saraswati ghat
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

वह मेरे दुःस्वप्नों से तंग आ गई थी और मैंने पहली बार उसे टूटते हुए देखा था। मेरी आत्मा तड़प रही थी कि मैं उसे एक सुन्दर सपने में ले जाऊं लेकिन एक दिन, दिन की गोधूलि बेला में मैंने उसे विदा करते हुए करीब करीब चीखते हुए कह दिया कि “तुम मुझे छोड़ दो।”

मुझे अच्छी तरह याद है वह गोधूलि दर्द। वह जगह बैरहना कब्रिस्तान की थी जहां हम अपनी-अपनी साइकिल लिए सरस्वती घाट से टहलते हुए आए थे, जहाँ से उसे झूसी जाना था। उस दिन भी मैंने उसे अपने देखे हुए एक दुः स्वप्न के बारे में बताया ताकि “गाँव से पलायन कर पहुंचे शहराती संस्कारों ने तुम्हें घेर लिया हैं और मैं कह रहा हूँ कि तुम्हें कुछ नहीं होगा, इनके हाथों अपनी गरदन कट जाने दो, मुझे जिन्दा करना आता है।”

मैं दुःस्वप्नों की चीखों को जानता था, जिसमें चीखे टूटकर विलीन हो जाती लेकिन मैं देख रहा था कि तुम तक बात पहुँच रही है लेकिन यह मैं देख रहा था। सच यह भी हो सकता था कि मेरी बातें तुम तक नहीं पहुँचती या हत्यारों को सामने देख कर जिंदा करने जैसी बातों से तुम्हारा यकीन उठ गया है। तुम मुझे बेबस हो कर देखती जा रही हो और तुम्हारे सामने चमकती तलवारों के बीच जयकारा गँज रहा है कि “इस संसार में रहना है तो संस्कारों को सहना है।” जबकि मैं एक संतोष से भरता जा रहा हूँ कि मैं तुम्हें जिन्दा कर के हमेशा के लिए इस शहर से दूर लेकर चला जाऊंगा, जहाँ मृत्यु चाहे जैसी हो लेकिन संस्कारी हत्यारों के हाथों नहीं मरने दूंगा तुम्हें।

मैं तुम्हारी कटती हुई गरदन देखता हूँ और संस्कारों की अट्टहास सुनता हूँ। वे एक जयकार के साथ किसी और गरदन की तलाश में निकल जाते हैं। मैं तुम्हारा धड़ और सिर लिए सरस्वती घाट पहुंचता हूँ, जहाँ यमुना आँखों के सामने से संगम में मिल जाएगी। मिलने के आखिरी कुछ कदमों के जल से मैं तुम्हें जिंदा करता हूँ। अभी तुम्हारी गरदन का खून साफ ही कर रहा था कि तभी वहीं भीड़ गश्त लगाती हुई घाट के इधर-उधर से हमारी तरफ बढ़ने लगती हैं। तुम यमुना में छलांग लगाते हुए कहती हो कि भीड़ की तरफ मत देखो। ये मिलन के हत्यारे हैं। हम पूरी ताकत से तैरने लगते हैं लेकिन दूसरी तरफ से स्टीमरों में बैठे अधिकारी, उनके छर्रे और किले पर चढ़े सैनिक हम पर गोलियां दागने लगते हैं। तुम डूब जाने की बात करती हो और हम एक अतल गहराई में जाने लगते हैं। एक-दूसरे के हाथों में रहते हुए भी भय और प्रेम का ऐसा संत्रास हमसे लिपट रहा था कि यह ख्याल आया कि चाहे हमें जल के नीचे का ही जीवन मिल जाए, हम सांस लेना चाहते हैं, एक आजाद सांस। तभी मेरी नींद खुल जाती है।

यह कैसा दुःस्वप्न था? इसे सुनते ही वह उठकर खड़ी हो गई और सरस्वती घाट से बैरहना तक मेरी कई कोशिशों के बाद भी उसने एक शब्द भी नहीं बोला और कब्रिस्तान के पास जहां मैं उसे रोज छोड़ता था , चुपचाप साइकिल पर बैठ कर जाने लगी। अभी उसने दो-चार पैडल ही मारा होगा कि मैंने लगभग चीखते हुए कहा कि तुम मुझे छोड़ दो। मुझे याद है! तुमने एक पैर के सहारे और वो भी अपनी दाहिनी तरफ से इतनी तेजी से साइकिल घुमाई थी कि एक पल के लिए मैं भूल गया कि यह तुम नहीं, सर्कस की कोई लड़की है।

लगभग मेरी साइकिल से टक्कर देते हुए उसने साइकिल रोकी और बिना स्टैंड पर खड़ा किए, बिना एक शब्द बोले “कहो तो फिर से क्या कहा तुमने?” की मुद्रा में खड़ी हो गई। हकलाते हुए कोई बात जितनी सुधारी जा सकती है, मैंने बात सुधारी- “मम्म मैंने अगर फ्फ्फ फिर से कोई दुःस्वप्न देखा तो तुम मुझे छोड़ देना।” तुमने साइकिल उठा कर बैठते हुए कहा कि “यह बात तुम्हें याद रहेगी ना?” मैंने कहा “अब देखूगा ही नहीं कोई दुःस्वप्न।”

“उस दिन मैं छोड़ दूंगी तुम्हें” -कहते हुए वह चली गई मानो अभी से ही वह मुझे छोड़ के जा रही हो। लेकिन अगले दिन वह फिर आई और इस बार हम सरस्वती घाट पर नहीं, बैरहना के कब्रिस्तान में बैठे दुनिया जहान की बातें करते रहें। तब से साल के चारों मौसम बीत गए थे लेकिन मुझे कोई दुःस्वप्न नहीं आया।

यह एक ऐसी खुशी थी जिसका अंत किसी दु:ख, किसी सजा या किन्हीं दुःस्वप्नों के हाथों नहीं हो सकता था। लेकिन वह अक्टूबर की एक झनकती हुई धूप थी, पूरा परिवार घर की पुरानी चीजों को साल भर कीड़ों से बचाने के लिए छत पर फैला रहा था। मैं पापा की किताबें फैला रहा था। तभी वाल्मीकी रामायण में से एक पोस्टकार्ड गिरा। पापा को लिखा हुआ यह मेरा पोस्टकार्ड है। पोस्टकार्ड की तारीख देखकर अनुमान लगाता हूँ कि तब मैं सातवीं में पढ़ता था, तब हम लोग गाँव में रहते थे और तब से ही घर को लेकर मैं कितना फिक्रमंद रहता आया हूँ। मैं मुग्ध भाव से खुश हुआ और मां के दोनो गालों को पकड़ कर कहा कि सुनो तो यह चिट्ठी। एक हाथ में चिट्ठी थी और दूसरे हाथ में माँ के गाल। पूरी चिट्ठी पढ़ने तक माँ के गाल को पकड़े रहा। ऐसे में माँ मुझे- “जाओ ना हटो कहते हुए प्यार से धकेल देती या थप्पड़ मारने की कोशिश करती लेकिन चिट्ठी खत्म होने तक वह अपनी साँसें रोके रही। और जब चिट्ठी खत्म हुई तो मैंने एक अदद रोब से कहा कि “मुझसे अच्छी कोई संतान है तुम्हारी?” माँ की आँखों में अश्के हँसी महदूद हो रही थी लेकिन उसने शिकायत करते हुए कहा कि “इतने ही अच्छे हो तो क्यों नहीं महामृत्युंजय का जाप करवा लेते हो। तुम्हें बस खड़ा होना है, सब मैं कर लूंगी।” मेरी सारी मुग्धता हवा हो गई। मां की ऐसी बातों पर मुझे गुस्सा आता था लेकिन मुझे गुस्सा नहीं आया। मैं अपने कमरे में गया और पोस्टकार्ड को बार-बार पढ़ते हुए सो गया। और जब जगा तो एक दःस्वप्न से जगा।

फिर से वही दुःस्वप्न! यह आया कैसे? दोपहर में मेरे सोने से पहले ऐसा क्या था? लेकिन अभी बस मुझे अपना और उसका कहना याद आ रहा था जिसमें दुःस्वप्न देखने के बाद मुझे छोड़ देने की बात थी। मेरी पेशानी दरारों से इतनी भर गई कि हाथों की रेखाओं में जाहिर होने लगी। इस लम्हें में मेरा तर्जुमा घबराहट में हुआ था लेकिन मैंने तय किया कि मैं तुमसे झूठ बोल दूंगा लेकिन कब तक और वह भी उस दुःस्वप्न को जिसे दूसरी बार देख रहा था। मैं खद को लेकर बेयकीनी हो रहा था कि जिंदा करने जैसी कोई बात होती भी है या नहीं!

मैं संशय और यकीन के पाटों में पीस रहा था कि तभी उसका फोन आया। उसने एक सुंदर सपना देखा था और इतनी खुश थी कि साईकिल चलाते हुए फोन पर मुझसे बातें करती जा रही थी और मुझसे कह रही थी कि मैं दस मिनट में घाट पहुंच जाऊंगी। झूसी से बैरहना दस मिनट में! मैंने उसकी स्पीड के बारे में सोचते हुए कहा कि साइकिल की चैन उतर गई तो? “यह मेरी साइकिल है तुम आओ आराम से” और उसने फोन कट कर दिया।

मैं गया तो वह घाट पर ऊंगलियों से मेरे इंतजार में कोई चित्र बना रही थी। मेरे पहुंचते ही वह सपने की बात बताने लगी। मैंने उसके चेहरे से फिसलता हुआ इतना लवण कभी नहीं देखा था। उसके जबीं से जहाँ गर्द बेपर्दा हो रही थी और लताफत के रंग चढ़ रहे थे। इसी खुशी में मैंने भी अपना दुःस्वप्न बताना शुरू किया कि अचानक वो चीख उठी कि “तुम जाओ यहाँ से, मैंने तुम्हें छोड़ दिया है।” यह चीख इतनी विकराल थी, मानो त्रेता युग के धनुष टूटने की आवाज ही उसकी मुकाबिल कर सकती थी।

पूरे शहर का मुंह सरस्वती घाट की तरफ हो गया। हकलाते हुए जितना झूठ बोला जा सकता है मैंने बोला कि “मैंने कोई दुःस्वप्न नहीं देखा था वो तो तुम्हें चिढाने के लिए कहा था। झूठ में जितना हंसने की कोशिश की जा सकती थी, उससे कहीं ज्यादा मैंने हंसने की कोशिश भी की लेकिन वह मुझसे प्रेम करती थी और मैं उस पर मरता था। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा “खाओ कसम मेरी” वह पहली बार कसम खिला रही थी। पहली बार मैं जिंदा करने की बात पर संशय कर रहा था। मैंने कहा कुछ तो रहम करो कि एक साल बाद मैंने दुस्वप्न देखा है, कुछ सालों में आदत छूट जाएगी।

उसने कहा “तुम जाओ” और वह अपनी साइकिल की तरफ बढ़ गई। मैंने कहा कि मैं तुम्हें एक बार और चूमना चाहता हूँ। वह उसी रफ्तार से मुड़ी और मुझसे पूछा कि “मैंने क्या कहा तुमसे?” मैंने बिना हकलाए कहा कि तुम मुझे जाने के लिए कह रही हो।” हाँ तो जाओ। मुझे गुस्सा आना था। मैंने कहा मैं नहीं जाऊंगा। यहीं खड़ा रहूँगा। वह बिना कुछ बोले चली गई। मैं उसके पीछे दौड़ता जा रहा था और ऐसा कुछ कहता जा रहा था कि वह तिलमिला के रूके, सुने मेरी। मुझे याद है मैंने उसके पीछे भागते हुए कहा था- “जिसे तुम सुंदर सपना कह के मुझे सुना गई हो, वह सुराखों से भरे हुए हैं। मैं तुम्हारे सारे द:स्वप्नों को जानता हूँ।” लेकिन वह दस मिनट में झूसी से सरस्वती घाट पहुँची थी। उसे ओझल होते देर नहीं लगी।

अब भीड़ मुझसे मुखातिब थी लेकिन लड़की नहीं थी। भीड़ ने लड़की की आवाज सुनी थी और मेरे पास लड़की की आवाज है, इस जुर्म में मुझे ताड़ीपार कर दिया गया और मुझे शहर से बाहर पत्थर तोड़ने का काम दिया गया। यह काम मुझे तब तक करना था जब तक कि पत्थर को तोड़ते-तोड़ते देवताओं की मूर्ति बनाना ना सीख जाऊं। मैंने मूर्ति का आकार देना शुरू किया तो मुझे सुंदर सपने आने लगे लेकिन मैं तुमसे दूर था और बार बार तुम्हारी मूर्ति बना देता। संस्कारों के संविधान में यह जुर्म था और मेरी सजा बढ़ती जा रही थी।

एक दिन जब मैं उसके माथे की बिंदी बना रहा था तो संस्कारों की सत्ता से लहूलुहान लेकिन उसे भीतर तक स्वीकारता उसके दलदल में फंसा जो कि खुद को कलावंत कहता था, मेरे पास आकर कहा कि “तुम्हें अफसोस नहीं होता कि तुमसे देवताओं की मूर्तियां नहीं बन रही हैं?” मैं उसकी मूर्ति बनाने में डुबा हुआ, इस अफसोस पर मैं क्या कहता, जबकि मैं सुंदर-सुंदर सपने देख रहा था। यह तो मेरी मजिल होनी थी। उसने मुझे दिलासा दी, कोई बात नहीं, तुम मेरी मूर्ति बना दो, मैं तुम्हें सजा से मुक्त करा दूंगा। मुझे उसकी बात मजेदार लगी इसलिए नहीं कि वो मुझको सजा से मुक्त करा सकता है। इसलिए कि कोई होता है जो सजा से मुक्ति दिलाने के एवज में अपनी मूर्तियाँ बनवाता फिरता है।

लेकिन अच्छा यह हुआ कि मैं अपनी सजा के बारे में सोचने लगा और बिंदी बनाने के बाद उसकी मूर्ति के हाथों में तीर-धनुष पकड़ा दिया और बरी हो गया। लेकिन शहर में वह थी और उसके होने से संस्कारों का सबकुछ दांव पर लगा रहता था इसलिए शहर में प्रवेश करने से पहले यह अफवाह फैला दी गई कि मैंने सजा काटते हुए संस्कारों के साथ छेड़-छाड़ की है। कि जो मूर्ति मैंने बनाई है, वह किसी देवी-देवता की नहीं मेरी प्रेमिका की है। कि उसने मुझे छोड़ दिया है। कि अब तो वह बात पुरानी हो गई है। कि अब तो इलाहाबाद का नाम भी बदल गया है। कि इलाहबाद में मेरा जाना अपनी हत्या की दावत देना है। मैं भयभीत हुआ और इतना कि मैं भूल गया कि जिंदा करने जैसी बातों पर मेरा पूरा यकीन था। लेकिन एक सच मुझसे विलग नहीं सकता था कि मैंने अपनी सजा के दौरान उसकी मूर्तियाँ बनाते हुए कई सुंदर सपने देखे थे। मैं उसे अपने सुंदर सपने बता कर अपने बीच आए दुःस्वप्नों से मुक्ति चाहता था। इसलिए इलाहाबाद के रास्ते पर चल दिया।

लेकिन शहर में दाखिल होते ही मैं क्या देख रहा हूँ! शहर के चौराहों पर स्क्रीन लगे हुए हैं जिसमें संस्कारी दस्ता की जय गूंजने वाली फिल्में चल रही हैं। लोग जगह-जगह जोड़े को मार रहे हैं, उन्हें नंगा कर रहे हैं। उनकी इज्जत लूट रहे हैं, उनकी गरदन उतार रहे हैं और उन संस्कारी हत्यारों पर हेलिकॉप्टर से फूल बरसाए जा रहे हैं। मैं स्क्रीन से ध्यान हटाता हूँ तो दीवाल के पोस्टरों पर मेरा ध्यान जाता है। जगह-जगह मेरे पोस्टर लगे हुए हैं, उन पोस्टरों पर मुझे जिंदा या मुर्दा पकड़ लेने पर ईनामी राशी रखी हुई है। यह कैसे हो गया? और इतनी कम कीमत मेरी हत्या के लिए! मैंने आँखें मलते, खुद को चिकोटी काटते हुए इत्तिला किया कि कहीं मैं किसी दुःस्वप्न में तो नहीं हूँ! नहीं यह कोई दुःस्वप्न नहीं था!

मैं अपने ही शहर में छिपने की जगह देखने के लिए भागा तो एक गली में देखता हूँ कि पूरी गली मेरी गुमशुदगी के पोस्टर से भरी हुई हैं। जहाँ मेरे दोस्तों ने मुझे खोज लेने की एवज में मुँह माँगी कीमत देने की बात कही हैं। मैंने जी भर के साँस लिया। मैंने महसूस किया कि यह एक सुंदर सपना था जिसे मैं देखते हुए रह गया लेकिन तभी मैंने उसके नाम से छपा हुआ पोस्टर पढ़ा। उसने भी मुझे जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर ईनाम की घोषणा थी। लेकिन उसकी ईनामी राशी बहुत ज्यादा थी। इस एक पल में मैंने महसूस किया कि उसके पास मेरी जान की कीमत तो थी लेकिन इतनी ज्यादा कि सबके लिए उसे स्वीकारना, पचाना मुश्किल था। लेकिन भागते भूत की लँगोटी ही सही के मुहावरे में पैबस्त हमारा समय उसकी ईनामी राशी को झूठ मानते हुए भी यह माना कि कुछ तो मिलेगा ही लड़की से। और मेरे पीछे पड़ गया।

कोई कह रहा था कि तुम सरस्वती घाट तक पहुँचते ही मार दिए जाओगे। कि तुम अपनी आखिरी इच्छा बता दो। कि तुम्हारी प्रेमिका ही तुम्हें मार देगी। कि तुमने क्यों बनाई उसकी मूर्ति? कि तुमने उसका छोड़ना क्यों स्वीकार नहीं किया? मैं उन सबको झटक कर वहां से भागते हुए एक साइबर कैफे में छिप जाता हूँ और अपना फेसबुक एकाउंट खोलता हूँ। मैं हैरान हो रहा हूँ कि उसके साथ की बहुतेरे लडकियां संस्कारी दस्तों के पोस्टों पर शरम लिहाज और अपनी संस्कृति-संस्कार के लिए माथा पिटती हुई उनके हाँ में हाँ मिला रही हैं।

मुझे लगा मैं अभी दम तोड़ दूंगा। जैसा कि होता है, टूटते हुए दम के साथ हम कुछ पकड़ना चाहते हैं ताकि निकलती हुई साँसों की लौटने की चाह और उम्मीद एक बार उमड़ आए। मैं उसकी वाल पर गया लेकिन वहां मेरी खींची हई तस्वीर के अलावा कछ नहीं था। वे सारी तस्वीरें गायब थी जिसमें हम साथ थे। मैं उसकी उस दोस्त के वॉल पर गया जिसे उसने मुझसे मिलवाया था। उसने अपने पोस्ट में लिखा था कि “फतवे जारी करते हुए पोस्टर जिंदा करने के सारे यकीन को दफना रहे हैं। प्रेम पर यकीन ना भी हो तो मनुष्यता के यकीन पर यह जिंदगी दाँव पर लगाई जा सकती है। हम अपनी जिंदगी दाँव पर नहीं लगा सकते तो कम से कम उनके विरूद्ध तो नहीं हो सकते जिन्हें जिंदा करने पर यकीन हो।”

यह ऐसा यकीन था कि मुझमें जिंदा करने वाली बात घर कर गई जिसे मैं संस्कारी दस्तों के तांडव, इलाहाबाद का नाम, नक्शा बदलने और इसके दीवालों पर अपनी ईनामी राशी देखकर भूल गया था। लेकिन उसकी दोस्त की पोस्ट पर संस्कारी दस्तों के लड़के-लड़कियों की लाइक देखकर संशय से भर गया कि सच में यह सारा खेल मुझे मारने के लिए चल रहा है! मैंने अपनी टूटती हुई साँसों को महसूस करते हुए पाया कि उसे क्या जरुरत थी यह सब करने की! दुःस्वप्न ही तो मेरा सच नहीं था! वह मुझे मारना चाहेगी और मैं साँस ले पाऊंगा! संशयों और यकीनों के बीच यह पल ऐसा होता जा रहा था कि आँखें भरती जा रही थी और दिल हल्का होता जा रहा था।

मैं फिर से उसकी फेसबुक वाल पर था। अपनी खींची हुई तस्वीर को देखते हुए मैंने पाया कि टूटती साँसों की भी एक लय होती होगी। मैं इस लय के साथ अपना सुर मिलाने लगा कि उसकी वॉल पर एक नई तस्वीर चमकी। मैंने सुर को छोड़कर अपनी आँखों को पोंछा। तस्वीर में एक जोड़ा, एक गुम्बद के नीचे चुम्बन रत था। जिसके अहाते में अक्टूबर की झनकती हुई धूप थी। एक चुप भी ऐसी थी कि मानो कहीं कुछ हो गया हो। ऐसा लगता था कि वे अपनी अपनी साइकिल से उतर कर पहला काम एक-दूसरे को चूमने का कर रहे थे कि कहीं यह छुट ना जाये। मैंने देखा कि इस तस्वीर को शेयर करने की टाइमिंग जस्ट नाऊ थी और प्लेस था सरस्वती घाट। मुझे एहसास हुआ कि मेरा दुःस्वप्न उसके लिए क्यों तोड़ देने वाला होता था। मैं बिना दम लिए सरस्वती घाट जाने के होता हूँ, तभी मेरे इनबॉक्स में एक मैसेज आया- यह सब उसकी चाल है। फिर देखते-देखते मेरा इनबॉक्स गड बाय, अलविदा से भरने लगा।

मुझे लगा नहीं कि मैं पागल हो रहा था। मुझे पागल किया जा रहा था। मैं चाहता था कि मैं अभी मर जाऊं फिर किस डर से मैं सरस्वती घाट जाने में संशय से भर रहा था। सिर्फ इसलिए कि मैं उसके हाथों मरना नहीं चाहता था। मैंने फिर से वह पेंटिंग देखी जिसे शेयर करते हए दस मिनट हो गया था। अचानक से मुझे लगा कि वह दस मिनट से संस्कारी दस्तों के बीच घिरी हुई हो, मैंने दम भर सांस लिया और तुम्हारे द्वारा शेयर की हुई उस पेंटिंग को शेयर करते हुए अपडेट किया- जो होते-होते रह गए वो चुम्बन याद रखना। और फिर सरस्वती घाट की तरफ बढ़ गया, जहाँ वो है, जहाँ तुम हो।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’