जीव-विज्ञान में रुचि होने के कारण तिलचिट्टे को हमेशा मैंने बारीक नजर से देखा है। तिलचट्टा जो दिन में छिपा रहता है और रात होने पर ही अपने शिकार के लिए निकलता है।

 जैसे गुणों वाले अनेक लोग हमें अपने समाज में भी मिल जाते हैं। ये लोग एक विशेष पाचन शक्ति रखते हैं और समाज का सब कुछ चट करने में सक्षम हैं। तिलचिट्टो की तरह ये लोग भी अनेक सामाजिक बीमारियों के कीटाणु लिए चारों ओर घूमते-फिरते देखे जा सकते हैं। आवश्यक कार्य रात में ही निबटाए जाते हैं। तिलचट्टो के शरीर की रक्षा हेतु उसको यदि बाहर कवच प्राप्त है तो मानव-तिलचट्टे भी अपने लिए एक-दो बंदूक धारियों या दो-चार गुंडों या पांच-सात चमचों से बाहरी कवच का काम लेते हैं।
घरों में बसने वाले तिलचट्टो का वर्गीकरण मैंने तीन प्रकार से किया है- 1. किचन काक्रोच, 2. बाथरूम काक्रोच, 3. बेडरूम काक्रोच। अपने-अपने क्षेत्रों में रगड़ा लगाते हुए वे एक-दूसरे के क्षेत्रों में भी घुसपैठ करते रहते हैं। घर वाले दुखी हों तो हों, परेशान रहें तो रहें, इन्हें कोई मतलब नहीं। आदमी इनकी गतिविधियां देखकर इन्हें पीटता है, मारता है, परंतु दूसरी ही रात ये दुगनी संख्या में प्रकट हो अपने जिंदा रहने का सबूत देते हैं।

मानव तिलचट्टे भी तीन प्रकार के होते हैं- 1. सामाजिक, 2. राजनैतिक, 3 साहित्यिक। ये तिलचट्टे अपने-अपने क्षेत्र को अपवित्र और भ्रष्ट करते हुए एक-दूसरे के इलाके में दखल देते हैं।

काक्रोच बिरादरी ने बेडरूम काक्रोच को श्रेष्ठ माना है क्योंकि वह घर वालों की सारी अच्छी-बुरी हरकतों से वाकिफ होता है। मालिक के सारे रहस्य वह जानता है- डायरी सूंघना, बिस्तरे को चाटना, गुप्त बातें सुनना, ये उसकी विशेष गुस्ताखियां हैं।
घर के बेडरूम काक्रोच की भांति हमारे समाज में राजनैतिक तिलचट्टो को अधिक सम्मान प्राप्त है। यह तिलचट्टा बड़े-बड़े राजनेताओं और मंत्रियों की कोठियों में आता-जाता रहता है। देश कहां खड़ा है? इसे यहां से वहां ले जाने में सरकार की कौन-सी योजना काम करेगी? इसी प्रकार के सभी प्रश्नों के उत्तर उसके पास होते हैं। बजट कैसा रहेगा? कौन वस्तु महंगी होगी, कौन-सी सस्ती? यह सब कुछ उसे मालूम होता है और इस जानकारी का लाभ वह अपनी पूरी बिरादरी को दिलवाता है।

राजनैतिक तिलचट्टा मंत्री जी को अलमारी और मेज के ड्रायर में घुसकर गुप्त फाइलों को सूंघ आता है। मंत्री जी भी उसे नहीं टोकते।इन राजनैतिक तिलचट्टो की बिरादरी का विस्तार विदेशों तक होता है। इसी कारण इन तिलचट्टो के पर भी निकल आते हैं और ये मंत्री जी के साथ विदेश यात्रा कर आते हैं। अन्य प्रकार के तिलचट्टो की अपेक्षा यह मोटी गर्दन वाला होता है। संकट आने पर सरकारी संरक्षण भी इसे प्राप्त हो जाता है। राजनैतिक तिलचट्टो का आशीर्वाद लेकर सामाजिक एवं साहित्यिक तिलचट्टे भी अपने-अपने क्षेत्रों में आतंक फैलाए रखते हैं। सामाजिक तिलचट्टो की अपेक्षा साहित्यिक तिलचट्टा जरा कम खतरनाक होता है। लोग इनसे बचने के उपाय ढूंढ़ते रहते हैं, परंतु सफल नहीं होते।

साहित्यिक तिलचट्टा थोड़ा निडर होता है, वह राजनैतिक तिलचट्टो की परवाह कुछ कम करता है क्योंकि वह मंत्री से अपना सीधा संपर्क बनाए रखता है। वह मंत्री जी और उनके कार्यों की तारीफ में दो-चार पंक्तियां लिख डालता है और मंत्री जी भी बदला चुकाने की भावना से अपने भाषण में दो-चार शब्द उसकी तारीफ में बोल जाते हैं। पुरस्कार के लिए ‘हां’ होने पर मंत्री जी पर पूरी पुस्तक लिख दी जाती है।

एक साहित्यिक तिलचट्टे से मेरा भी वास्ता पड़ा है। मैं उसकी रचनाओं की कभी सराहना नहीं कर सका। इसलिए वह जीवनभर मुझसे नाराज रहा। अपनी अंतिम सांसों में भी उसने मुझे दर्जनों गालियां भेंट की और कहा- ‘अगले जन्म में निबटूंगा।’ साहित्कार मर गया, लेकिन मर के भी उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। एक रात वह बेडरूम तिलचट्टा बनकर मेरे घर में पैदा हो गया। ठीक बारह बजे वह मेरे कान को तलाशता हुआ मेरे बिस्तर पर आया और बड़ी तीव्र गति से मेरे बाएं कान में प्रवेश कर गया। मैं उठ बैठा, मेरी चीख निकल गई। तिलचट्टा बोला- ‘चिल्लाओ मत, चुपचाप सुनो, मैं तुम्हारे कान के अंदर से ही बोल रहा हूं।’ परिचय पूछने पर उसने बताया- ‘वही साहित्यिक तिलचट्टा, तुम्हारा परिचित दुश्मन जिसे सराहना तो दूर सुनने तक का कष्ट नहीं उठाया तुमने। आज मुझे अवसर मिला है। अपनी सारी रचनाएं तुम्हारे कान में पेलूंगा, तुम्हें सुननी ही पडेंगी…।’ इतना कहकर मेरे कान के पर्दे को उसने माइक की तरह पकड़ लिया। मेरी पुन: चीख निकल गई। उसने मुझे चेतावनी देते हुए समझाया- ‘चुपचाप सुनो वरना तुम्हारे कान के पर्दे को फाड़कर तुम्हारे मस्तिष्क में घुस जाऊंगा और वहां पहुंचकर सब कुछ उगल दूंगा।’

मैं गिड़गिड़ाया- ‘भाई मेरे, बाहर आ जाओ, मैं तुम्हारी एक नहीं, दस रचनाएं सुनने का वचन देता हूं।’वह बोला- ‘बस रहने दो। ऐसे वायदे तो पिछले जन्म में भी कई बार किए थे तुमने, लेकिन निभाए कभी नहीं। मंच पर नहीं सुना तो सुनने के लिए घर पर भी बुलाया, मुझे आज तो तुम मेरे काबू में हो। सुनो, दस वर्ष पुरानी एक नई रचना।’ मैंने उसका मतलब पूछा तो समझाया- ‘रचना जब तब सुनी नहीं जाती, नई ही रहती है ध्यान से सुनो। शीर्षक है ‘कुछ नहीं दिखता’

मैंने कहा- ‘भैया, बाहर आ जाओ, सब कुछ दिखने लगेगा।’ उसने मुझे पुन: धमकाया, ‘खामोश’ इस कविता में मुझे बाहर आके भी नहीं दिखेगा।’मैंने पूछा- ‘नए-पुराने ये राजनीतिक दांव, कुर्सी के लिए कांव-कांव, आतंकवाद का फैलाव, गुंडागर्दी द्वारा शराफत का घेराव, बेईमानी और भ्रष्टाचार के ये गहरे घाव, बाढ़ में डूबती हुई गरीबी की नाव, गैस का रिसाव, शरणार्थियों का जमाव, देशी जिंदगी पर विदेशी प्रभाव, दो देशों में झगड़ा कराके बड़े राष्ट्रों द्वारा बीच-बचाव, गरीबी पर अमीरी का दबाव, बढ़ते हुए भाव और तसल्ली के लिए चुनाव, कुछ भी नहीं दिखाई देता तुम्हें?’

वह गुस्से में बोला- ‘हां, मेरी रचना की यही विशेषता है। दिखाई देते हुए भी कुछ भी नहीं दिखना, सुनाई देते हुए भी कुछ न सुनना। यदि मैं कहूं कि जो कुछ तुमने कहा, मुझे नहीं सुना तो मेरा क्या कर लोगे?’

मैंने कहा- ‘ये सरासर धोखा है, रचना का शीर्षक बदलो।”नहीं बदलता’, कहकर उसने मेरे कान के पर्दे को माइक की तरह जोर से हिलाया और अपनी रचना ‘कुछ दिखाई नहीं देता’ पढऩा आरंभ किया। मैं बेहोश हो चुका था। पता नहीं वह कब तक अपनी रचना सुनाता रहा। इसमें मेरा कतई दोष नहीं है कि इस बार भी मैं उसकी रचना नहीं सुन सका। होश में आ जाने पर मैंने अपने आपको अस्पताल में पाया। डॉक्टर साहब तिलचट्टे को पकड़े उसे घूरे जा रहे थे। शायद वे उससे पूछ रहे थे- ‘बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए?’
मैं बोला- ‘डॉक्टर साहब, इसे मारना मत। इसके अस्पताल की किसी गंदी नली में फेंक दीजिए ताकि वह अपनी बिरादरी के जीवों को अपनी कहानी सुना सके।