाड़ियों की नहीं थी… वो दो ज़िंदगियों की टकराहट थी, जिसमें एक नया संसार जन्मा।

राधिका शर्मा को प्रिंट मीडिया, प्रूफ रीडिंग और अनुवाद कार्यों में 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है। हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखती हैं। लेखन और पेंटिंग में गहरी रुचि है। लाइफस्टाइल, हेल्थ, कुकिंग, धर्म और महिला विषयों पर काम...