कहते-कहते निक्का के आगे पूरी घटना जैसे फिर से ताजा हो गई। ‘प्रभात समाचार’ के संवाददाता देबू सरकार उसके एक-एक शब्द को नोट करते जा रहे थे। और निक्का हर छोटी से छोटी बात याद करके पूरी तफसील से बता रहा था—
मैंने अपने पड़ोस के कंप्यूटर साइंटिस्ट सुशांत अंकल को पूरी बात बताकर उनकी मदद माँगी। वे खुशी-खुशी तैयार हो गए। उनसे मैंने कहा कि “अंकल, जिन-जिन जगहों पर वह चोर गया था, वहाँ चलकर खोजते हैं। शायद कोई निशान या फिर उस चोर के बारे में बारीक सुराग ही मिल जाए। या फिर वह चोर देखने-भालने में कैसा था, लोगों से उसके बारे में सुन-सुनकर क्या उसका कल्पित फोटो नहीं बनाया जा सकता? कंप्यूटर के जरिए उसका ऐसा फोटो बनाना मुश्किल नहीं होना चाहिए!”
सुशांत अंकल और मैंने मिलकर लोगों से सुने-सुनाए उसके फीचर्स के बारे में जानकारी इकट्ठी करके उसका एक कंप्यूटर फोटो तैयार किया। फिर वह फोटो अंकल ने अपने उन सभी दोस्तों को दिखाया, जो कंप्यूटर का एडवांस कोर्स कर चुके थे और देश के जाने-माने कंप्यूटर विशेषज्ञों मे से एक थे। ऐसे बड़े-बड़े संस्थानों में भी हाईटेक चोर के इस कंप्यूटर फोटो को दिखाया गया, जहाँ कंप्यूटर की नई से नई टेक्नोलॉजी सिखाई जाती थी और जहाँ से कंप्यूटर के जाने-माने विशेषज्ञ निकलते थे। हम अँधेरे में तीर फेंक रहे थे लेकिन फिर भी एक बड़ी उम्मीद थी। तीर पैना है, अचूक है, सिर्फ सही कोण साधने की जरूरत है। अगर वह सही जगह लगा तो चोर बच नहीं पाएगा।
देखते ही देखते इ-मेल के जरिए सारे भारत के प्रशिक्षण संस्थानों और कंप्यूटर विशेषज्ञों के पास देश के अनोखे हाईटेक चोर का यह कंप्यूटर फोटो पहुँच गया। सुशांत अंकल ने साथ में सभी को एक चिट्ठी भी लिखी थी, “कृपया आप हमारी मदद कीजिए। कंप्यूटर की दुनिया में, जिससे मनुष्यता की भलाई के हजारों काम हो सकते हैं, यह होशियार चोर एक कंप्यूटर वायरस की तरह है। अगर हम चाहते हैं कि कंप्यूटर की दुनिया आगे बढ़े और आबाद हो, तो इस ‘खतरनाक’ वायरस का पता लगाना होगा और इसे उखाड़ फेंकना जरूरी, बहुत जरूरी है।”
सुशांत अंकल के एक दोस्त नीलकांत मेहरा ने वह फोटो देखा तो मारे अचरज के वह उछल पड़े। थोड़ी देर तो उनकी जुबान से कोई शब्द तक नहीं निकला। फिर अपनी उत्तेजना पर काबू पाते हुए बोले, “क्या यह सही है, नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता।…वह तो ऐसा नहीं कर सकता! वह तो जीनियस था, महा जीनियस…सुबोध! नहीं-नहीं, सुबोध ऐसा क्यों करेगा? क्यों?”
सुशांत अंकल के फिर पूछने पर नीलकांत मेहरा ने बड़े अचरज से भरकर बताया कि “अरे भाई, मेरे दोस्तों में…बल्कि जिन्होंने मेरे साथ कंप्यूटर का यह प्रशिक्षण लिया था, उनमें एक ऐसा ही था…और उसके चेहरे पर भी चोट का ऐसा ही निशान था। माथा इसी तरह खूब बड़ा-बड़ा चमकता हुआ और आँखें इतनी ही पैनी, चमकीली। और कमाल का जीनियस था वह। हमारे बैच में बेशक सबसे ज्यादा इंटेलीजेंट!…”
फिर वे कुछ सोचकर बोले, “सुबोध…हाँ, सुबोध नाम था उसका। सुबोध सक्सेना। कहीं यह वही तो नहीं?…मुझे लगता है, यह वही है—एकदम वही। इतना इंटेलीजेंट था वह कि हमेशा फर्स्ट क्लास फर्स्ट आता था और कोई भी प्रॉब्लम, जो किसी और से हल न हो, वह पलक झपकते झटपट हल कर देता। सच तो यह कि हम सभी उससे रश्क करते थे।”
उसी दिन नीलकांत मेहरा ने चेन्नई के अपने कंप्यूटर संस्थान में ई-मेल किया। वहाँ फोन करके पुराने बैच के अपने कंप्यूटर साथी सुबोधकांत सक्सेना का स्थायी पता पूछा।
वहाँ से दिल्ली का उसका पता मिल गया। बस समझिए, हमारी आधी समस्या हल हो गई। और फिर आगे रास्ता खुलता चला गया!…
निक्का बताता रहा, बताता रहा…और ‘प्रभात समाचार’ के पत्रकार देबू सरकार बहुत धीरज से एक-एक बात नोट करते रहे।
देबू सरकार की पूरी नोटबुक भर गई थी।…पर उस पर जो बातें दर्ज थीं, वे सचमुच होश उड़ा देने वाली थीं।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
