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सुनंदा - एक नया सूरज

 
ग्रहलक्ष्मी की कहानियां – इंटर प्रथम क्लास उत्तीर्ण बेटी ने जब आग पढ़ने के लिए कॉलेज की फीस के लिए पिता से पैसे मांगे। जो पिता ने ये कहकर मना कर दिया कि कोई जरूरत नहीं आगे पढ़ने की। शादी करो और अपने घर जाओ।

सुनन्दा को पिता की बात सुनकर हैरानी हुई। अभी कुछ दिनों पहले तक तो पिता उसके प्रथम क्लास आने से प्रसन्न थे। आस-पड़ोस से लेकर रिश्तेदारों तक को अपनी बेटी के अच्छे नम्बरों से पास होने की खुशी में मिठाई बांटी थी। हमेशा से उनकी इच्छा थी कि उनकी बेटी खूब पढ़े -लिखे और बड़ी अफसर बने। आज अचानक उन्हें क्या हो गया। उसने पिता से पूछा भी लेकिन पिता ने कोई स्पष्ट उत्तर न देकर उसे मना कर दिया।

सुनन्दा 18 वर्ष की सुन्दर लड़की । पढ़ने-लिखने में तेज। हमेशा पिता ने बेटे-बेटी में कोई फर्क नहीं रखा। उनकी यही इच्छा रही कि उनके बच्चे खूब पढ़े -लिखे । यहां तक पढ़ाई में कमजोर सुनन्दा की बड़ी बहिन जब 12वीं में फेल हो गई तो मां ने पढ़ाई बन्द करके शादी की सलाह दी। इस पर पिता ने कहा कि शादी तभी करूंगा जब कम से कम ये ग्रेजुएट हो जाये। भले ही पोस्ट ग्रेजुएट, एम. फिल, पी. एच. डी. न करे लेकिन स्नातक न होना मतलब अनपढ़ होना ही है और मैं अनपढ़ लड़की के लिए पढ़ा-लिखा वर कैसे तलाश करूंगा। मुझे कम पढ़ा-लिखा दामाद नहीं चाहिए। पढ़ा-लिखा दामाद ही चार में उठने-बैठने लायक होता है। उसे बात करने का सलीका होता है। समझदार ही मान-मर्यादा समझता है।

यदि तुम्हारी बेटी को पढ़ा-लिखा पति चाहिए और तुम्हें अच्छा दामाद तो बेटी को कम से कम स्नातक तो होना ही पड़ेगा। भले वह किसी सरल विषय से कर ले। यदि उसकी रुचि विज्ञान, कॉमर्स में न हो तो वह आर्ट के विषय ले कर ग्रेजुएट कर ले और दीदी बड़ी मुश्किल से थर्ड डिवीजन में ग्रेजुएट हुई तभी पिता ने उसका विवाह किया, लेकिन आज पिता को क्या हो गया। वह पढ़ने में दक्ष है साथ ही गृहकार्यों में भी कुशल है। मॉ का हाथ भी बंटाती है। उसनें मॉ के सामने अपनी बात रखी। मॉ ने उसे समझाते हुए कहा-‘‘बेटी अपने पिता की बातों का बुरा मत मानना। आजकल माहौल देख रही हो। कितना बुरा है। समाचारों, अखबारों में लड़कियों के विषय में कैसी -कैसी घटनायें दुर्घटनाएं घट रही हैं। ऐसे माहौल में कौन पिता अपनी बेटी को बाहर भेजने की हिम्मत करेगा।”

‘‘लेकिन मॉ कितनी सारी लड़कियॉ पढ़ती है। पढ़ रही है। सभी के साथ तो ऐसा नहीं होता। क्या हम अपराधियों के डर से पढ़ना, लिखना छोड़ दे। कल चार बदमाश मोहल्ले में घूमने लगे तो क्या हम अपने ही घर की छत पर अपने ही घर के द्वार पर खड़े होना बन्द कर दे। क्या बदमाशों के डर से आप हमें ताले में बन्द रखेगी। अपराधियों के अपराध की सजा हमें क्यों दी जा रही है। हमारी शिक्षा हमारी स्वतंत्रता हमारे विकास के रास्ते क्या सिर्फ बन्द कर दिये जाये क्योंकि बाहर अपराध बढ़ रहे हैं। ये तो कोई बात नहीं हुई। गंदी मानसिकता वाले स्त्रियों को प्रताड़ित करें। अपमानित करें और दोष ये दिया जाए कि हमने जीन्स पहनी हुई थी। ये तो वही बात हुई कि करे कोई, भरे कोई । ‘‘सुनन्दा ने गुस्से में कहा”

बेटी को गुस्से में देखकर मॉ ने कहा-‘‘बेटी मैं ठहरी अनपढ़ । मैं क्या जांनू । तुम अपने पिता से स्वयं बात करके देखो और उसके बाद भी वे मना करते हैं तो तुम्हें जो सही लगे। तुम करो। मैं तुम्हारे साथ हूं।

मॉ की बात सुनकर सुनन्दा खुश हो गई लेकिन आश्वस्त नहीं हुई। क्योंकि पिता को मनाना जरूरी था। केवल इसलिए नहीं कि पिता से आर्थिक मदद लेनी थी बल्कि इस कारण भी कि पिता के हृदय में छिपे डर को निकालना भी जरूरी था। ये समझना भी जरूरी था कि पिता के हृदय में मात्र डर था। अपराधियों का कोई और बात भी था। उसने मन को मजबूत किया। अपने आपको हिम्मत दी और दोपहर के भोजन के बाद आराम करते पिता के कक्ष में पहुंची।

पिता सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे। वे सुबह जल्दी उठकर टहलने जाते। फिर दैनिक कार्यों से निवृत होकर स्नान कर पूजा-पाठ करते। उसके बाद चाय पीते हुए गप-शप करते। घर के काम-काज जैसे सब्जी लाना, राशन लाना उनके कार्य थे। शेष समय वे टी.वी. देखते रहते। आराम करते।

उनकी तीन लड़कियां और एक लड़का था। लड़का सबसे बड़ा था और पोस्ट ग्रेजुएट कर रहा था। साथ ही नौकरी भी तलाश रहा था। बड़ी दीदी के स्नातक होते ही उन्होंने उसका विवाह एक मिडिल क्लास अच्छे परिवार में कर दिया था। सबसे छोटी बेटी दसवीं कक्षा में थी। वह भी पढ़ने में कुशल थी।

पिता से बात करने से पूर्व उसनें अपने बड़े भाई से बात की। बड़े भाई ने कहा-‘‘पापा मना करते हैं तो कुछ सोचकर ही मना किया होगा। तुम ऐसा करो प्राइवेट परीक्षा दे दो। फार्म, फीस, पुस्तकों का, सबका इन्तजाम में कर दूंगा”

बड़े भाई की बात ठीक थी लेकिन उसमें भी डर छिपा हुआ था । वही डर जो समाज मैं फैला हुआ है। तो क्या इस डर के कारण वह पिंजरे में कैद हो जाये। साइन्स से इन्टर करके क्या वह आर्ट लेकर प्राइवेट पढ़े। फिर प्राइवेट छात्र के रूप में विज्ञान विषय लेकर तो पढ़ा नहीं जा सकता। प्रेक्टिकल कैसे होगा? उसके लिए तो नियमित पढ़ाई जरूरी है और वह ये सब केवल इसलिए करें क्योंकि स्त्रियों के विरूद्ध अपराध बढ़ रहे हैं।

उसने पिता से कहा-‘‘पापा, मैं विज्ञान की छात्रा हॅूं और प्राइवेट नहीं पढ़ सकती। मैं पढ़ना चाहती हूं। आप आपराधिक तत्वों के अपराध की सजा मुझे क्यों दे रहे हैं छोटे शहर और मिडिल क्लास परिवार की लड़की होने के नाते मैं अपने दायरे जानती हूं। मेरा न कोई लड़का दोस्त होगा न मैं देर रात घर से बाहर रहूंगी। पापा में आपका डर समझती हूं। जरूरी नहीं कि हॉस्टल में रहने वाली हर लड़की बिगडैल हो। मैं पुरूषों के भद्दे व्यंग्य से भी वाकिफ हूं। लेकिन इस वजह से मैं अपनी पढ़ाई छोड़ दूं। ये तो मेरा स्वयं के साथ अन्याय होगा ।”

पिता उसकी तरफ देखते रहे। उसकी बात सुनते रहे और वह न जाने कैसे धाराप्रवाह बोलती रही। सुनन्दा की आवाज बोलते-बोलते कब तेज हो गई उसकी भी समझ में नही आया। उसकी आवाज सुनकर मॉ, भाई, छोटी बहिन भी आ गई। मॉ ने टोकने की कोशिश की तो पिता ने उन्हें आंख के इशारे से रोक दिया। ‘‘पापा मैं जीन्स नहीं पहनूंगी । मैं आपको शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी। मैं पढ़ना चाहती हूं पापा प्लीज” सुनन्दा की आंखों से आंसू छलकने लगे।

सुनन्दा के पापा न कहा-अखबार देखें हैं बेटी । मैं एक जवान लडकी का पिता हूॅ। मेरा डरना क्या गलत है?

‘‘हॉ, पापा, आपका डरना गलत है। आप चाहते है कि आपकी बेटी किरण बेदी, इंदिरा गॉधी बने तो उसे बिना डरे उड़ने के लिए खुला आसमान देन होगा उसे पंख काटकर तो आप उसे अपंग बना देंगे। फिर नियम ही बनाना है तो उन नीच लोगों के खिलाफ बनाए जाये। अपराधियों के विरुद्ध आवाज उठाकर उन्हें जेल में बन्द किया जाए। न कि बेटियों को सुरक्षा के नाम पर घर में कैद किया जाए। ये तो हम लड़कियों के लिए बिना किसी कुसूर के सजा हो गई। ‘‘सुनन्दा की आवाज में तेज भी था और पिता के सामने बोलने की लड़खड़ाहट भी।

थ्पता ने कहा- ‘‘मैं तो खुद चाहता हूँ कि मेरी बेटी खूब पढ़े। बड़ी अफसर बने। लेकिन बेटी आजकल का माहौल और बहकाने के इतने सारे साधन है कि कब क्या हो जाए? कहा नहीं जा सकता। इन्टरनेट, मोबाइल, अश्लील सिनेमा, साहित्य, पार्टियां नशा, गुंडागर्दी, अपराध गंदी राजनीति। ऐसे में लड़कियों को बाहर भेजना जैसे भूखे भेड़िये के सामने डालना हो गया।”

सुनन्दा ने पिता पास बैठकर कहा-‘‘ पापा, आप साताजी की पूजा करते हैं। उन्हीं सीता को रावण हरण करके ले गया तो इसमें सीताजी का क्या दोष? फिर आप ये भी तो मानिये कि सीताजी की वजह से ही रावण का विनाश हुआ। क्या आप सीताजी को आदिशक्ति नहीं मानते । जिन लोगों ने एक लड़की के साथ बस में दुराचार किया। उस एक लड़की के कारण पूरा देश जाग गया। जिस देश की जनता भ्रष्टाचार, अपराध, मंहगाई के मुद्दे पर कभी एक न हो सकी।

उस एक लड़की के कारण बिना किसी नेत्त्व के पूरा देश एकमत हो गया। वह लड़की एक निहत्थी और अबला लड़की नहीं थी वह ऐसी शक्ति थी कि सरकार घबरा गई। प्रशासन जाग गया। उस एक पीड़ित लड़की ने पूरे देश की मां- बहनों को आत्म-सम्मान से जीने और लड़ने के लिए प्रेरित कर दिया। क्या आप उसकी कुर्बानी व्यर्थ जाने देंगे। सुनन्दा की बातें सुनकर पिता का डर खत्म हो गया। उनमें एक नए जोश का संचरण होने लगा।

उन्होंने सुनन्दा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-‘‘जा बेटी, खूब पढ़ो। मुझे गर्व है। कि मैं तुम्हारा पिता हूं। तुम्हारे पास पंख हैं। खूब उड़ान भरो। तुम भविष्य की इंदिरा, किरण, कल्पना चावला हो। तुम्हारा पिता, तुम्हारा परिवार तुम्हारे साथ है।”

सुनन्दा अपने पापा के गले लग गई। परिवार में सभी ने उसका समर्थन किया। कॉलेज जाने को तैयार थी सुनन्दा। पिता ने उससे कहा-‘‘बिटिया, तुम्हें अपना राम भी स्वयं बनना पड़ेगा। किसी के भरोसे या सहारे नहीं। ”

‘‘जी पापा” कहकर सुनन्दा कॉलेज की ओर चल पड़ी सूरज अपनी पूरी चमक के साथ आसमान पर लहरा रहा था।