Santoshi
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खाट और एक बड़े सूफी संत हुए हैं शेखसादी। उन्होंने एक भिखारी को देखा। भिखारी के पैर टूटे हुए थे। वह पंगु था, किन्तु अत्यंत प्रसन्न। शेखसादी विस्मय में पड़ गए। वे अपने-आपको नहीं रोक सके। भिखारी के पास गए।

उन्होंने पूछा- अरे भाई भीख माँग रहे हो और पैर तुम्हारे टूटे हुए हैं, फिर भी तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता टपक रही है। तुम्हारी प्रसन्नता को देखकर मुझे भी ईर्ष्या होती है। मैं भी इतना प्रसन्न नहीं हूँ। क्या कारण है इसका। भिखारी बोला- महाशय, मैं भिखारी हूँ। मेरे पैर नहीं हैं। भीख माँगकर जीवन चलाता हूँ। फिर भी मैं खुदा का धन्यवाद करता हूँ। उसने मुझे आँखें दे रखी हैं, हाथ दे रखे हैं। मैं मजे से रोटी खाता हूँ, सबको देखता हूँ, भीख माँग लेता हूँ। केवल पैर नहीं हैं तो क्या हुआ। जो है, उसको छोड़कर, जो नहीं है उसके लिए मैं क्यों रोऊं। शेखसादी यह सुनकर स्तब्ध रह गए।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)